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7 मई, 2021|7:25|IST

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बदल रही तमिलनाडु की राजनीति, पलानीस्वामी और स्टालिन खत्म कर रहे हैं 'जानी दुश्मन' वाला दौर

mk stalin and edapaddi palanisamy

अपने पूर्ववर्ती नेताओं से विपरीत तमिलनाडु में पलानिस्वामी और एमके स्टालिन एक स्वस्थ राजनीतिक प्रतिस्पर्धा का खाका खींच रहे हैं, उस प्रदेश में जहां करीब 50 सालों से राजनीति कड़वाहट, दुश्मनी और हिंसा से भरे माहौल में होती रही है। दो मई को विधानसभा चुनाव नतीजों में तमिलनाडु की जनता ने एआइएडीएमके के दस सालों के शासन पर विराम लगाते हुए अगले पांच सालों के लिए सत्ता की कमान डीएमके को सौंप दी। 

पलानिस्वामी ने जनादेश स्वीकार करते हुए ट्विटर के माध्यम से स्टालिन को शुभकामनाएं दी। जवाब में स्टालिन ने पलानिस्वामी से सहयोग मांगा और कहा कि लोकतंत्र सत्ता पक्ष और विपक्ष का संगम है। चुनाव परिणाम के बाद पक्ष-विपक्ष के दो प्रमुख नेताओं के बीच का यह संवाद आपको औपचारिकता भर लगे लेकिन तमिलनाडु की राजनीति के लिहाज से यह अहम है, क्योंकि सत्ता परिवर्तन पर ऐसे मौके बीते कई दशकों में देखने को नहीं मिले।

इसकी एक बड़ी वजह यह है कि पलानिस्वामी और स्टालिन के बीच किसी तरह की निजी रंजिश नहीं है जैसा इतिहास में कभी करुणानिधि और एमजी रामचंद्रन और आगे चलकर करुणानिधि और जयललिता के बीच हुआ करती थी।

ऐसे शुरू हुआ था दोस्ती से दुश्मनी वाला दौर

इस कड़वाहट की शुरुआत तब हुई जब तमिल सिनेमा के सुपरस्टार और लोकप्रिय नेता एमजी रामचंद्रन ने 1972 में डीएमके से अलग होकर एडीएमके बनाई जिसका बाद में नाम एआइएडीएमके रखा गया। इसके साथ ही एमजीआर और करुणानिधि की दोस्ती और दोनों की फिल्मों से लेकर राजनीति तक की कामयाबी जुगलबंदी का भी अंत हो गया। नई पार्टी बनाने के बाद 1977 में एमजीआर ने चुनाव जीता और 1987 में अपने निधन तक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री रहे। 

एक-दूसरे की पार्टी को खत्म करने की रहती थी इच्छा

वरिष्ठ पत्रकार दुरई करुणानिधि के मुताबिक, 'दोनों नेताओं की निजी प्रतिद्वंदिता ने तमिलनाडु में नफरत की राजनीति को जन्म दिया। दोनों एक-दूसरे की पार्टी को खत्म कर देना चाहते थे। डीएमके ने एमजीआर के खिलाफ कई झूठे मामले दर्ज किए। जब एमजीआर सत्ता में आए तो उन्होंने अपनी आखिरी सांस तक करुणानिधि को चुनावी जीत से दूर रखा।' हालांकि दुरई यह भी बताते हैं कि इन सबके बावजूद दोनों नेताओं के बीच बातचीत होती थी और दोनों साझा तौर पर सार्वजनिक कार्यक्रमों में भाग भी लेते थे। 

...जब CM बनते ही जयललिता ने आधी रात में करुणानिधि को कराया गिरफ्तार

एमजीआर के निधन के बाद उनकी जगह जयललिता ने ली। 1989 में करुणानिधि मुख्यमंत्री चुने गए और जयललिता विपक्ष की नेता बनी। जयललिता को दुश्मनी विरासत में मिली थी इसमें इजाफा तब हो गया जब कुछ दिनों बाद ही विधानसभा के भीतर दोनों पार्टियों के बीच हिंसा हुई। जयललिता ने खुद पर हमले का आरोप लगाया और रोते हुए विधानसभा से बाहर निकली थीं। 2001 में सत्ता मिलने के एक महीने के भीतर मुख्यमंत्री जयललिता ने भ्रष्टाचार के आरोपों में 78 साल के करुणानिधि को आधी रात के वक्त गिरफ्तार करवा दिया। पुलिस ने रात पौने दो बजे  करुणानिधि को उनके घर से बलपूर्वक गिरफ्तार में लिया। इस दौरान करुणानिधि चीखते रहे 'ये लोग मुझे जान से मार रहे हैं'।

एक हफ्ता जेल में रहे थे करुणानिधि

उस घटना के बारे में आगे बताते हुए डीएमके के वरिष्ठ नेता और सांसद टीकेएस एलांगोवन कहते हैं, 'करुणानिधि को एक हफ्ता जेल में बिताना पड़ा। जयललिता बस इतना ही चाहती थीं। उन्होंने आगे मामले में रुचि नहीं दिखाई।'  विधानसभा की कार्रवाई के दौरान भी करुणानिधि और जयललिता एक-दूसरे से नजर नहीं मिलाते थे। वरिष्ठ पत्रकार दुरई के मुताबिक जयललिता ने कुछ कार्यकर्ताओं को अपनी पार्टी से केवल इसलिए निकाल दिया क्योंकि उन्हें पता चला था कि वे डीएमके के कार्यकर्ताओं से बात कर रहे थे।

बात तक नहीं करते थे एआईएडीएमके-डीएमके के सदस्य 

उन दिनों को याद करते हुए डीएमके सांसद एलांगोवन ने बताया कि दिल्ली में भले ही एआईएडीएमके के सासंद, विधायक मेल-मुलाकात के वक्त उनसे बात करते थे लेकिन चेन्नई में उनकी बात करने की हिम्मत नहीं होती थी। एलांगोवन के मुताबिक, 'एआईएडीएमके नेताओं में जयललिता का इतना खौफ था कि दिल्ली से चेन्नई के हवाई जहाज में तो वे लोग हमसे बात करते थे लेकिन चेन्नई में कदम रखते ही हमारे बगल से भी नहीं गुजरते थे।' 

साल 2016 में हुई बदलाव की शुरुआत

बहरहाल, इस माहौल में बदलाव की शुरुआत तब हुई जब साल 2016 में जयललिता के शपथग्रहण समारोह में स्टालिन ने हिस्सा लिया। वह भी तब, जब डीएमके के तमाम विधायकों ने समारोह का बहिष्कार किया था। हालांकि बाद में करुणानिधि ने आरोप लगाया कि जयललिता ने उनके बेटे को 16वीं पंक्ति में बैठा कर अपमानित किया। लेकिन अगले ही दिन जयललिता ने साफ किया कि यह जानबूझकर नहीं किया गया। अगर उन्हें स्टालिन के आने की जानकारी होती तो वे उन्हें अगली कतार में बैठातीं। 

जयललिता की मौत के बाद कम होता गया तनाव

दिसंबर 2016 में जयललिता की मौत के बाद दोनों दलों के बीच का तनाव कम होता चला गया। उत्तराधिकार की लंबी लड़ाई के बाद पलानिस्वामी मुख्यमंत्री बने। पार्टी की कमान उनके और पनीरसेल्वम के हाथों में रही। वरिष्ठ पत्रकार करुणानिधि दुरई बताते हैं, 'विधानसभा में एक दूसरे की आलोचना करने के बावजूद सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेता बातचीत करते हुए साथ-साथ सदन से बाहर आने लगे। पुराने दौर में कांग्रेस नेता कामराज और डीएमके संस्थापक अन्नादुरई के समय ऐसी स्वस्थ परंपरा थी जिसकी नई सिरे से शुरुआत हो गई।'

मुख्यमंत्री पलानिस्वामी विपक्ष के नेता स्टालिन के नेतृत्व में प्रतिनिधमंडल को मिलने का समय देने लगे। अन्य राज्यों में तो यह सामान्य बात है कि मुख्यमंत्री विपक्ष के प्रतिनिधिमंडल से मिले लेकिन तमिलनाडु में ऐसी तस्वीरें लंबे समय से देखने को नहीं मिली थी। करुणानिधि की तबीयत बिगड़ने पर पनीरसेल्वम के नेतृत्व में एआईएडीएमके के मंत्री उनके घर गए। 

करुणानिधि के शव को मरीना बीच पर दफनाने को लेकर हुआ विवाद

हालांकि रिश्ते ठीक करने की कोशिशों को तब झटका लगा जब अगस्त 2018 में करुणानिधि के देहांत के बाद एआईएडीएमके सरकार ने नए पर्यावरण नियमों का हवाला देकर उनके पार्थिव शरीर को मरीना बीच पर पूर्व मुख्यमंत्रियों की समाधि के साथ दफन करने की अनुमति नहीं दी। डीएमके ने मद्रास उच्च न्यायालय का रुख किया और अदालत की हरी झंडी मिलने के बाद सरकार ने इसकी इजाजत दी।  

जानकार मानते हैं कि स्टालिन में प्रतिशोध की भावना नहीं है, साथ ही पलानिस्वामी और पनीरसेल्वम भी नरम मिजाज के हैं। चुनावी बिगुल बजने से कुछ महीने पहले ही बीते साल अक्टूबर में स्टालिन ने पलानिस्वामी की मां की याद में आयोजित सेवा कार्यक्रम में शिरकत की थी। 

'अम्मा कैंटीन' के पोस्ट फाड़ने वालों को स्टालिन ने किया पार्टी से बाहर

मंगलवार को कुछ डीएमके कार्यकर्ताओं ने चेन्नई में एक 'अम्मा कैंटीन' के बैनर को फाड़ दिया था। इस घटना पर तत्काल कार्रवाई करते हुए स्टालिन ने न केवल अपने नेताओं को बैनर ठीक करवाने के निर्देश दिए बल्कि आरोपी दो कार्यकर्ताओं को पार्टी से निकाल दिया। चेन्नई की महापौर और डीएमके की नवनिर्वाचित विधायक एम सुब्रमनियम ने इसकी जानकारी दी। आपको बता दें कि 'अम्मा कैंटीन' योजना की शुरुआत 2013 में मुख्यमंत्री जयललिता ने गरीबों को खाना खिलाने के लिए की थी।  

भावी मुख्यमंत्री और नेता विपक्ष का एक दूसरे के प्रति सौहार्द्रपूर्ण संवाद बताता है कि नेताओं की नई पीढ़ी निजी रंजिशों से भरे नफरत के अतीत को भुला कर एक स्वस्थ माहौल बना रहे हैं। 

शुरू होगा टकराव का नया अध्याय?

हालांकि डीएमके ने अपने घोषणापत्र में ऐलान किया हुआ है कि सरकार बनने पर एआईएडीएमके सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों की जांच के लिए विशेष अदालत बनाई जाएगी। इससे पहले स्टालिन ने राज्यपाल बनवारीलाल पुरोहित को शिकायत देकर तब के मुख्यमंत्री पलानिस्वामी और पनीरसेल्वम समेत अन्य मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगाए थे। स्टालिन ने जयललिता की मौत की जांच में तेजी लाने का वादा भी किया था। ऐसे में देखना होगा कि सरकार बनने के बाद अपने इन घोषणाओं को लेकर डीएमके का रुख क्या रहता है क्योंकि ये ऐसे मुद्दे हैं जिनसे दोनों दलों के बीच टकराव का नया अध्याय शुरू हो सकता है।

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  • Web Title:Palaniswami and MK Stalin are charting a refreshing and respectful political rivalry in Tamilnadu which has been governed by bitterness animosity for more than 50 years