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24 सितम्बर, 2020|3:06|IST

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इतिहास के पन्नों से : आजादी के बाद पहले चुनाव में ही जाति व पैसे का बोलबाला

राजनीति में शूचिता शुरू से बड़ा सवाल है। आजादी के बाद देश के पहले आम चुनाव में ही कई जगह जाति और पैसे का खेल शुरू हो गया था। कई उद्धरण मिलते हैं। वर्ष 1951-52 में लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए गए थे। कलम के जादूगर एवं समाजवादी राजनेता रामबृक्ष बेनीपुरी को सोशलिस्ट पार्टी ने मुजफ्फरपुर के कटरा से उम्मीदवार बनाया था। उन्होंने अपनी डायरी में चुनाव अभियान पर बेबाक लिखा है। पहले चुनाव में अपनी हार के लिए उन्होंने बेइमानी और गड़बड़ियों की चर्चा की है। आगे वे 1957 के चुनाव में विधायक निर्वाचित हुए।
चुनाव अभियान पर निकले  बेनीपुरी औराई प्रखंड के अतरार गांव में 25 दिसंबर 1951 को लिखते हैं- ‘लोगों ने तरह-तरह के नारे गढ़ लिए हैं- इन्कलाब जिंदाबाद, सोशलिस्ट पार्टी जिंदाबाद, मांग रहा है हिन्दुस्तान, रोटी कपड़ा और मकान।’ बेनीपुरी जी उसी दिन आगे लिखते हुए जन वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार और गरीबी पर प्रकाश डालते हैं- ‘कंट्रोल वहीं सफल हो सकता है, जहां लोगों में ईमानदारी हो और शासकों में दृढ़ता। यहां दोनों का अभाव। लोग रो-रोकर बताते हैं किस तरह कपड़े, चीनी, अन्न, सब में बेइमानियां होती हैं। एक गांव में लोगों ने बताया, लोग कपड़े के अभाव में टाट ओढ़ते हैं। एक बूढ़े सज्जन कह रहे थे, किस तरह उनके पोते के जनेऊ में चीनी मिला न कपड़ा! चंपारण से ब्लैक मार्केट से चीनी मंगवाई और नेपाल से कपड़ा। एक हल्के के लोगों ने बताया कि जब अमेरिका से गेहूं आया तो उन लोगों के गांव में एक छटांक भी नहीं आने दिया गया। लोगों को सदा ब्लैक की ही शरण लेनी पड़ी।’
मेरे साथ रहकर भी जाति वाले की ओर झुकाव
बेनीपुरी 4 जनवरी 1952 को औराई में लिखते हैं- ‘मुझे मालूम नहीं था कि मेरे थाने में भी यह जहर फैल चुका है। जहां-जहां जाता हूं, पिछड़ी जाति वाले शंका की दृष्टि से ही देखते हैं और ‘दानीलाल’ जी के कहने पर वोट देने को भी तैयार हो जाते हैं।  किन्तु, उनका पार्लियामेंट का वोट भी सोशलिस्ट पार्टी को ही मिलेगा, इसमें शक है। एक व्यक्ति पार्लियामेंट के लिए खड़ा है, जो पिछड़ी जाति का है। मैं देख रहा हूं, पिछड़ी जाति के जो लोग मेरे साथ हैं, उनमें से भी अधिकांश पार्लियामेंट के लिए उसी के हामी हैं!  

रुपयों के बल अब पार्टी को हराने पर तुला
 पैसे वाले जीप पर प्रचार करने निकलते थे तो बेनीपुरी औन उनकी पार्टी के अन्य प्रत्याशी साइकिल और बैलगाड़ी से निकलते थे। कटरा के धनौर गांव में बेनीपुरी 31 दिसंबर 1951 को लिखते हैं- ‘इस क्षेत्र की बुरी बात यह रही कि वह सेठ भी पार्टी का मेंबर था, हमारी पार्टी के कुछ कार्यकर्ताओं को पैसे के बल से मुट्ठी में किया था, जब हमने उसे उम्मीदवार नहीं चुना, वह रुपयों के बल अब पार्टी को हराने पर तुला है।’

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  • Web Title:From the pages of history: caste and money dominated the first election after independence