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बिहार चुनाव 2020'का बा' vs 'सब बा' : नए सितारों के बदली इस बार चुनावी धुन

आशीष कुमार मिश्र ,पटनाPublished By: Amit Gupta
Tue, 20 Oct 2020 11:47 AM
'का बा' vs 'सब बा' : नए सितारों के बदली इस बार चुनावी धुन

कोरोना काल की चुनौतियों के बीच हो रहे बिहार विधानसभा चुनाव में लौटा है तो गीतों से प्रचार का दौर। तीन- चार दशक पहले उम्मीदवार और उनके समर्थन में चौक-चौराहों-चौपालों पर गीत गूंजते रहते थे। बीच के दौर में गायकों की मांग कम हुई और उनकी जगह ले ली सिनेमा के अभिनेताओं ने। शत्रुघ्न सिन्हा के डायलॉग 'खामोश' और हेमा मालिनी की 'चल धन्नो' से वोटरों का एक तरह से मनोरंजन होने लगा। इसबार के बिहार चुनाव ने आवाज-सुरों के गुमनाम बिहारी सितारों को उभरने का मौका दिया है। सभी दलों में एक तरह से गीतों से प्रचार की होड़ सी है। इस होड़ ने कई अनाम-गुमनाम गीत लेखकों व गायकों को स्टार के रूप में चमकने का मौका दे दिया है। 

'बिहार में का बा', 'ई बा' से 'तरक्की दिखती है' तक 
नेहा राठौड़ के 'का बा' के जादू ने गीतों से प्रचार के लिए सियासी दलों को प्रेरित किया। सत्तापक्ष ने भी 'बिहार में का बा' के जवाब में कई गीत तैयार कराए। विपक्ष ने भी नेहा के गीत को लपक लिया। अब तरह-तरह के चुनावी गीतों की पैरोडी बिहार की विभिन्न भाषाओं में टोलों, मुहल्लों में गूंज रहे हैं। 'बिहार में का बा' से रातों-रात सुपर स्टार हुई नेहा के भोजपूरी गीत का जवाब मैथिली भाषा में चर्चित युवा गायिक मैथिली ठाकुर ने दिया- 'बिहार में, मिथिला में की नई अछि।' जदयू ने अपने सोशल प्लेटफार्म पर इस गीत को टैग कर दिया। फिर चर्चित लोकगायक सत्येन्द्र संगीत के गीत को मुख्यमंत्री ने लॉन्च किया-'तरक्की दिखती है'। सत्येन्द्र जदयू सांस्कृतिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष भी हैं। भाजपा ने 'का बा' के जवाब में गीत उतारा-रुक, बताव तानी का बा। राजद के गीत के बोल हैं 'बिहार तेजस्वी भव:'। गीतों से चुनाव प्रचार के इस दौर ने वैसे गायकों को भी मंच दिया, जिनकी आवाज तो दमदार थी, लेकिन उन्हें मौका नहीं मिला था। ऐसे गायकों के गीत के सहारे मैदान में उतरे दल भी पूछे जाने पर उनके नाम नहीं बता पा रहे। अपने गीत 'मोदी जी की लहर-लहर, आवे दूर-दूर से नजर-नजर' के साथ, भोजपुरी स्टार दिनेश लाल यादव निरहुआ जैसे नाम भी इस दौड़ में हैं।

गायकों की चमक में सिने स्टारों की मांग फीकी 
तीन दशक पहले राजनीति में सिनेस्टारों की मांग बिहार समेत देशभर में अचानक से बढ़ी। बिहार भी इससे अछूता नहीं रहा। फिर चुनावी सभाओं में शत्रुघ्न  सिन्हा का 'खामोश' और हेमा मालिनी का 'चल धन्नो' तो धर्मेन्द्र का 'बसंती, इन कुत्तों के सामने मत नाचना' जैसे डायलॉग भीड़ बटोरने लगे। वोट जुगाड़ने का जरिया बने। धर्मेन्द्र, स्व. विनोद खन्ना, हेमा मालिनी, जया प्रदा, राजबब्बर, नगमा, शेखर सुमन, जावेद अख्तर, शबाना आजमी, मनोज तिवारी, रवि किशन, स्वरा भाष्कर, प्रकाश राज सरीखे सिनेस्टार बिहार के कस्बों तक पहुंचे। बाद में शत्रुघ्न  सिन्हा समेत ज्यादातर खुद राजनेता बन गए। मनोज तिवारी इस चुनाव में भी सक्रिय हैं। हालांकि कोरोना काल के चुनाव में उपजे गीतों के नए स्टारों की चमक ने सिनेस्टारों की धमक फीकी कर दी है। अब तक न कहीं से किसी की मांग है न किसी का कार्यक्रम लगा है। 

रघुवीर नारायण का रचा 'बटोहिया' गीत आजादी की लड़ाई का संबल बना 
आजादी की लड़ाई हो या कोई अन्य आंदोलन, बिहार में गीत और नारों की रचना का सुदीर्घ इतिहास रहा है। राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से स्वतंत्रता सेनानी रघुवीर नारायण ने 'बटोहिया' गीत रचा। पूर्वी धुन में रचित इसके बोल थे-'सुन्दर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोरे प्रान बसे हिम खोह रे बटोहिया..।' इस गीत को पूर्व भारत में वंदे मातरम् के बराबर न सिर्फ सम्मान मिला, बल्कि यह स्वतंत्रता की लड़ाई में जन जागरण गीत की तरह गया गया। सम्पूर्ण क्रांति आंदोलन हो या इमरजेंसी, बिहार में एक से बढ़कर एक गीत रचे गए, नारे बने, कविताएं लिखी गईं और लोकप्रिय हुईं। राष्ट्रकवि दिनकर की वह पंक्ति कौन भूल सकता है-सिंहासन खाली करो कि जनता आती है। जनकवि नागार्जुन ने लिखा-इंदू जी, इंदू जी क्या हुआ आपको..। 'आओ रानी हम ढोयेंगे पालकी..' और 'ये लाल, वो लाल, क्या लाल, क्या लाल'। 

सन् 60 के बाद गीतों ने पकड़ा जोर 
सन् 60' के बाद के चुनाव से ही गीतों और नारों ने जोर पकड़ा। तब सड़कें नहीं थीं। आवागमन के साधन भी नहीं थे। प्रत्याशी पैदल, साइकिल और बैलगाड़ी से प्रचार में आते। फिर इनके रिक्शे घूमने लगे, जिसके पीछे एक भोमा (हॉरन) टंगा होता और चखरी वाले ग्रामोफोन से प्रत्याशी के पक्ष में गीत गूंजते थे। गीत के बीच-बीच में प्रत्याशी के पक्ष में वोट की अपील के नारे सुपर इम्पोज किये होते-फलां भइया मत घबराना, तेरे पीछे सारा जमाना'। बिहार के वयोवृद्ध कथाकार रामधारी सिंह दिवाकर कहते हैं कि सन् 1972 में फणीश्वरनाथ रेणु के चुनाव प्रचार में वे फारबिसगंज विस क्षेत्र में थे। रेणु का नारा था-कह दो गांव-गांव में, अबके इस चुनाव में, वोट देंगे नाव में'। फिर अस्सी के दशक में चुनाव प्रचार का यह दौर सिनेस्टारों की धमक से पीछे छूट गया था, लेकिन कोरोना काल के चुनाव में फिर से तेजी से वह बीता दौर वापस लौटा है। 
 

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