बिहार रिजल्ट : जानें कहां से जीता निर्दलीय प्रत्याशी, 581 वोट से RJD को दिया झटका

बिहार विधानसभा आम चुनाव, 2020 में 243 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनाव के बाद मात्र एक निर्दलीय प्रत्याशी सुमित कुमार सिंह ने चकाई विस निर्वाचन क्षेत्र से राजद की प्रत्याशी सावित्री देवी को...

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Amit Gupta हिन्दुस्तान ब्यूरो , पटना
Last Modified: Wed, 11 Nov 2020 9:43 AM

बिहार विधानसभा आम चुनाव, 2020 में 243 विधानसभा सीटों के लिए हुए चुनाव के बाद मात्र एक निर्दलीय प्रत्याशी सुमित कुमार सिंह ने चकाई विस निर्वाचन क्षेत्र से राजद की प्रत्याशी सावित्री देवी को 581 वोटों से हराया। 

राज्य के चुनाव में निर्दलीय प्रत्याशियों का हस्तेक्षप बिल्कुल घट गया। कभी एक चौथाई वोट पर निर्दलीय प्रत्याशियों का कब्जा हुआ करता था। सबसे अधिक 1990 में 41 उम्मीदवार जीते थे। पिछले दो चुनावों से इनकी संख्या घटी लेकिन वोट प्रतिशत बहुत नहीं गिरा। पिछले तीन दशक के चुनावों पर नजर डालें तो हर बार ऐसे उम्मीदवार 16 से 18 प्रतिशत तक वोट काट लेते हैं। हालांकि इन वोटों के माध्यम से उनके कुछ उम्मीदवार जीत भी जाते हैं, लेकिन अधिसंख्य क्षेत्रों में ये किसी ना किसी बड़े राजनीतिक दल के उम्मीदवार की जीत व हार को प्रभावित ही करते हैं। कई बार जीत कर आये ऐसे उम्मीदवार सरकार बनाने और किसी का खेल बिगाड़ने में भी प्रमुख भूमिका निभाते हैं। राज्य के हाल के चुनावों में ऐसे उम्मीदवारों की संख्या कुछ बढ़ी, लेकिन इनके जीतने की संख्या कम हुई है। इसका कारण वोटों का दलीय घ्रुवीकरण है। सबसे अधिक 1990 के चुनाव में ऐसे 41 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। इसमें गैर मान्यताप्राप्त दलों के 11 और निर्दलीय 30 उम्मीदवार जीते थे। तब इन उम्मीदवारों ने लगभग 24 प्रतिशत वोट पर कब्जा जमा लिया था। उस चुनाव में आईपीएफ (वर्तमान में माले) भी गैर मान्याता प्राप्त राजनीतिक दल था और उसके सात उम्मीदवार चुनाव जीते थे। 

इसी तरह 1995 के चुनाव में ऐसे 32 उम्मीदवरों ने जीत हासिल की थी। उस समय गैर मान्यता प्राप्त 38 दल मैदान में थे। इनके 896 में 20 उम्मीदवार जीत गये थे। निर्दलीय 5674 उम्मीदवारों में 12 ने जीत हासिल की थी। उस साल इन उम्मीदवारों को कुल 28 प्रतिशत वोट मिले थे। माले को 8.25 तो बीपीपा को लगभग चार प्रतिशत वोट मिले थे। वर्ष 2000 के चुनाव से ऐसे जीतने वाले उम्मीदवारों की संख्या कम होने लगी। उस चुनाव में गैर मान्यता प्राप्त और निर्दलीय मिलाकर कुल 23 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की उसमें निर्दलीय की संख्या 20 थी। 2005 के अक्टूबर चुनाव में इनके विधायकों की संख्या मात्र 11 पर सिमट गई। इसमें केवल दस निर्दलीय उम्मीदवार ही जीते। 2010 के चुनाव में वोटरों की गोलबंदी ने ऐसे उम्मीदवारों का हस्तक्षेप कम कर दिया और मात्र छह निर्दलीय उम्मीदवार ही चुनाव जीत सके। एक भी गैर मान्यता प्राप्त दल का प्रतिनिधि विधानसभा नहीं पहुंचा। लेकिन इनका वोट प्रतिशत तब भी लगभग 17 प्रतिशत था। पिछले चुनाव यानी 2015 पर नजर डालें तो इनका हस्तक्षेप और घटा। निर्दलीय और गैर मान्यता प्राप्त दल दोनों को चार -सार सीटें मिली और इनका वोट प्रतिशत एक बार फिर 17 प्रतिशत ही रहा। निर्दलीय लड़ने वालों में कई बड़े नेता तो बागी भी निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरने वाले नेताओं में कई बड़े चेहरे भी शामिल होते हैं। इसके अलावा दलों से टिकट नहीं मिलने पर बागी बनकर भी कई नेता निर्दलीय चुनाव मैदान में उतरते हैं। इनमें अधिसंख्य नेता चुनाव जीतने के बाद फिर किसी ना किसी दल में शामिल हो जाते हैं। 

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