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10 नवंबर, 2020|7:43|IST

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बिहार के चुनावी अखाड़े में उतरे इन युवाओं का राजनीति के पुराने खिलाड़ियों से होगा मुकाबला

राजनीति अब युवाओं को भी लुभाने लगी है। कारण चाहे जो हो, लेकिन अधिकतर युवा प्रत्याशियों का कहना है कि इसमें लोगों की सेवा का अवसर अधिक है। उनके लिए कुछ करने और समाज में बदलाव लाने का जरिया है राजनीति। मौजूदा विधानसभा चुनाव में खड़े कई ऐसे युवा हैं, जिनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है, लेकिन वह चुनावी मैदान में डंटे हैं। उन्हें इसकी कोई परवाह नहीं कि बड़े राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों के सामने टिक पाएंगे या नहीं। कुछ कर दिखाने के लिए वह भी उतने ही जोश-ओ-खरोश के साथ मैदान में है, जितने बडे़ दलों के उम्मीदवार। 

श्रेयसी सिंह (जमुई, भाजपा): पिता के अधूरे सपनों को पूरा करूंगी
जमुई सीट से निशानेबाज श्रेयसी सिंह भाजपा से चुनाव मैदान में हैं। उनके पिता स्व. दिग्विजय सिंह केंद्रीय मंत्री व मां पुतुल कुमारी सांसद रही हैं। पारिवारिक पृष्ठभूमि राजनीतिक होने के कारण वह एमबीए करने के बावजूद राजनीति से जुड़ीं और पिता के अधूरे काम को पूरा करने व जमुई के विकास के लिए राजनीति में आई हैं। वह कहती हैं कि युवाओं को रोजगार के लिए संसाधन उपलब्ध कराना उनका संकल्प है। वहीं, जमुई सीट से ही निर्दलीय सुजाता सिंह चुनाव मैदान में हैं। वे क्षेत्र के विकास और सेवा करने की भावना के साथ राजनीति में आई हैं। वह अंग्रेजी से स्नातक हैं। इनकी कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं रही हैं। इनके पति भी समाज सेवा से जुड़े हैं। इनका कहना है कि समय के साथ युवाओं को राजनीति में आने की जरूरत है। बड़ी पार्टियों के उम्मीदवारों के सामने अपनी मौजूदगी के बारे में कहती हैं कि इच्छाशक्ति से सब कुछ संभव है।  

लव सिन्हा (बांकीपुर, कांग्रेस): बेरोजगारी और अशिक्षा कचोटती है 
बांकीपुर से कांग्रेस के टिकट पर भाग्य आजमा रहे लव सिन्हा के अनुसार बेरोजगारी और अशिक्षा उन्हें कचोटती है। इस मुद्दे पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। उनके अनुसार राजनीति में युवाओं और महिलाओं को समान भागीदारी मिलनी चाहिए। कहा, पार्टी के निर्देश पर चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। उनकी मां पूनम सिन्हा व पिता शत्रुघ्न   सिन्हा भी कांग्रेस में हैं। उन्होंने स्नातक तक पढ़ाई की है। 

पुष्पम प्रिया (बांकीपुर, द प्लुरल्स): राजनीति केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं
द प्लुरल्स पार्टी की अध्यक्ष पुष्पम प्रिया पहली बार चुनाव में खड़ी हुई है। द लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एंड पॉलिटिकल साइंस से मास्टर ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की डिग्री ले चुकी 33 वर्षीय पुष्पम की मानें तो उनका परिवार राजनीति से पहले से जुड़ा रहा है। उन्होंने बताया कि दादा प्रो. उमाकांत चौधरी समता पार्टी से जुड़े थे। पापा विनोद कुमार चौधरी जदयू के एमएलसी रहे हैं। राजनीति पर पुष्पम प्रिया कहती हैं कि राजनीति केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है, जनता जो जिम्मेवारी देती है, उसे पूरा करने की है।  

विकास कुमार (अरवल, निर्दलीय): गरीबों का दुख देख राजनीति में आया
इंटर पास विकास कुमार ने गरीब-गुरबों की तकलीफ देख राजनीति में आने का मन बनाया। वे कहते हैं कि कल्याणकारी योजनाओं का लाभ गरीबों को मिलने में काफी कठिनाई होती है। उन्हें मुख्य धारा में शामिल करने के लिए ही वे चुनाव में कूदे हैं। उनके परिवार में किसी का भी राजनीति से दूर-दूर का वास्ता नहीं है। अन्य गरीबों को साथ लेकर चुनाव प्रचार में उतरे हुए हैं। गांव-गांव जाते हैं और लोगों से उन्हें वोट देने की अपील कर रहे हैं।  राजनीति का उद्देश्य धन व प्रतिष्ठा कमाना नहीं बल्कि गरीबों के जीवन में सुधार लाना है। 

सुमित कुमार (चेरियाबरियारपुर): जनता के लिए युवा व शिक्षित आगे आएं
चेरियाबरियारपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव मैदान में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में 33 वर्षीय सुमित कुमार चुनावी मैदान में हैं। मुजफ्फरपुर मेडिकल कॉलेज से बीएमएस कर चुके सुमित कुमार कहते हैं कि राजनीति में उनके घर में पहले से कोई नहीं जुड़ा हुआ है। राजनीति में पप्पू यादव के प्रभाव से आए। युवाओं, शिक्षितों को इस क्षेत्र में आने की जरूरत है ताकि जनता की समस्याओं के निदान के लिए काम कर सकें। 

शहजादुज्जमा (साहेबपुरकमाल): जरूरतमदों के हक के लिए चुनाव में
साहेबपुरकमाल विधानसभा से 30 से 40 वर्ष के बीच के तीन युवा उम्मीदवार भी शामिल हैं। इन तीन उम्मीदवारों में से दो दलीय एवं एक निर्दलीय हैं। निर्दलीय उम्मीदवार 30 वर्षीय शहजादुज्जमा उर्फ सैफी पेशे से अधिवक्ता हैं। उनका परिवारिक इतिहास भी राजनीति से नहीं रहा है।बताया कि सरकार की योजनाओं का लाभ जरूरतमंदों को नहीं मिल रहा है। गरीबों को हक दिलाने के लिए राजनीति में आया है। 

ममता देवी (हरनौत, लोजपा): महिला विकास की धूरी, बनाएंगी सशक्त
स्नातक उत्तीर्ण ममता देवी लोक जनशक्ति पार्टी के प्रत्याशी के तौर पर हरनौत विधान सभा क्षेत्र से खड़ी हैं। उनका मानना है कि लोग विकास की दौड़ में महिलाओं को भूल जाते हैं पर महिला किसी भी क्षेत्र में पुरुष से कम नहीं हैं। महिला ही विकास की धूरी हैं। अगर महिलाएं शिक्षित व सशक्त हो जायें तो विकास गति स्वभाविक तौर से तेज हो जाएगी।2016 से राजनीति में सक्रिय हैं। प्रेरणा ससुर जनक किशोर प्रसाद से मिली। 

संजीव कुमार सिंह (औरंगाबाद, निर्दलीय): राजनीति अब घन-बल के लिए हो गई है
समस्याओं के निराकरण का प्रयास करते हुए संजीव कुमार सिंह चुनाव में उतर गए। वह गोकुल सेना नाम के सामाजिक संगठन के अध्यक्ष रहे और संगठन के निर्णय पर औरंगाबाद से निर्दलीय चुनाव लड़ रहे हैं। विभिन्न मुद्दों पर संघर्ष करने वाले संजीव के राजनीतिक जीवन में यह पहला चुनाव है। उन्होंने बताया कि अब राजनीति धन बल की हो गई है। अच्छे लोग इसमें नहीं आना चाह रहे हैं। ये स्नातक पास हैं।

डॉ. धर्मवीर कुमार (मोकामा, निर्दलीय): लोगों के आग्रह पर राजनीति में आया
पेशे से डेंटिस्ट डॉ. धर्मवीर कुमार पिछले कई वर्षों से मोकामा में सक्रिय हैं। स्वास्थ्य शिविर लगाकर लोगों की सेवा कर रहे हैं। कहते हैं लोगों ने मुझसे राजनीति में आने का आग्रह किया। उनके आग्रह पर ही वह मोकामा से निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में चुनाव लड़ रहे हैं। मोकामा क्षेत्र में 60-70 ऐसे गांव हैं जहां कोई विकास नहीं हुआ है। कारण यह इलाका टाल क्षेत्र है। वर्तमान विधायक इसपर ध्यान नहीं देते हैं। उनकी पहली प्राथमिकता स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में सुधार है। साथ ही मुख्यमंत्री के सात निश्चय योजना को भी इलाके में सही तरीके से क्रियान्वित कराने की मंशा रखते हैं। 

रंधीर केसरी (गया, रालोसपा): शिक्षा व व्यवस्था में सुधार की जरूरत 
व्यवसायी वर्ग से होने के बाद भी राजनीति का क्षेत्र चुना। खराब सिस्टम और लचर शिक्षा व्यवस्था को देखकर राजनीति में आने की इच्छा हुई। दूसरों की मदद करना आदत में शुमार है, एक कारण यह भी। यह कहना है गया विधानसभा क्षेत्र से रालोसपा के प्रत्याशी 32 वर्षीय ग्रेजुएट रंधीर कुमार केसरी का। रंधीर कहते हैं कि राजनीति में शिक्षित, स्वच्छ छवि वालों को होना चाहिए। आज, राजनीति की तस्वीर बदली हुई है। अच्छे लोगों की जरूरत है। गया शहर में जाम, जलजमाव, साफ-सफाई, पेयजल जैसी बुनियादी समस्याएं देखकर मन दु:खी रहता है। समस्याएं दूर करने व समाजसेवा की भावना से चुनाव मैदान में हूं। जीत मिलती है तो समस्याएं दूर करूंगा। होम्योपैथिक दवा के व्यवसाय से जुड़े  रंधीर केसरी के परिवार के किसी का भी राजनीति से जुड़ाव नहीं है। पिता व भाई सभी बिजनेस में हैं। कहते हैं सुधार का संकल्प उन्हें बड़े दलों के प्रत्याशियों से लड़ने की हिम्मत दे रहा है।  

राजेश वर्मा (भागलपुर, लोजपा): स्वच्छ छवि वाले प्रत्याशियों की जरूरत
भागलपुर से लोजपा के टिकट पर राजेश वर्मा चुनाव मैदान में हैं। वे अभी भागलपुर के डिप्टी मेयर हैं। उनका परिवार आभूषण कारोबार से जुड़ा है। इनकी कोई  राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं रही है। वे शहर का विकास करने व लोगों की सेवा करने की उद्देश्य से राजनीति में आए हैं। उनका मानना है कि पढ़े-लिखे व स्वच्छ छवि के लोगों को राजनीति में आना चाहिए। वे खुद बीटेक पास हैं।  

सत्येंद्र बहादुर (बाढ़, कांग्रेस): बचपन से ही समाज सेवा का था शौक 
बाढ़ से कांग्रेस प्रत्याशी सत्येंद्र बहादुर कहते हैं कि बचपन से ही  लोगों की मदद और सेवा करने का शौक है। स्र्कूंलग के समय से ही कांग्रेस पार्टी के प्रति मेरा झुकाव था। कॉलेज में आते ही एनएसयूआई संगठन से जुड़ा। फिर स्नातकोत्तर करने के दौरान यूनिवर्सिटी के छात्रों  की समस्याओं को प्रमुखता से उठाया। अब बाढ़ की जनता की सेवा में जुटा हूं।  लोगों की सेवा और पार्टी में सक्रिय भूमिका निभा रहा हूं। अब जनता  के हाथों में  सब कुछ है। अगर वह हमें सेवा का मौका देगी तो एक प्रतिनिधि के तौर पर  हमेशा उनके सुख-दुख का साथी बना रहूंगा।

रवि पांडेय (कुचायकोट, लोजपा): स्वच्छ छवि व शिक्षित वाले लड़े चुनाव
लोजपा के 34 वर्षीय युवा प्रत्याशी रवि पांडेय दूसरी बार विधानसभा के चुनावी दंगल में उतरे हैं। इसके पहले सीवान के जीरादेई से चुनाव लड़ चुके हैं। स्वतंत्रता सेनानी व अखिल भारतीय स्वतंत्रता सेनानी के अध्यक्ष रहे अपने पिता स्व. गौरीशंकर पांडेय के आदर्शों से प्रेरित होकर राजनीति में कदम रखा है। श्री पांडेय कहते हैं कि राजनीति में स्वच्छ छवि व पढ़े लिखे लोगों के आने से नई परंपरा की शुरुआत होगी। समाज व देश का विकास होगा।   कोई राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं रही है। श्री पाण्डेय ने इंजीनिर्यंरग की पढ़ाई की है।  

अनुराग सिंह (दरौंदा, निर्दलीय): नौकरी छोड़कर लड़ रहे निर्दलीय
दरौंदा विधानसभा से निर्दल युवा प्रत्याशी अनुराग सिंह अन्य प्रत्याशियों को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। एमबीए हैं और राजनीति विरासत में मिली है। उन्होंने बताया कि राजनीति में आने से पहले वे नौकरी में थे।  उन्हें एक बड़ी कंपनी का मैर्नेंजग डायरेक्टर पद व सुख सुविधा रास नहीं आता था।उन्होंने नौकरी छोड़ने का मन बना लिया। पिता स्व. उमाशंकर्र ंसह तीस वर्ष तक विधायक रहे जबकि 2009 में एक बार महाराजगंज संसदीय क्षेत्र से सांसद भी रहे। भाई जितेंद्र स्वामी भी एक कुशल राजनीतिज्ञ हैं और कई चुनाव लड़ चुके हैं। 

शबाना (आरा, निर्दलीय): लोगों के चंदे से लड़ रही हूं चुनाव
आरा विधानसभा क्षेत्र की 31 वर्षीया निर्दलीय प्रत्याशी शबाना ग्रेजुएट हैं। पति कैशर जमाल अखिल भारतीय शॉ अल्वी समाज के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। भोजपुर निवासी शबना आरा शहर से भी जुड़ाव रखती हैं और उनका यहां ननिहाल है। कहती हैं कि चुनाव में उतरने का उद्देश्य आरा का विकास, रोजगार, शिक्षा व महिला सुरक्षा पर ध्यान देना है। दलीय प्रत्याशियों के मुकाबले की बाबत कहती हैं कि उन्हें समाज के विभिन्न लोगों से समर्थन के साथ चंदा भी मिल रहा है। इसी से खर्च कर वे चुनाव लड़ रही हैं। वे सघन जनसंपर्क अभियान चला रही हैं।

उज्जवल चौबे (भभुआ, निर्दलीय)
समाज के उत्थान व भ्रष्टाचार के खात्मा के लिए कैमूर में कई युवा प्रत्याशी चुनाव में ताल ठोंक रहे हैं। इनमें एलएलबी पास उज्जवल कुमार चौबे भभुआ विस से । ताल ठोक रहे हैं। उन्होंने कहा कि समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार  अफसरशाही के खात्मा और सरकार की कल्याणकारी योजनाओं को आमजनों तक समय से पहुंचाने का मुद्दा बना चुनाव लड़ रहे हैं। परविार में कोई राजनीतिक व्यक्ति नहीं है। 

मिन्नत रहमानी (सुपौल, कांग्रेस)
कांग्रेस के उम्मीदवार मिन्नत रहमानी क्षेत्र की स्थानीय समस्याओं को दूर करने के लिए राजनीति में आए हैं। उनका कहना है कि तटबंध के अंदर रहने वाले लोगों की परेशानी का वह खुद उदाहरण हैं। उन्होंने कहा कि एक व्यक्ति किसी समस्या का समाधान नहीं कर सकता। जनप्रतिनिधि समूह का नेतृत्व करते हैं, इसलिए वह राजनीति में आए। मिन्नत रहमानी दिल्ली विश्वविद्यालय से कम्प्यूटर साइंस में डिप्लोमा किए हुए हैं। इनके परिवार में किसी की राजनीतिक पृष्ठभूमि नहीं है।  

मृत्युंजय सिंह (वजीरगंज, शिवसेना)
ग्रेजुएट मृत्युंजय सिंह बारहवीं से ही छात्र राजनीति से जुड़े रहे हैं। वे कहते हैं किलॉकडाउन के दौरान मजदूरों की दुर्दशा देखी तो मेरा दिल दहल गया और मैंने चुनाव लड़ने का फैसला लिया। राजनीति को लोगों ने गलत बना दिया जो सही नहीं है। मेरे नजरिये से कुर्सी पर बैठने वाले जनप्रतिनिधियों को आम जनता का दु:ख दर्द समझकर उचित फैसला लेना चाहिए। भ्रष्टाचार चरम पर है। अभी तक मेरे परिवार में किसी ने भी राजनीति में कदम नहीं रखा है, मैं परिवार का पहला सदस्य हूं जो चुनाव में उतरा हूँ। मैंने नामांकन करने से पूर्व बड़े दलों के बारे में सोचा, लेकिन बिना लड़े मैं हार नहीं मान सकता हूँ।

नीरज पांडेय (चैनपुर, निर्दलीय)
हम जात पात से ऊपर उठकर हर वर्ग के लोगों को माला की तरह पिरोकर सामाजिक समरसता को कायम रखने व क्षेत्र के समुचित विकास के लिए वोटरों के कहने पर चुनाव लड़ रहा हूं। स्नातक उत्तीर्ण हूं और सड़क, शिक्षार्, ंसचाई व अन्य बुनियादी समस्याओं का सामाधान करूंगा। मेरा कोई राजनीतिक परिवेश नहीं है। राजीनीति में युवा और शिक्षित लोग आकर ही अमूलचूल परिवर्तन ला सकते हैं।

सुरेन्द्र राम (हथुआ,  भाएद)
राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के गृह विधानसभा क्षेत्र हथुआ से इस बार सोशल वर्कर व भारतीय एकता दल के राष्ट्रीय महासचिव सुरेन्द्र राम चुनाव लड़ रहे है। वह उचकागांव के जमसड़ी गांव के हैं। फिलहाल वह पटना में रहते हैं। भारतीय एकता दल के पूर्व वह एक बार विस चुनाव स्वतंत्र रूप से भी लड़ चुके हैं।  नौवी पास 37 वर्षीय सुरेन्द्र कहते हैं कि खर्चीला चुनाव भ्रष्टाचार का जड़ है। इसको रोकना होगा। तभी स्वच्छ चुनाव होगा। भ्रष्टाचार को दूर कर समाज में बदलाव लाने के उद्देश्य से वे जनप्रतिनिधि बनना चाहते हैं।  इनकी सोच है कि क्षेत्र में उद्योग -धंधे लगने से लोगों को रोजगार मिलेगा। इसलिए वह जीतने के बाद बंद चीनी फैक्ट्री को चालू करने का काम करेंगे।

संजय कुमार (जहानाबाद, निर्दलीय)
निर्दलीय प्रत्याशी संजय कुमार कई शिक्षण संस्थानों के संचालक हैं। पिता डॉ. चंद्रिका प्रसाद यादव ने वर्ष 1977 में कांग्रेस से जहानाबाद लोस क्षेत्र से चुनाव लड़ा था। ऐसे में परिवार में राजनीतिक माहौल रहने के कारण संजय ने भी चुनावी राजनीति में किस्मत आजमाने का निर्णय लिया। संजय कहते हैं कि राजनीति देश व समाज को नई और सकारात्मक दिशा देने का जरिया है। स्नातकोत्तर डिग्रीधारी हैं।

माधवी (मांझी, जदयू)
सेवा भाव और राजनीति में दायरा बढ़ाने को लेकर मांझी विस क्षेत्र से चुनाव लड़ रही हूं। बीएड की पढ़ाई पूरी की। स्थानीय अधिकारियों से मिलकर कई समस्याओं का निदान भी कराने में सफल रही हूूं। परिवार में पहले कोई राजनीति से जुड़ा तो नहीं है पर चुनाव लड़ने का फैसला करना पड़ा ताकि जनता की समस्याओं को सदन में उठा सकूं। सरकार पर कारगर तरीके से दबाव डालने को ही चुनाव मैदान में उतरी।

राणा प्रताप सिंह (मांझी, निर्दलीय)
समाज सेवा के उद्देश्य से राजनीति में आया। मांझी विधानसभा क्षेत्र से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव लड़ रहे राणा प्रतार्प ंसह उर्फ डब्ल्यू ने कहा कि राजनीति के बारे में उनका नजरिया पूरी तरह से स्पष्ट है। यह ऐसा क्षेत्र है जहां सड़क से लेकर सदन तक लोगों की समस्याओं को लेकर आवाज उठाई जा सकती है। राजनीति उन्हें विरासत में मिली है। फिलहाल जेपीविवि से रिसर्च के लिए प्रयासरत हैं।

सुगंध कुमार (वैशाली, निर्दलीय)
सबसे कम उम्र के प्रत्याशी माने जा रहे सुगंध कुमार वैशाली के स्थानीय निवासी हैं। किसान परिवार के साथ इंटर तक की पढ़ाई की।  बचपन से ही शिक्षा और स्वास्थ्य की बदहाल व्यवस्था का कारण राजनीति को माना है। ये कहते हैं  कि राजनीति में युवाओं को आना चाहिए, बल्कि मेरा मानना है कि जिस तरह से सरकारी नौकरियों में वीआरएस का प्रवाधान है, वैसे ही राजनीति में भी वीआरएस हो।

राजू गुप्ता (डेहरी, निर्दलीय)
रोहतास जिले के डेहरी विधानसभा क्षेत्र में निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में बीए पास राजू गुप्ता दलीय उम्मीदवारों की तरह मजबूती से प्रचार-प्रसार में जुटे हैं। वे जदयू के प्रदेश संगठन सचिव हैं, पर सीट भाजपा के कोटि में जाने से मैदान में उतरे हैं। सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक के पुत्र राजू गुप्ता ने कहा यदि युवा और शिक्षित लोग चुनाव अखाड़े में आगे नहीं आएंगे तो राजनीति की गंदगी आखिरकार कैसे दूर हो सकेगी।

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