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1 नवंबर, 2020|7:25|IST

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बिहार विधानसभा चुनाव 2020: खिसकते जनाधार को थामने के लिए पहली बार तीनों वाम दल एकजुट

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खिसकते जनाधार ने इस बार वाम दलों को एकजुट कर दिया है। तीनों वाम दल के अलग-अलग किसी अन्य दल के साथ तालमेल का उदाहरण तो पेश किये जा सकते हैं, लेकिन पहली बार तीनों वामपंथी पार्टियां बिहार विधानसभा के इस चुनाव में किसी एक गठबंधन में शामिल हुई हैं। राजद और कांग्रेस ने भी अपनी पुरानी जमीन तलाशने में ही इनका साथ लिया है। 

बिहार के चुनाव में 70 के दशक में उत्कर्ष पर पहुंचने के बाद विधानसभा में वाम दलों की सीटें कम होती गईं। वोट प्रतिशत भी गिरने लगा। उसी कालखंड में सीपीआई के सुनील मुखर्जी बिहार विधानसभा में प्रतिपक्ष के नेता बने थे। तब 1969 और 72 के चुनाव में सीपीआई को 25 और 35 सीटें मिली थीं। सीपीएम को भी सबसे अधिक छह सीटें मिली थीं। उनका वोट प्रतिशत भी दो अंकों में था। 

वर्ष 1990 में जब इंडियन पिपुल्स फ्रंट (आईपीएफ) चुनाव में उतरा तो वाम दलों का बड़ा जनाधार उसकी ओर खिसक गया। वर्ष 1995 के चुनाव में आईपीएफ माले के रूप में चुनाव में उतरा। वह लालू प्रसाद के शासन का दौर था। उन्होंने भी गरीबों के नाम पर राजनीति शुरू की और वामदलों के वोटरों को अपनी ओ खींचने में सफल हो गये। बाद में तो लालू प्रसाद ने वाम दलों को तोड़ भी लिया। माले के तो तीन विधायक भी राजद में चले गये, दूसरी वाम पार्टियों के कई प्रमुख नेता ने भी राजद का दामन थाम लिया। जनाधार खिसकने के बाद से ही तीनों वाम दलों की एकता का लगातार प्रयास होता रहा जो इस बार वर्ष 2020 के चुनाव में जमीन पर उतर सका है।   

वर्ष 1990 के बाद के सभी चुनावों पर नजर डाले तो सबसे अधिक 1990 के चुनाव में 34 सीटें वाम दलों को मिली थीं। सीपीआई ने उस समय 6.59 प्रतिशत वोट पाकर 23 और सीपीएम 1.33 प्रतिशत वोट के साथ छह सीटें जीतीं। माले को 0.17 प्रतिशत वोट मिले और एक भी सीट नहीं मिली। वर्ष 1995 के चुनाव में इनका वोट भी बढ़ा और सीटें भी। सीपीआई को 26 और सीपीएम को छह सीटें मिलीं। वर्ष 2000 के चुनाव में सीपीआई खिसककर पांच और सीपीएम दो सीट पर सिमट गई। लेकिन, तब माले ने छह सीटों पर अपना उम्मीदवार जीता लिया। वर्ष 2005 के अक्टूबर चुनाव में सीपीआई तीन और सीपीएम को मात्र एक सीट पर जीत मिली। लेकिन माले के फिर पांच विधायक सदन में आ गये। वर्ष 2010 के चुनाव में सीपीआई को मात्र एक सीट और सीपीएम जीरो पर आउट हो गई। लेकिन माले फिर इससे अधिक सीट ले गया। पिछले चुनाव में तो सीपीआई और सीपीएम दोनों जीरो पर आउट हो गये लेकिन माले ने अपने तीन विधायक सदन में भेज दिया। 

आंकडों से पता चलता है कि माले के चुनावी राजनीति में आने के बाद दूसरे वाम दलों का आधार क्षीण होता गया। इसी आधार को फिर से पाने की कवायद इस चुनाव में हो रहा है। लेकिन महागठबंधन ने भी इसको भांप लिया है। इसलिए माले महागठबंधन में सबसे अधिक 19 सीट लेने में कामयाब हो गया है। 
 

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  • Web Title:Bihar Assembly Elections 2020 News Update: Left parties united in a Alliance for first time to get his lost mass base