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बिहार चुनाव 2020

बिहार की राजनीति में किस्मत आजमा रहे अधिकारी, कोई मंत्री बने तो किसी की जमानत तक नहीं बची

पटना। हिन्दुस्तान ब्यूरोPublished By: Sunil Abhimanyu
Thu, 24 Sep 2020 02:06 PM
बिहार की राजनीति में किस्मत आजमा रहे अधिकारी, कोई मंत्री बने तो किसी की जमानत तक नहीं बची

इसे पावर का खेल कहें या राजनीति की चाह। अफसरों का लगाव खादी से नया नहीं है। आईएएस से लेकर आईपीएस और आईआरएस सेवा तक के अधिकारी राजनीति में किस्मत आजमाते रहे हैं। सफलता-असफलता की परवाह किए बगैर अरसे से बड़े अधिकारी राजनीतिक अखाड़े में कूदते रहे हैं। कोई सांसद और मंत्री बना तो कोई विधायक तो कइयों को हार से संतोष करना पड़ा। डीजीपी रहे गुप्तेश्वर पाण्डेय की स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद एक बार फिर आला अधिकारियों की राजनीति में दिलचस्पी चर्चा के केन्द्र में है। 

आरके सिंह और ललित विजय सिंह केन्द्र में बने मंत्री
बिहार के दो बड़े अधिकारी राजनीति में न सिर्फ उतरे बल्कि चुनाव जीतकर केन्द्र में मंत्री तक बने। वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और देश के पूर्व कैबिनेट सचिव रहे आरके सिंह केन्द्र में मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) हैं। सेवानिवृत्ति के बाद उन्होंने 2014 में आरा से भाजपा के टिकट पर लोकसभा चुनाव लड़े और जीते। दोबारा उन्होंने 2019 में लोकसभा का चुनाव जीता। इससे पहले आईपीएस अधिकारी रहे ललित विजय सिंह ने जनता दल के टिकट पर बेगूसराय से चुनाव मैदान में उतरे थे। उन्होंने भी जीत हासिल की थी और केन्द्र में राज्यमंत्री बने। पूर्व मुख्यमंत्री सत्येन्द्र नारायण सिन्हा के पुत्र और दिल्ली पुलिस के कमिश्नर रहे निखिल कुमार औरंगाबाद से सांसद रह चुके हैं। बाद में वह राज्यपाल भी रहे। 

मीरा कुमार लोकसभा की स्पीकर बनी
पूर्व उप प्रधानमंत्री जगजीवन राम की पुत्री और आईएफएस अधिकारी रहीं मीरा कुमार की गिनती राजनीति की बड़ी हस्तियों में होती है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर और सासाराम से सांसद बनी मीरा कुमार केन्द्र में मंत्री के अलावा देश की पहली महिला लोगसभा स्पीकर रही हैं।
  
राजनीति में जीत का स्वाद नहीं चख पाए 
बिहार के कई बड़े अधिकारी नौकरी के बाद या वीआरएस लेकर चुनावी मैदान में उतरे। हालांकि इन्हें राजनीति में आरके सिंह और ललित विजय सिंह की तरह कामयाबी नहीं मिली। पूर्व डीजीपी आशीष रंजन सिन्हा वर्ष 2014 में नालंदा लोकसभा क्षेत्र से कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़े पर अपने सिर जीत का सेहरा नहीं बांध पाए। आशीष रंजन से पहले डीजीपी रहे डीपी ओझा भी लोकसभा चुनाव में सीपीआई (एमएल) के टिकट पर चुनावी मैदान में उतरे पर उन्हें हार का सामना करना पड़ा। डीजी रैंक से रिटायर अशोक कुमार गुप्ता ने भी पिछली बार पटना साहिब से लोकसभा का चुनाव निर्दलीय लड़ा पर हार गए। बिहार कैडर के ही आईएएस अधिकारी रहे केपी रमैया वीआरएस लेकर सासाराम से लोकसभा चुनाव लड़े पर हार गए। आईएएस अधिकारी पंचम लाल और कन्हैया सिंह भी चुनौवी मैदान में किस्मत आजमा चुके हैं। 

आईआरएस अधिकारी डॉ. अनूपम श्रीवास्तव ने बनाई पार्टी 
आईआरएस अधिकारी और केन्द्र सरकार में प्रधान आयुक्त रहे डॉ. अनूपम श्रीवास्तव ने राजनीति पार्टी ही बना ली। राष्ट्रवादी विकास पार्टी में उनके साथ रिटायर बिग्रेडियर अनिल श्रीवास्तव समेत कई अधिकारी शामिल हैं। कुछ माह पूर्व बनी यह पार्टी बिहार विधानसभा चुनाव में पहली बार चुनावी मैदान में उतर रही है।

डीजीपी रहे आरआर प्रसाद पंचायत चुनाव हार गए
आईपीएस अधिकारी और बिहार के डीजीपी रहे आरआर प्रसाद ने भी चुनाव में किस्मत आजमाया था। लोकसभा और विधासभा की जगह उन्होंने पंचायत का चुनाव लड़ा था पर इसमें हार गए थे। इसके बाद वह दोबारा चुनावी मैदान में नजर नहीं आए।

गुप्तेश्वर पाण्डेय व सुनील कुमार की किस्मत का होगा फैसला
1987 बैच के दो आईपीएस अफसर इस दफे चुनावी मैदान में नजर आ सकते हैं। डीजीपी गुप्तेश्वर पाण्डेय के जहां चुनावी मैदान में उतरने की प्रबल संभावना है, वहीं जुलाई में सेवानिवृत्त हुए सुनील कुमार ने जदयू का दामन थाम लिया है। दोनों पूर्व आईपीएस अधिकारी राजनीति में कहां तक सफल होंगे, यह वक्त बताएगा।
 

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