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जानती हैं आप कन्या पूजन का सही तरीका?

कन्याओं को देवी का दर्जा प्राप्त है, उन्हें पूजा जाता है। नवरात्र में मां की इस लीला में यही संकेत है कि बेटी ही मां बनेगी, बहन बनेगी, पत्नी बनेगी, बुआ बनेगी, मौसी बनेगी। हमें सबका सम्मान करना चाहिए। सनातन धर्म में शक्ति की देवी दुर्गा हैं तो धन लक्ष्मी जी ही प्रदान करती हैं। ज्ञान माता सरस्वती की कृपा से ही मिलता है। धर्मग्रंथों में लिखा है कि जिस घर में नारी का सम्मान है, वहां ईश्वर खुद विराजमान हैं। नवरात्र के प्रथम तीन दिन तक महाकाली, फिर तीन दिन महालक्ष्मी की आराधना होती है और आखिरी तीन दिन महासरस्वती की साधना होती है। नवरात्र 21 से 29 सितंबर तक हैं। नवरात्र का पारणा 30 सितंबर को है। मां की साधना का पर्व नवरात्र  साल भर में दो बार जागृत-सांसरिक लोगों के लिये तो, दो बार सुप्त अवस्था-संन्यासी आदि के लिये आता है। 

क्यों जरूरी है कन्या पूजन?
नवरात्र में प्रथम दिन से गणेश जी की पूजा के साथ माता शैलपुत्री की पूजा शुरू होती है। जो अंत में नवमी के दिन सिद्विधात्री की पूजा के साथ समाप्त होती है। अष्टमी और नवमी के दिन इन कन्याओं को नौ देवी का स्वरूप मानकर स्वागत किया जाता है और आर्शीवाद स्वरूप कन्याएं कमर पर थपकी लगा कर जाती हैं। इससे आदिशक्ति प्रसन्न होती हैं। नवरात्र में कन्या पूजन बड़ा आवश्यक है। इसी से भक्त का नवरात्र पूरा होता है। कन्याओं को भोग लगाकर दक्षिणा जरूर देनी चाहिए। परंपरा अनुसार अष्टमी, नवमी को कन्या पूजन करने के बाद ही प्रसाद ग्रहण करके व्रत पूरा माना जाता है। 

किन बातों का रखें ध्यान
लेकिन कई बार यह सवाल उठता है कि कन्याओं की आयु कितनी होनी चाहिए? कन्याओं की आयु दो वर्ष से लेकर तथा अधिकतम 10 वर्ष तक होनी चाहिए। स्कन्दपुराण के अनुसार दस वर्ष से बड़ी कन्या नहीं होनी चाहिए। कितनी कन्या हों? यह अपनी आर्थिक स्थिति के अनुसार तय करें। धन है तो जरूर 9 कन्याएं और एक बालक हनुमान स्वरूप होना ही चाहिए। धन नहीं है तो एक कन्या के पूजन से भी मां प्रसन्न होंगी। ध्यान रहे अपनी कुल देवी की पूजा अवश्य करें। 
संभव है तो नवरात्र के दौरान हर दिन एक कन्या को आदर सहित भोजन करवाएं और अष्टमी या नवमी के दिन नौ कन्याओं की पूजा करें। शास्त्रों के अनुसार दो वर्ष की कन्या गरीबी दूर करती है तो तीन वर्ष की कन्या धन प्रदान करती है। चार वर्ष की कन्या परिवार की अधूरी इच्छाएं पूरी करती है। पांच वर्ष की कन्या रोगों से मुक्त कराती है। छह वर्ष की कन्या विद्या, विजय और राजयोग प्रदान करती है। सात वर्ष की कन्या ऐश्वर्य प्रदान कराती है। आठ वर्ष की कन्या शांभवी स्वरूप से वाद-विवाद में विजय प्रदान कराती है। नौ वर्ष की कन्या दुर्गा बन शत्रुओं का नाश करती है और अंत में दस वर्ष की कन्या सुभद्रा बन भक्तों के सभी इच्छाएं पूर्ण करती है। नवरात्र के व्रत विषम संख्या में ही रखने चाहिए। एक, तीन, पांच, सात या फिर नौ। सप्तशती का पाठ परम आवश्यक है।

ऐसे करें कन्या की पूजा
कन्या पूजन से एक दिन पहले ही कन्याओं को आमंत्रित करें।  कन्या पूजन के दिन कन्याओं को तलाशने की गलती न करें। कन्या पूजन के दिन कन्याओं के पैर अपने पुत्रों से ही धुलवाएं। इससे उनके अंदर कन्याओं के प्रति सम्मान बढ़ेगा। कन्याओं के पैर धोकर, माथे पर अक्षत, फूल और कुमकुम लगाकर उन्हें आसन पर बैठाएं। जो घर में उपलब्ध शुद्व खाद्य सामग्री है उसी से माता को भोग लगाने के बाद कन्याओं को प्रसाद दें। अपनी आर्थिक स्थिति के अनुरूप कन्या को दक्षिणा या तत्काल उपयोग में आने वाले उपहार दें। इसके बाद पैर छूकर उनसे आशीष लें।

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  • Web Title:How to do kanya pujan during navratri