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31 अक्तूबर, 2020|9:43|IST

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अस्थमा पर बढ़ रहा है प्रदूषण का कहर

अस्थमा श्वास संबंधी एक रोग है। इसमें श्वास नलियों में सूजन आने से वह सिकुड़ जाती हैं, जिससे सांस लेने में तकलीफ होती है। अगर समय रहते इसे नियंत्रित न किया जाए तो फेफड़ों में हवा भर जाती है और वो फूल जाते हैं। इससे अस्थमा के अटैक का खतरा बढ़ जाता है, जो घातक होता है। अस्थमा का कोई स्थायी इलाज नहीं है, जिससे इसे जड़ से खत्म किया जा सके। डॉक्टर की सलाह से दवाओं का सेवन और इसके ट्रिगर (कारकों) से बचने के लिए जरूरी उपाय अपनाकर इसे नियंत्रित रखा जा सकता है। अस्थमा तब तक ही नियंत्रण में रहता है, जब तक मरीज जरूरी सावधानियां बरत रहा है।

अस्थमा के लिए जिम्मेदार कारक
इस रोग के लिए पर्यावरण प्रदूषण और आनुवंशिक कारण प्रमुख रूप से जिम्मेदार हैं। इसलिए जो माता-पिता इस रोग से पीड़ित हैं, उनके बच्चों में इसका खतरा बढ़ जाता है। सर्दी के मौसम में सामान्य व्यक्ति की श्वास नलिकाएं भी मामूली सी सिकुड़ जाती हैं, इसलिए इस दौरान अस्थमा की चपेट में आने की आशंका बढ़ जाती है। इस मौसम में उन लोगों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, जिन्हें धूल, धुआं, पालतू जानवरों और किसी दवा से एलर्जी हो। मानसिक तनाव भी अस्थमा का एक कारण हो सकता है, लेकिन अप्रत्यक्ष रूप से। लगातार मानसिक तनाव से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है।

अस्थमा अटैक और सर्दियां
सर्द हवाएं अस्थमा के ट्रिगर (कारक) का काम करती हैं। इसलिए सर्दी के मौसम में अस्थमा के रोगियों को विशेष सावधानी बरतनी चाहिए, क्योंकि इस मौसम में उनकी सांस की नलियों के सिकुड़ने का खतरा बढ़ जाता है। सर्द हवाएं सर्दी-जुकाम की आशंका बढ़ा देती हैं। अगर इसका समय रहते इलाज न किया जाए तो इसके अटैक का खतरा बढ़ जाता है।
सर्दियों के मौसम में बच्चों और बुजुर्गों को अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है, क्योंकि उनका इम्यून सिस्टम कमजोर होता है। डॉक्टरों का मानना है कि इस मौसम में हॉस्पिटल आने वाले सांस के रोगियों की संख्या में 30 प्रतिशत तक की वृद्धि हो जाती है, जो चिंतनीय है।

अस्थमा अटैक के लक्षण
अगर आपको सांस लेने में अत्यधिक कठिनाई हो, पल्स रेट काफी बढ़ गया हो, तेज खांसी हो रही हो, नाखून और होठ नीले पड़ गए हों तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें। ये तीव्र अस्थमा अटैक के लक्षण हो सकते हैं। अस्थमा का अटैक हल्का या बहुत गंभीर हो सकता है। 

ऐसे में रहें सावधान
0 सांस लेने में कठिनाई हो या सांस उखड़ती सी महसूस हो।
0 सांस लेते हुए घर-घर की आवाज आती हो।
0 छाती में जकड़न महसूस होती हो।
0 खांसी की समस्या बनी रहती हो।

अटैक होने पर क्या करें
अगर तमाम सावधानियां बरतने के बाद भी अस्थमा का अटैक आ जाए तो तत्काल कुछ उपाय करें।    
0 बिना कोई देर किए डॉक्टर द्वारा बताई गई दवाएं लें। इसमें लापरवाही बिल्कुल न करें। 
0 सीधे खड़े हो जाएं या बैठ जाएं और लंबी-लंबी सांस लें।
0 लेटें बिल्कुल नहीं। अस्थमा बढ़ाने वाले ट्रिगर से दूर रहें।
0 कपड़ों को ढीला कर लें, संभव हो तो आरामदायक कपड़े पहनें। 
0 शांत रहने का प्रयास करें।
0 गर्म कैफीनयुक्त ड्रिंक लें, जैसे कॉफी। इससे एक या दो घंटों के लिए श्वास मार्ग थोड़ा खुल जाएगा और आप राहत महसूस करेंगे।
0 अपने डॉक्टर से संपर्क करें या बिना देर किए नजदीक के हॉस्पिटल जाएं।

कैसे नियंत्रित रखें
0 डॉक्टर द्वारा सुझाई दवाएं उचित मात्रा में समय-समय पर लें।
0 जरूरत हो तो इनहेलर का प्रयोग करें। इनहेलर हमेशा अपने पास रखें।
0 उन कारकों से बचें, जिनसे अस्थमा अटैक की आशंका बढ़ जाती है।
0 खानपान पर नियंत्रण रखें, खाना धीरे-धीरे और चबाकर खाएं।
0 गर्म मसाले, लाल मिर्च, अचार, चाय और कॉफी का सेवन न करें या कम से कम मात्रा में करें।
0 नियमित रूप से योगासन (विशेषकर प्राणायाम) करने से श्वास नलिकाओं की सिकुड़न से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।
0 वायु प्रदूषण, धूल, सिगरेट का धुआं और पालतू जानवरों के फर और मृत त्वचा के संपर्क से खुद को बचाएं।
0 अत्यधिक शारीरिक श्रम और भावनात्मक तनाव से दूर रहें, ये अस्थमा के ट्रिगर का काम करते हैं।
0 ए्प्रिरन भी अस्थमा के ट्रिगर का काम करती है।
0 साफ-सफाई का विशेष ख्याल रखें। घर में कहीं भी धूल इकट्ठी न होने दें।
0 जिन लोगों को एलर्जी होती है, वे विशेष सावधानी बरतें, क्योंकि ऐसे लोगों में अस्थमा होने का खतरा 40 प्रतिशत बढ़ जाता है।
0 जिन लोगों को धूल से एलर्जी है, वे कार में सफर करते समय खिड़कियां बंद रखें और एयर कंडीशन का उपयोग करें।  
0 घर का फर्श हमेशा साफ रखें। फर्श की सफाई में फिनाइल का इस्तेमाल करें।

प्रदूषण का असर
0 भारत में होने वाली कुल मौतों में से 8.2 प्रतिशत अस्थमा के कारण होती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इसका सबसे प्रमुख कारण बढ़ता प्रदूषण है। प्रदूषण के कारण बच्चों में भी अस्थमा के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। 
0 सेंट्रल पॉल्यूशन कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) से प्राप्त आंकड़ों के अनुसार पिछले 10 वर्षों में देश के बड़े शहरों में प्रदूषण का स्तर दोगुने से अधिक हो गया है। कई शोधों में ये बातें सामने आई हैं कि वायु में कार्बन मोनो ऑक्साइड, सल्फर डाई ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स और फार्मेल्डिहाइड का स्तर घातक हो गया है। ये प्रदूषक फेफड़ों के ऊतकों को उतना ही नुकसान पहुंचाते हैं, जितना धूम्रपान से निकलने वाला धुआं।
0 हम एक मिनट में 15 बार, एक घंटे में 900 बार सांस लेते हैं। इससे इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि हमारे फेफड़ों और श्वसन मार्ग पर इस प्रदूषित वायु का कितना प्रभाव पड़ता होगा। गले में दर्द होना, छाती में जकड़न, सांस लेते समय घर-घर की आवाज आना, सांस लेने में परेशानी होना जैसी समस्याएं हो जाती हैं, जो अस्थमा अटैक को ट्रिगर करती हैं।

क्या खाएं, क्या न खाएं
0 दूध और डेयरी प्रोडक्ट न खाएं, क्योंकि ये फेफड़ों में म्युकस के निर्माण को बढ़ाते हंै, जिससे अस्थमा की परेशानी और बढ़ सकती है।
0 शहद का सेवन करें। यह अस्थमा के रोगियों के लिए वरदान है। इसमें विटामिन बी और कई मिनरल होते हैं। यह म्युकस को पतला करता है और शरीर से बाहर निकालने में सहायक होता है।
0 विटामिन ई युक्त खाद्य पदार्थों जैसे जैतून का तेल, मूंगफली, सेब, वनस्पति तेल का सेवन करें। यह अस्थमा के उपचार में मददगार है।
0 विटामिन बी से भरपूर मेवों, अंकुरित अनाज और फलियों का सेवन छाती की जकड़न, खांसी और सांस लेने में तकलीफ की समस्या को दूर करता है। 
0 मैदे और सूजी से बने खाद्य पदार्थों को खाने से बचें।
0 मछली का सेवन न करें।
0 रात के बचे भोजन या ठंडी चीजों के इस्तेमाल से बचें।

हमारे विशेषज्ञ 
डॉ. अनंत गुप्ता
, कंसल्टेंट रेस्पिरेटरी मेडिसिन, सरोज सुपर स्पेशियलिटी हॉस्पिटल, नई दिल्ली
डॉ. मानव मनचंदा, सीनियर कंसल्टेंट एंड एचओडी, रेस्पिरेटरी, क्रिटकल केयर एंड स्लीप मेडिसिन, एशियन इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस हॉस्पिटल, फरीदाबाद