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जरा याद करो कुर्बानी: पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूदे थे विद्यापीठ के छात्र

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महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ की पहचान आजादी की लड़ाई से जुड़ी है। यह माना जाता है कि काशी विद्यापीठ की स्थापना का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वंतत्रता आंदोलन के लिए स्वयंसेवक तैयार करना था। 1921 के बाद से इस संस्था के शिक्षकों और छात्रों ने आजादी की लड़ाई  में अहम भूमिका निभाई। छात्र पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े। 

9 अगस्त 1942 को स्वतंत्रता आंदोलन का निर्णायक संघर्ष आरंभ होने के साथ काशी विद्यापीठ में भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गईं। ‘करो या मरो’ के नारे के साथ काशी की जनता भी सड़क पर आ गई थी। पुलिस अधिकारियों का दल मैदागिन स्थित कांग्रेस कार्यालय को सील करने के बाद सबसे पहले काशी विद्यापीठ की ओर पहुंचा। 9 अगस्त को विद्यापीठ परिसर में ताला बंद कर दिया गया। हॉस्टल में छापे मारे गए। कई विद्यार्थियों सहित प्रमुख आचार्यों को गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तार होने वालों में डॉ.सम्पूर्णानंद, आचार्य बीरबल सिंह, प्रो.राजाराम शास्त्री, विश्वनाथ शर्मा आदि प्रमुख थे। अगस्त क्रांति में विद्यापीठ के छात्रों ने अपने क्षेत्रों में रहकर आंदोलन को विस्तार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लाल बहादुर शास्त्री इलाहाबाद में गिरफ्तार कर लिए गए। कमलापति त्रिपाठी भी मुम्बई से लौटते वक्त गिरफ्तार किए गए। 

विद्यापीठ से जुड़े लोगों में श्रीप्रकाश, आचार्य नरेंद्रदेव, केसकर, अलगू राय शास्त्री, टीएन सिंह, परिपूर्णानंद वर्मा, ऋषि नारायण शास्त्री, तारकेश्वर पांडेय, भोला पासवान शास्त्री, रामसुभग सिंह आदि ने अपने-अपने क्षेत्रों में अगस्त क्रांति को धधकाने में अग्रणी रहे। 

काशी विद्यापीठ राष्ट्रीय आन्दोलन के दौरान काफी दिनों तक उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी का कार्यालय भी था। इसकी वजह से यहां राष्ट्रीय और प्रांतीय नेताओं का आना-जाना लगा रहता था। असहयोग आंदोलन में गांधीजी के आह्वान पर बीएचयू में अध्यापन छोड़कर आंदोलन में शामिल हुए आचार्य कृपलानी काशी विद्यापीठ की स्थापना होने पर यहां पर अध्यापक बन गए। 

ब्रिटिश शासन ने विद्यापीठ को किया प्रतिबंधित
स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान विद्यापीठ में पढ़ाई ठप हो जाती थी। अध्यापक और विद्यार्थी आंदोलन में कूद जाते थे। इसलिए ब्रिटिश अफसर विद्यापीठ पर हमेशा टेढ़ी नजर रखते थे। 1932 में सत्याग्रह आंदोलन के समय प्रांतीय सरकार ने कांग्रेस कमेटियों के साथ-साथ विद्यापीठ को भी गैरकानूनी संस्था घोषित कर दिया। पुलिस ने भवन में ताला लगा दिया और पहरा बैठा दिया। 1934 में प्रतिबंध हटाया गया। इस ढाई वर्ष के दौरान यहां के छात्र और अध्यापक जेल में रहे। 

गांधी का था गहरा लगाव
विद्यापीठ से गांधी जी का गहरा लगाव था। वह अपने जीवनकाल में एक दर्जन से अधिक बार काशी आए। आधा दर्जन बार काशी विद्यापीठ में ही ठहरे। 1921 में उन्हीं के कर कमलों से विद्यापीठ  का शुभारंभ हुआ। 1937 में सात दिनों तक विद्यापीठ मे रहे। काशी विद्यापीठ के छात्रों को सम्बोधित करते हुए गांधी जी ने कहा ‘....आप लोग आजीविका की प्राप्ति के भाव से विद्यापीठ में नहीं आते, कुछ और ही काम के विचार से आते हैं। .... राष्ट्रीय संस्थाओं का लक्ष्य किसी भी कीमत पर और जल्दी से जल्दी विदेशी शासन को समाप्त करने के लिए कृतसंकल्प कार्यकर्ता तैयार करना’

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  • Web Title:kashi vidyapith Students leaving studies involved fight of independence
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