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स्वतंत्रता दिवस: सेंट्रल जेल में चंद्रशेखर आजाद पर बरसाए गए थे 15 बेंत

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अमर शहीद चंद्रशेखर आजाद ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ महज 15 वर्ष की उम्र में आंदोलन का नेतृत्व किया था। उस समय उनकी गिरफ्तारी हुई और सेंट्रल जेल में उनके शरीर पर 15 बेंत बरसाये गये थे। शिवपुर स्थित सेंट्रल जेल में  उस स्थान पर शिलापट्ट जबकि जेल के बाहर उनकी आदमकद प्रतिमा लगायी गयी है। 

वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन के समर्थन में देशभर में धरना-प्रदर्शन हो रहे थे। तब चंद्रशेखर काशी विद्यापीठ के छात्र थे। वे 15-20 छात्रों को लेकर दशाश्वमेध घाट रोड पर विदेशी वस्त्र की दुकान के बाहर प्रदर्शन कर रहे थे। इसकी सूचना पर पहुंची पुलिस ने लाठियां भांजी। लाठियों से बचते हुए उनके मित्र इधर-उधर फैल गये लेकिन आजाद अपनी जगह पर खड़े रहे। एक दरोगा लोगों पर बेरहमी से डंडे बरसाने लगा। चंद्रशेखर आजाद से यह देखा नहीं गया और उन्होंने दरोगा को पत्थर मारा जिससे वह घायल होकर गिर पड़ा। पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर थाने ले गयी। 

दिसंबर की कड़ाके की ठंडी रात थी। चंद्रशेखर को ओढ़ने-बिछाने के लिए कोई बिस्तर नहीं दिया गया। पुलिस का ऐसा सोचना था कि यह लड़का ठंड से घबरा जाएगा और माफ़ी मांग लेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। यह देखने के लिए कि लड़का शायद वह ठंड से ठिठुर रहा होगा, आधी रात को थानेदार ने चंद्रशेखर की कोठरी का ताला खोला। वह देखकर चकित रह गया कि  चंद्रशेखर दंड-बैठक लगा रहे थे। कड़कड़ाती ठंड में भी पसीने से तर-बतर थे। 

मां का नाम धरती, पिता का नाम स्वतंत्रता 
दूसरे दिन चंद्रशेखर को न्यायालय में पेश किया गया। जब मजिस्ट्रेट ने नाम पूछा तो उन्होंने अपना नाम आजाद, मां का नाम धरती और पिता का नाम स्वतंत्रता बताया। घर जेलखाना बताया। मजिस्ट्रेट ने उनके इस तेवर पर 15 कोड़े मारने की सजा सुना दी। उन्हें सेंट्रल जेल ले जाया गया। जेलर आजाद की पीठ पर कोड़े बरसाता रहा और वह भारत माता के जयकारे लगाते रहे। इस घटना के बाद सुर्खियों में आए आजाद को जेल से रिहा होने के बाद लोगों ने कंधे पर बिठाकर शहर में घुमाया था। सेंट्रल जेल के वरिष्ठ जेल अधीक्षक अंबरीष गौड़ ने बताया कि हर साल 23 जुलाई को उनका जयंती समारोह आयोजित किया जाता है। 

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  • Web Title: Chandrashekhar Azad was 15th cane in Central Jail
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