class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

एक ही कंपनी के हवाले 15 सौ मरीजों की सांसें

-कम से कम तीन कंपनियों से होनी चाहिए सप्लाई का करार -वैकल्पिक इंतजाम न होने से पड़ सकती है मरीजों की जान लखनऊ। कार्यालय संवाददाता जिस बड़ी गलती के कारण गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज में इतना बड़ा हादसा हो गया, वही शहर के तीन प्रमुख अस्पताल दोहरा रहे हैं। तीन अस्पतालों में ऑक्सीजन सप्लाई का ठेका एक ही कंपनी के पास है। ऐसे में किसी भी कारण से यदि कंपनी से सप्लाई ठप हो गई तो इन अस्पतालों के पास कोई और विकल्प नहीं होगा। स्वास्थ्य विभाग के अफसरों का कहना है कि एक अस्पताल में कम से कम तीन कंपनियों से ऑक्सीजन की सप्लाई होनी चाहिए। ऐसे में यदि एक जगह से सिलेंडर नहीं भी आए तो दूसरे और तीसरे स्थान से काम चलाया जा सकता है। बलरामपुर, लोहिया और सिविल अस्पताल में एक ही टेंडर से ऑक्सीजन की सप्लाई हो रही है। सिविल अस्पताल ने बाराबंकी की कंपनी सारंग प्लास्टेंज से करार किया। इसी टेंडर के आधार पर लोहिया और बलरामपुर अस्पताल ने भी कंपनी से ऑक्सीजन लेना शुरू कर दिया। सिविल अस्पताल में करीब 401 बेड हैं। यहां रोजाना 50 से 60 ऑक्सीजन सिलेंडर की खपत है। लगभग सवा लाख रुपये महीने की ऑक्सीजन अस्पताल खरीद रहा है। वहीं बलरामपुर अस्पताल में 756 बेड हैं। प्रतिदिन 80 बड़े सिलेंडर की खपत हो रही है। लोहिया अस्पताल में 350 बेड हैं। इनमें भी 30 से 40 ऑक्सीजन सिलेंडर की खपत हो रही है। इन अस्पतालों में सारंग कंपनी ही ऑक्सीजन की सप्लाई कर रही है। किन्हीं कारणों से यदि कंपनी ऑक्सीजन सप्लाई करने में असमर्थ हुई तो अस्पतालों में भर्ती मरीजों की सांसें अटकी सकती हैं। तीनों अस्पतालों में गंभीर मरीजों की भर्ती हो रही है। सांस, मेडिसिन, पीडियाट्रिक, जनरल सर्जरी, बर्न, गुर्दे, न्यूरो समेत दूसरी गंभीर बीमारियों से पीड़ित मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि शुरुआती घंटों में 60 से 70 फीसदी मरीजों को ऑक्सीजन की जरूरत पड़ती है। वर्जन एक कंपनी को टेंडर दिया गया है यह गंभीर मसला है। सभी अस्पतालों से ऑक्सीजन के बकाया व टेंडर आदि का ब्यौरा मांगा गया है। जल्द ही सुधार की दिशा में कदम उठाया जाएगा।डॉ. पदमाकर सिंह, महानिदेशक, स्वास्थ्य विभाग अफसरों की मिलीभगत से चल रहा ऑक्सीजन गैस का धंधा अफसरों की मिलीभगत से चल रहा ऑक्सीजन का गोरखधंधा केजीएमयू में 37 लाख रुपये के भुगतान का मसला का फैसला अभी तक लटका लखनऊ। कार्यालय संवाददाता ऑक्सीजन गैस के काले कारोबार में मेडिकल संस्थान के अफसर से एजेंसी मालिक की तक की मिलीभगत रहती है। कमाई के फेर में अधिकारी नियम-कानून तोड़ने से भी गुरेज नहीं करते हैं। अब तक ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं। अकेले केजीएमयू में तीन से चार मामले अधिकारियों और गैस एजेंसी संचालकों की सांठगांठ का खुलासा कर चुके हैं। इन मामलों की पड़ताल अभी तक केजीएमयू में पूरी नहीं हुई है। 2012-13 में केजीएमयू में पाइप लाइन से मरीजों को ऑक्सीजन मुहैया कराने की कवायद तेज हुई। एक गैस सर्विस को इसका ठेका मिला। कंपनी से केजीएमयू के कुछ अफसरों से साठगांठ कर डाली। कंपनी ने ऐसी जगह पाइप लाइन बिछाने का बिल थमा दिया जहां मरीजों की भर्ती का कोई बंदोबस्त नहीं था। इनमें जिरियाट्रिक मेंटल हेल्थ, नेत्र रोग समेत दूसरे विभाग शामिल हैं। इसका करीब 37 लाख रुपये का बिल केजीएमयू अधिकारियों को थमा दिया। इस पर तत्कालीन चिकित्सा अधीक्षक समेत दूसरे अधिकारियों ने आपत्ति जाहिर की तो कंपनी ने दूसरे अधिकारियों से हाथ मिलाया। भुगतान का दबाव बनाया। काफी हद तक मामला भी सुलट गया। हंगामा बढ़ने पर रूका भुगतान केजीएमयू में डॉक्टरों के एक खेमे ने हंगामा शुरू कर दिया। नतीजतन कंपनी के 37 लाख रुपये का भुगतान अभी तक नहीं हो पाया है। मामला की तफ्तीश अभी भी चल रही है। यह मामला अधिकारियों और एजेंसी संचालकों की मिलीभगत की पोल खोलने के लिए काफी है। अधिकारी कमीशन की फेर में मानकों को दरकिनार कर भुगतान करा रहे हैं। मरीजों की जान की परवाह किसी को नहीं मेडिकल कॉलेज व अस्पतालों में मरीजों की जान की परवाह किसी को नहीं है। करोड़ों रुपये की लागत से अस्पतालों में पाइप लाइन के जरिए ऑक्सीजन पहुंचाने की कवायद शुरू हुई। सिविल, बलरामपुर और लोहिया समेत दूसरे सरकारी अस्पतालों में काम अभी तक पूरा ही नहीं हुआ। नतीजतन अभी भी सिलेंडर से मरीजों को सांसे दी जा रही हैं। सिलेंडर में ऑक्सीजन की मात्रा मापने के लिए मीटर तो लगे हैं लेकिन उसे परखने के प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। ज्यादातर अस्पतालों में अप्रशिक्षित कर्मचारियों से ऑक्सीजन सप्लाई जैसा अहम काम लिया जा रहा है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:news
पारा गांव के आसपास बनी कालोनियां बदहाल, हंगामाडिप्टी सीएम ने दिया शासनादेश लागू कराने का आश्वासन