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शताब्दी अस्पताल के नौ मंजिला भवन में रैंप बनाना भूले अफसर

-शताब्दी फेज एक और दो 15 सौ लोगों की जान खतरे में -कलाम सेंटर में भी नहीं बनाया रैंप केजीएमयू में हजारों मरीज व तीमारदारों की जान जोखिम में हैं। केजीएमयू में ऊंची-ऊंची इमारतें तो बना दी गई लेकिन उनमें ढेरों खामियां हैं। हालात यह है कि नौ मंजिल की शताब्दी फेज दो में रैंप तक बनाना अफसर भूल गए हैं। यही हाल शताब्दी फेज वन, कलाम सेंटर, डेंटल व न्यू ओपीडी ब्लॉक का है। इन सभी प्रमुख भवनों में रैंप की व्यवस्था नहीं है। शताब्दी फेज वन में 250 और शताब्दी फेज दो में 500 बेड हैं। इनमें 15 से ज्यादा अहम विभागों का संचालन हो रहा है। इनमें न्यूरोसर्जरी, गेस्ट्रो सर्जरी, ब्लड बैंक, इंडोक्राइन सर्जरी, इंडोक्राइन मेडिसिन, सर्जिकल आंकोलॉजी, हिमैटोलॉजी, सीसीएम समेत दूसरे विभागों का संचालन हो रहा है। इन विभागों में गंभीर मरीजों को भर्ती किया जा रहा है। ज्यादातर मरीज बीमारी की वजह से चलने-फिरने में लाचार होते हैं। दोनों ही भवनों में रैंप का इंतजाम नहीं हैं। किसी भी तरह का हादसा होने पर मरीजों को लिफ्ट या जीने से उतारने के सिवा दूसरा कोई रास्ता नहीं बचता। ओपीडी ब्लॉक में भी अफसर रैंप बनाना भूल गए हैं। करोड़ों रुपये की इमारत में मरीजों की जान सांसत में है। ओपीडी में रोजाना पांच से सात हजार मरीज आ रहे हैं। डॉक्टरों की चिट्टठी, अफसरों ने किया नजरअंदाज शताब्दी अस्पताल के भवनों में रैंप बनाने के लिए केजीएमयू डॉक्टरों ने उच्च अधिकारियों को कई पत्र लिखे। इसके बावजूद अधिकारियों ने मरीजों की सेहत की परवाह नहीं की। रैंप बनाने की जहमत नहीं उठाई। यहां भी बदहाल है व्यवस्था केजीएमयू में करीब चार हजार बेड हैं। ज्यादातर बेड भरे रहते हैं। यहां मरीज जान हथेली पर लेकर इलाज करा रहे हैं। आग से बचाव के इंतजाम नाकाफी हैं। मेडिसिन, गांधीवार्ड, आर्थोपैडिक्स, जनरल सर्जरी, प्लॉस्टिक सर्जरी, बाल सर्जरी, पल्मोनरी मेडिसिन समेत दूसरे विभागों में आग से बचाव के उपाए नाकाफी हैं। मरीजों की सुरक्षा के बावत अधिकारी ध्यान नहीं दे रहे हैं। इसका खामियाजा मरीजों को भुगतना पड़ सकता है। आग बुझाने के इंतजाम पर केजीएमयू ने फूंके 10.62 करोड़ आठ साल बाद भी नहीं लग पाया फायर फाइटिंग सिस्टम आग बुझाने के इंतजाम जुटाने के लिए केजीएमयू ने पानी की तरह पैसे बहाए। इसके बावजूद फायर फाइटिंग सिस्टम पूरा नहीं हो सका। बजट खपाने के लिए अधिकारियों ने परिसर के ज्यादातर हिस्सों में पानी की पाइप लाइन तो बिछा दी लेकिन पानी का टैंक और ट्यूबवेल अब तक नहीं लगा सके। नतीजतन करोड़ों रुपये के उपकरण जंग खा रहे हैं। इनकी देखभाल तक करने वाला कोई नहीं। तमाम जगह लगे उपकरण या तो गायब हो चुके हैं या फिर जर्जर होकर टूट चुके हैं। केजीएमयू में आग की घटना से निपटने के लिए 2009 में फायर सिस्टम लगाने की कवायद शुरू हुई। शासन ने जल निगम की सी एंड डीएस की 50 वीं ईकाई को फायर फाइटिंग लगाने की जिम्मेदारी सौंपी। इसके लिए 10 करोड़ 62 लाख रुपये बजट का प्रावधान किया गया। सीएंडडीएस ने परिसर में पाइप लाइन का जाल भी बिछा दिया। उपकरण भी लगा दिए। इसके बाद पानी का टैंक बनाने की बारी आई तो केजीएमयू प्रशासन ने उसका तय स्थान बदल दिया। सीएंडडीएस के अधिकारियों ने और पाइप लाइन बिछाने की जरूरत बताई। इस पर तकरीबन तीन करोड़ 32 लाख रुपये का खर्च बताए। डेढ़ साल पहले इसका प्रस्ताव भी शासन को भेजा। अब तक प्रस्ताव को मंजूरी नहीं मिली। नतीजतन मरीजों की जान आफत में है। आग लगने की घटना से नहीं लेते सबक केजीएमयू में आग लगने की घटनाएं लगातार हो रही हैं। इसके बावजूद घटना से केजीएमयू के अफसर सबक नहीं ले रहे हैं। बीते दिनों पैथोलॉजी विभाग में आग लग गई थी। इसके बाद फिजियोलॉजी विभाग में आग लगी। जिसमें लैब के गद्दे जल गए थे। बाल रोग विभाग, क्वीनमेरी, गांधी वार्ड समेत दूसरे विभागों में आग लगने की घटनाएं हो चुकी हैं। अधिकारी बचाव के लिए सिर्फ जांच के आदेश दिए हैं। जांच कभी नतीजे तक पहुंची ही नहीं। यदि पहले की घटनाओं से अधिकारी सबक ले लेते तो शायद इस तरह की घटनाओं से और आसानी से निपटा जा सकता था।

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