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गोमती किनारे पहली बार महिलाओं ने किया तर्पण श्राद्ध

मनकामेश्वर मठ मंदिर और देव्या चैरिटेबल ट्रस्ट के संयुक्त तत्वावधान में गुरुवार को डालीगंज स्थित मनकामेश्वर उपवन घाट आदि गंगा मां गोमती के जल से तट व आरती स्थल पर मातृ नवमी पर तर्पण श्राद्ध किया गया। आचार्य पं. श्यामलेश तिवारी जी के नेतृत्व में पहली बार आयोजित इस कार्यक्रम में अधिक संख्या में महिलाओं ने अपने पूर्वजों का तर्पण श्राद्ध किया। अश्विन माह की कृष्ण पक्ष की नवमी को मातृ नवमी कहा जाता है। इसी दिन स्वर्गवासी महिलाओं का तर्पण किया जाता है। तर्पण के लिए महिलाओं को निशुल्क सामग्री की व्यवस्था कराई गई। इस अवसर पर महंत देव्या गिरि ने कहा कि पति-पत्नी या परिवार में क्लेश होता हो, अनावश्यक डर व्याप्त हो, विवाह न होना। ऐसे कई कारण पितृ दोष की वजह से पनपते हैं। यही नहीं रक्त का किसी प्रकार का दोष, वास्तु दृष्टि दोष और शांति आदि के लिए भी पिंड दान और पितृ का तर्पण करना चाहिए। इस मौके पर सुमित्रा, उपमा पांडेय, नम्रता मिश्रा, मातेश्वरी कश्यप, ज्योति जायसवाल, तारा कश्यप, किरन सिंह, खुशबू पांडेय, रीता, रेनू, गीता, रोमा, कीर्ति जायसवाल, कुसुम, मीरा आदि महिलाएं शामिल रहीं। ------------------------------- माता सीता ने किया था पिंडदान महंत देव्या गिरि ने बताया कि समाज में लोगों को भ्रम है कि तर्पण या पिंडदान सिर्फ पुरुष ही कर सकते हैं। महंत ने बताया कि भगवान श्रीराम और माता सीता महाराजा दशरथ का पिंडदान करने गए हुए थे। प्रभु राम पिंडदान के लिए सामग्री की व्यवस्था करने चले गए। जबकि माता सीता वहीं खड़ी रहीं। इसी बीच महाराजा दशरथ की आत्मा आयी और पिंडदान करने की मांग करने लगी। तब सीता जी द्वारा गाय व फल्गु नदी को साक्षी मानकर रेत का पिंड बनाकर दान कर दिया गया, जिसके बाद महाराजा दशरथ की आत्मा तृप्त होकर चली गई। जब प्रभु श्रीराम आये और पिंडदान किये तो उसको स्वीकार नहीं किया गया। तब राम ने सीता से कारण पूछा। तब माता सीता ने प्रभु श्रीराम को सीता जी ने सारा वृतांत बताया। तब प्रभु राम ने माता सीता से पूछा कि इसका साक्षी कौन है। उस दौरान गाय ने गवाही दी। लेकिन नदी ने गवाही नहीं दी। तब माता सीता ने फल्गु नदी को श्राप दिया, जिसकी वजह से नदी भूमि के काफी नीचे चली गई। आज भी गया में रेत हटाने पर नदी मिलती है।

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