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गंगा के देश में गंगा ही नहीं हिन्दी भी सूख रही

हिन्दी दिवस पर विशेषज्ञों ने जतायी चिन्ता उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से संगोष्ठी का आयोजन लखनऊ। निज संवाददाता आजादी से पहले बहुत हिन्दी भाषा के आस्तित्व की खूब आवाजे उठती थी लेकिन आजादी के बाद ही हिन्दी को सबसे ज्यादा उपेक्षा झेलनी पड़ी। यह बात भाषा संस्थान के पूर्व अध्यक्ष डा. कन्हैया सिंह ने हिन्दी दिवस पर हुई संगोष्ठी में कही। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान की ओर से हिन्दी दिवस के मौके यशपाल सभागार में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जहां वक्ताओं ने ‘हिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के विकास की संभावनाएं एवं चुनौतियां व ‘विज्ञन एवं तकनीक के क्षेत्रों में हिन्दी का वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य पर अपने विचार को रखा। आजादी के बाद हिन्दी की ज्यादा उपेक्षा कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए डा. कन्हैया सिंह ने कहा कि हमें अपनी कमियों पर भी विचार करना चाहिए। गंगा के देश में गंगा ही नहीं सूखी है हिन्दी भी सूख रही है। आजादी के पहले हिन्दी के बारे में सोच रहे थे लेकिन आजादी के बाद हिन्दी की उपेक्षा अधिक हुई है। विज्ञान विषय की पुस्तकें लिखी जा रही है लेकिन पढ़ी कम जा रही हैं। कहने का तात्पर्य है आज हमें अपनी मानसिकता बदलनी होगी। हमें हिन्दी मानसिकता पहले बनानी होगी। विदेशों में शोध वहां की भाषा में करना होता है। हमें अपने देश में हिन्दी भाषा को शोध, विज्ञान, कृषि, कानून, अभियांत्रिकी से जोड़ना होगा। हिन्दी भाषा नहीं यह एक संस्कृति है। गैर हिन्दी राज्यों में हिन्दी का विकास संगोष्ठी में भुवनेश्वर से आए शंकर लाल पुरोहित ने ‘अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी के विकास की संभावनाएं एवं चुनौतियां‘ विषय पर व्याख्यान देते हुए कहा कि हिन्दी भाषा को हिन्दी अहिन्दी भाषी क्षेत्रों बांटना उचित नहीं है। अहिन्दी भाषी क्षेत्रों में हिन्दी भाषा का विकास हो रहा है। भाषाओं के क्षेत्रों में अनुवाद के कार्य भी बहुत हो रहे हैं। अज्ञेय विद्यानिवास मिश्र, बालशौरि रेड्डी ने हिन्दी भाषा के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण कार्य किये हैं। आज देश ही नहीं विदेशों में भी हिन्दी बढ़ रही है। हिन्दी को आज वैश्विक स्वरूप मिल रहा है। आज चीन व अमेरिका भी हिन्दी भाषा पढ़ाने पर जोर दे रहे हैं। हिन्दी को राजनीतिक कीचड़ से निकालना होगा। भारत का द्वार हिन्दी है। हिन्दी भाषा का विस्तार होना चाहिए। ‘विज्ञान एवं तकनीक के क्षेत्रों में हिन्दी का वर्तमान परिदृश्य एवं भविष्य‘ विषय पर व्याख्यान देते हुए डा. चन्द्रमोहन नौटियाल ने कहा कि हिन्दी विज्ञान लेखन में कुछ समस्याएं अवश्य हैं। उच्च शिक्षा में मिश्रित भाषा में विज्ञान का पठन-पाठन होना चाहिए। आज हिन्दी में विज्ञान लेखन हो रहा है। जो भाषा व्यवसाय से नहीं जुड़ती है उसके भविष्य पर शंका होती है। हिन्दी को व्यवसाय से जोड़ना होगा। अमिता दुबे के संचालन में हुई संगोष्ठी में हिन्दी संस्थान के निदेशक शिशिर ने कहा कि आज हिन्दी में प्रचुर मात्रा में साहित्य लिखा जा रहा है। व्यापारिक क्षेत्रों में भी हिन्दी के बिना सफलता असम्भव है।

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