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अपनों ने एक-एक निवाले के लिए 'बूढ़ी काकी' को किया मोहताज

लखनऊ। कार्यालय संवाददाता

वृद्धा अवस्था में मन किसी बच्चे की भांति चंचल हो जाता है। छोटी-छोटी बातें खुशी देती थीं। कभी लजीज पकवान खाने का मन करता है तो कभी परिवार के बच्चों के साथ खेलने का दिल। जीवन में हुए तिरस्कारों पर पर्दा गिर जाता है। ऐसे ही भावपूर्ण दृश्यों के साथ कथाकार मुंशी प्रेमचंद की की कहानी बूढ़ी काकी का नाट्य मंचन शुक्रवार को राय उमानाथ बली प्रेक्षागृह में हुआ। कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय से बुजुर्गो की व्यथा और उनके प्रति संवेदना जाहिर की।

पति व पुत्र की मौत के बाद बूढ़ी काकी भीतर ही भीतर कुढ़ने लगती हैं। एक दिन वह अपनी पूरी सम्पत्ति भतीजे बुद्धिराम के नाम कर दी। बुद्धिराम संपत्ति हासिल करने के बाद उन पर अत्याचार करने लगा। काकी को भरपेट भोजन भी नसीब नहीं होता है। बुद्धिराम की पत्नी भी काकी को एक-एक निवाले के लिए तरसाने लगती है। मगर बुद्धिराम की छोटी बेटी लाडली को यह सब देखकर खराब लगता था। वह उनका ख्याल रखने के साथ-साथ मां-पिता से चोरी चुपके से उन्हें खाना भी खिलती है। बुद्धिराम के बेटे मुखराम के तिलक कार्यक्रम के दिन स्वादिष्ट भोजन की लालसा में बूढ़ी काकी मेहमानों के झूठे भोजन खाने लगती है। यह देख बुद्धिराम की पत्नी रूपा का कलेजा पसीज जाता है और उसे अपने किए पर पछतावा होता है।

सृजन शक्ति वेलफयेर सोसाइटी के तहत हुए नाटक में संस्था की सचिव सीमा मोदी ने बूढ़ी काकी का किरदार निभाया। उनकी आदाकारी देखकर दर्शकों ने जमकर सराहना की। वहीं अन्य किरदारों में आरुष, शिवांशु, राहुल दबुबे, समृद्धि, शैलेंद्र, सोनू, लक्ष्मी, रेखा मोदी, उदयभान, सौरभ और आशीष पांडेय आदि कलाकारों ने भी शानदार अभिनय कर आकर्षण बिखेरा।

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  • Web Title:हहीह
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