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लोकसभा चुनाव ने बदला कोविंद का राजनीतिक सफर

कानपुर में एक समारोह के दौरान बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद।

बिहार के राज्यपाल और राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार रामानाथ कोविंद वैसे तो भाजपा संगठन में लंबे समय से थे लेकिन असल राजनीतिक सफर 1991 के लोकसभा चुनाव हारने के बाद से शुरू हुआ। घाटमपुर सुरक्षित निर्वाचन क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार के रूप में चुनाव मैदान में उतरे थे। जनतादल के उम्मीदवार केशरी लाल ने 43647 मतों के अंतर से पराजित कर दिया था। श्री कोविंद चुनाव जरूर हार गए लेकिन यहीं से उनके राजनीतिक जीवन में नया मोड़ आया।
चुनाव हारने के बाद कानपुर लौटे। अपने लोगों के बीच हार जीत के कारणों की पड़ताल करते रहे। उनके अपने शुभचिंतक बीएनएसडी इंटर कॉलेज के शिक्षक अनिल कुमार उन्हें क्राइस्ट चर्च कॉलेज में दर्शनशास्त्र के विभागाध्यक्ष ब्रह्मस्वरूप अग्रवाल के पास ले गए। अनिल कुमार ने आरएसएस के क्षेत्र संघ चालक, पूर्व सांसद डॉ. ईश्वर चंद्र से मुलाकात कराई। डॉ. ईश्वर चंद्र के साथ श्री कोविंद तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह से मिले। अनिल कुमार बताते हैं कि श्री कोविंद ने कल्याण सिंह से मुलाकात में बड़ी साफगोई से कहा कि घाटमपुर से चुनाव हारकर आया हूं। उन्होंने हार के कारण भी बताए लेकिन कल्याण सिंह ने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। 
उन दिनों भाजपा के पास कोई दलित चेहरा नहीं था। बसपा का भी जबरदस्त दबाव था। दलित नेता के विकल्प के रूप में कल्याण सिंह ने नाम आगे बढ़ाया। वर्ष 1994 के राज्यसभा चुनाव में यूपी से उनका नाम प्रस्तावित किया गया। श्री कोविंद लगातार 2006 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। राज्यसभा से खाली होने के बाद वर्ष 2007 में कानपुर देहात की भोगनीपुर विधानसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ा। इस चुनाव में भी उन्हें सफलता नहीं मिली। भोगनीपुर से चुनाव हारने के बाद संगठन के साथ शैक्षिक कार्य में लग गए। ज्यादातर समय किताबों में बिताया। भाजपा की सक्रिय राजनीति से भी दूर हो गए थे। अगस्त 2015 किस्मत फिर फलटी। भाजपा ने उन्हें बिहार का राज्यपाल बनाने का फैसला लिया। बिहार के राज्यपाल बनने के बाद श्री कोविंद कानपुर से सीधे जुड़े रहे। कानपुर आते हैं तो कम से कम चार दिन का वक्त लेकर आते हैं। सादगी इतनी है कि जिसने भी उन्हें बुलाया उसी के यहां चले गए। किसी को इस बात का भान नहीं था कि रामनाथ कोविंद देश के प्रथम नागरिक बनने वाले हैं। सोमवार को अचानक उनके नाम का ऐलान हुआ तो सभी चौंक गए। किसी को अंदाजा नहीं था कि भाजपा रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति उम्मीदवार घोषित करने वाली है। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने जब नाम का ऐलान किया तो उनके शुभचिंतकों के बीच खुशी का ठिकाना नहीं रहा।
सादगी की मिसाल के सभी कायल
बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद की सादगी के सभी कायल हैं। उनके सादगी से जुड़े कई संस्मरण हैं। राज्यसभा सदस्य बनने के बाद उन्होंने कुष्ठ रोगियों की मदद के लिए संचालित संस्था दिव्य प्रेम मिशन को 25 लाख रुपए अपनी निधि से दिया था। सरस्वती ज्ञान मंदिर इंटरनेशनल स्कूल के प्रबंधक अजीत गुप्ता बताते हैं कि हरिद्वार में संचालित कुष्ठ रोग आश्रम के कार्यक्रम में उन्हें हिस्सा लेना था। सभी लोग ट्रेन से हरिद्वार पहुंचे थे। कुष्ठ आश्रम से भी रिसीव करने वाले लोग आए थे लेकिन कोविंद जी उन्हें पहचानते नहीं थे। स्टेशन पर उत्तराखंड दलित मोर्चा के लोग भी श्रीकोविंद का स्वागत करने आए थे। जब हम लोग कोविंद जी के नारे लगाने लगे तो दलित मोर्चा के लोगों ने उन्हें माला पहनानी शुरू की। कुष्ठ आश्रम के कार्यक्रम में जाना था और श्री कोविंद जी अपने साथियों के साथ दलित मोर्चा के लोगों की गाड़ी में बैठ गए। बाद में उन्हीं लोगों ने कार्यक्रम स्थल छोड़ा।

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  • Web Title:Kovind's political journey