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स्वतंत्रता दिवस: यह मस्जिद थी क्रांतिकारियों का ठिकाना, अंग्रजों के खिलाफ बनती थी रणनीति

 यह मस्जिद थी क्रांतिकारियों का ठिकाना, अंग्रजों के खिलाफ बनती थी रणनीति

नौमहला मस्जिद की नींव में देशभक्ति की पत्थरों से बनी है और इसकी जमीन पर दफन होकर भी जिंदा है अमर क्रांतिकारी। यहां खुदा की इबादत भी होती थी और वतन पर मरने-मिटने को बेताब वीर सपूतों के जज्बात भी बयां होते थे। यही वो नौमहला मस्जिद है जहां ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ क्रांतिकारियों की गोपनीय बैठक होती थी। कब, कहां आजादी की जंग छेड़ी जाएगी, यह रणनीति बनाई जाती थी। आज भी इस मस्जिद की चहारदीवारी में ऐसे अमर सपूतों की कब्र मौजूद है। कोई अभिलेख नहीं होने से भले ही अब उनकी नाम-पहचान मुश्किल है पर उनकी कुर्बानी के तराने आज भी यहां खूब सुने जाते हैं।

1749 में पड़ी थी नींव
यह मस्जिद 1749 में वजूद में आई थी। यहां के मौलवी शाने अली ‘कमाल साबरी’  बताते हैं कि सैयद शाजी बाबा ने इस मस्जिद की नींव रखी थी। यहां नमाज अदा की जाती थी। तब यह मस्जिद कच्ची बनी थी। 1906 में यहां पक्का निर्माण हुआ और तब यहां नौ महले बने थे। तभी से इसका नाम नौमहला मस्जिद पड़ा था। ऊंचे बुर्ज वाली इस मस्जिद में एक बड़ा कुआं भी था।

1857 क्रांति का बड़ा केंद्र बना था
गुलामी की जंजीरों से जकड़ा देश तड़प उठा था। जब 1857 में पहली क्रांति की ज्वाला भड़की तो रुहेलखंड के वीर सपूत भी आजादी पाने को जंग में कूद पड़े थे। उस समय क्रांतिकारियों का नेतृत्व नवाब खान बहादुर खान कर रहे थे। उन्होंने नौमहला मस्जिद को अपना मुख्यालय बनाया। यहां क्रांतिकारियों की मीटिंग होती थी। ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ जंग-ए-आजादी की रणनीति यहां बनाई जाती थी।

क्रांतिकारियों को मिलती थी पनाह
शाने अली बताते हैं कि यहां क्रांतिकारियों को पनाह मिलती थी। खान बहादुर खान के साथ दीवान पं. शोभाराम ओझा, तेगबहादुर, बरेली कालेज के शिक्षक मौलवी महमूद अहसन, शिक्षक कुतुबशाह, प्रो. मुबारक समेत कई क्रांतिकारियों ने कई बार यहां शरण ली थी। अंग्रेजों से छिपकर यहां मीटिंग होती थी। नवाब खान बहादुर और सूबेदार बख्त खां की बैठक के बाद क्रांति की रणनीति बनी थी। यहां से ही क्रांति की ज्वाला पूरे रुहेलखंड में फैली थी जिसने अंग्रेजी हुकुमत की चूलें हिला दी थीं। क्रांतिकारियों की अदम्य साहस से गोरों को मुंह की खानी पड़ी थी और बरेली को आजादी मिल गई थी।

मस्जिद से हुई थी आजादी की अजान
नौमहला मस्जिद से आजादी की अजान हुई थी जिसने पूरे रुहेलखंड को स्वतंत्रता पाने के लिए एकजुट कर दिया था। यहां से 22 मई 1857 को इमाम महमूद हसन ने आजादी की खातिर अजान दी थी। उसके बाद पूरा रुहेलखंड धधक उठा था। धर्म-मजहब से परे, हिंदू और मुसलमान एकजुट हो गए थे और ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ क्रांति का बिगुल फूंक दिया था।

अजान देते शहीद हुए थे मस्जिद के इमाम
ब्रितानिया हुकुमत के खिलाफ हुए पहले विद्रोह को दबाने के लिए अंग्रेजों ने पूरी ताकत झोंक दी थी। बाद में उनको पता चला कि नौमहला मस्जिद में क्रांतिकारियों को पनाह मिलती है। उन्होंने मस्जिद पर हमला कर दिया था। यहां के इमाम सैयद इस्माइल शाह अजान देते शहीद हो गए थे। उस समय यहां सैयदों के परिवार भी रहते थे। गोरों से अपनी अस्मत बचाने के लिए सैयदों के परिवार की महिलाओं, लड़कियों ने उसी कुएं में कूदकर अपनी जान दे दी थी। कहते हैं, कुएं का पानी ही लाल हो गया था। अब यह कुआं पाट दिया गया है।
 

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  • Web Title:mosque was the place of revolutionaries meeting against the British
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