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जज्बे के आगे पहाड़ भी पड़े बौने

सुजाता साहू, सामाजिक कार्यकर्ता  First Published:18-06-2016 11:07:05 PMLast Updated:18-06-2016 11:07:05 PM

सुजाता के पिता एयरफोर्स में थे। लिहाजा उन्हें देश के अलग-अगल हिस्सों में रहने का मौका मिला। शुरू से रोमांच की शौकीन रहीं सुजाता को पहाड़ों की सैर बहुत पसंद थी। उनका बचपन काफी खुशनुमा रहा। आईटी क्षेत्र में डिग्री हासिल करने के बाद उन्हें एक बड़ी अमेरिकी कंपनी में नौकरी मिल गई। यह 1991 की बात है। अमेरिका में सुजाता का शानदार करियर था। वह नौ साल वहां रहीं। इस दौरान कई बार उनका स्वदेश आना हुआ। वह जब भी अपनों से मिलतीं, तो उनका मन करता कि सब कुछ छोड़कर घर लौट आऊं। इस बीच दिल्ली के आईटी प्रोफेशनल संदीप साहू से उनकी शादी हो गई। सुजाता करियर की खातिर अमेरिका लौटीं, पर उनका मन नहीं लगा। संदीप कहते हैं- सुजाता भारत में रहकर अपने बच्चों की परवरिश करना चाहती थीं। इसलिए वह वापस आ गईं।

वैसे भी, हमारे देश में आईटी प्रोफेशनल्स के लिए अच्छे अवसर हैं। इसलिए इस फैसले में उनको ज्यादा मुश्किल नहीं हुई। सुजाता कुछ समय मुंबई में रहीं। इस दौरान मुंबई की बाढ़ में लोगों को दिक्कतों से जूझते हुए देखा। बहुत बुरा लगा। अब उन्हें अमेरिका और भारत के हालात का अंतर समझ में आया। मन में एक टीस थी। आखिर क्यों हमारे देश के लोगों को इतनी दिक्कतें सहनी पड़ती हैं? कई तरह के सवाल मन में उठने लगे। सुजाता समाज के लिए कुछ करना चाहती थीं, लेकिन तब समझ में नहीं आया कि क्या करें? मुंबई में कुछ साल बिताने के बाद वह दिल्ली लौटीं। सुजाता कहती हैं- बच्चों के बीच वक्त गुजारना मुझे बहुत पसंद है। गणित और कंप्यूटर साइंस मेरे पसंदीदा विषय रहे हैं। इसलिए गुड़गांव के एक स्कूल में मैं पढ़ाने लगी। सुजाता के पति संदीप को ट्रैकिंग का बहुत शौक है। उनके साथ वह कई बार लद्दाख गईं। वहां की शांति और खूबसूरती सुजाता को इतनी अच्छी लगी कि साल 2010 में वह अकेले ही चल पड़ीं टै्रकिंग पर।

करीब 17,000 फीट की ऊंचाई उन्होंने अकेले तय की। सफर आसान न था। इतनी ऊंचाई पर ऑक्सीजन कम होने लगती है। इस कठिन सफर में उन्होंने लद्दाख की मुश्किलों को भी करीब से देखा। पहली बार सुजाता को महसूस हुआ कि वहां के लोग कितने सीधे और सरल हैं। वहां के सुदूर इलाकों में बच्चों को अभाव के बीच पढ़ते देखा। ऐसे स्कूल दिखे, जिनमें किताबें नहीं थीं, बिजली नहीं थी। बैठने के लिए कुरसियां भी नहीं थीं। सुजाता कहती हैं- मैंने वहां एक ऐसा स्कूल देखा, जिसमें सिर्फ दो बच्चे थे और एक टीचर। एक ऐसी टीचर मिली, जो तीन दिन का सफर तय कर बच्चों तक मिड-डे मील पहुंचाती थी। तब लगा कि मुझे इनकी मदद करनी चाहिए। लद्दाख से लौटने के बाद उनके मन में बेचैनी थी। घर लौटकर पति से इस बारे में बात की। उन्हें बताया कि वह उन बच्चों के लिए कुछ करना चाहती हैं। कुछ दिन लगे तैयारी करने में। पति ने इस नेक काम में उनकी मदद की। बच्चों के लिए कॉपी, किताबें, स्टेशनरी और कुछ जरूरी सामान लेकर सुजाता लद्दाख पहुंचीं। इस बार पति भी उनके साथ थे। सुजाता जिस गांव में पहुंचना चाहती थीं, वह करीब छह हजार फीट की ऊंचाई पर था। इतनी ऊंचाई पर इतना सारा सामान लादकर पहुंचना एक मुश्किल काम था। सामान पहुंचाने का एक ही साधन था खच्चर।

उन्होंने 25 खच्चरों पर सामान लादा और चल पड़ीं। पूरा दिन लग गया वहां पहुंचने में। सुजाता कहती हैं- बच्चे हमारा घंटों से इंतजार कर रहे थे। सामान देखकर वे बहुत खुश हुए। उनके चेहरों की चमक देख मेरा हौसला और बुलंद हो गया। लेकिन एक गांव या एक स्कूल की मदद काफी नहीं थी। तमाम गांवों को मदद की दरकार थी। इतना बड़ा काम करने के लिए बडे़ पैमाने पर योजना बनाने की जरूरत थी। दिल्ली लौटने के बाद उन्होंने सरकारी दस्तावेजों को खंगाला। पता चला कि लद्दाख क्षेत्र में करीब एक हजार स्कूल हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे गांवों में हैं, जहां पहुंचना वाकई बहुत मुश्किल है। पति व कुछ दोस्तों की मदद से उन्होंने ऐसे स्कूलों की सूची तैयार की। इस दौरान वहां के हालात जानने के लिए कई बार अकेले, तो कई बार पति के संग दूरदराज के गांवों का दौरा किया। सुजाता कहती हैं- शुरुआत में कई लोगों को लगा कि मैं समय बर्बाद कर रही हूं। उन्हें शक था कि दिल्ली में रहकर लद्दाख जैसे दुरूह इलाके में मदद पहुंचाने का ख्याल अव्यावहारिक है। उन्हें लगा कि यह बड़ा काम है और मैं नहीं कर पाऊंगी।

तमाम मुश्किलों के बावजूद उनके कदम पीछे नहीं हटे। कुछ लोगों ने सवाल उठाए, तो कुछ मदद के लिए आगे भी आए। वर्ष 2012 में उन्होंने ‘17,000 फीट फाउंडेशन’ की स्थापना की। इसके तहत उन्होंने लद्दाख क्षेत्र में करीब 200 स्कूलों को गोद लिया। वहां बुनियादी सुविधाएं पहुंचाने के अलावा उन्होंने शिक्षकों के लिए टे्रनिंग भी शुरू की। सुजाता कहती हैं- लद्दाख के लोग अपने बच्चों को पढ़ाना चाहते हैं। उनके बच्चे भी हमारे बच्चों की तरह शिक्षा के हकदार हैं। हमें उनकी मदद करनी होगी। पिछले चार वर्षों में उनका कारवां काफी आगे बढ़ा है। इस साल राष्ट्रपति ने उन्हें नारी शक्ति अवॉर्ड से सम्मानित किया है।
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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