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इस जनगणना के सच-झूठ

पाकिस्तान में 19 साल बाद ही सही, जनगणना शुरू तो हुई। सेना के दो लाख जवानों के साथ 91 हजार आम कर्मचारी इस काम को अंजाम देंगे। पूरी प्रक्रिया पर 14 अरब का खर्च आएगा। लेकिन इतने वर्षों बाद शुरू हुए अभियान की सफलता तभी मानी जाएगी, जब यह त्रुटिरहित तो हो ही, जनसांख्यिकी नजरिये से महत्वपूर्ण हर बात इसका हिस्सा बने। हालांकि इस बार फोकस सिर्फ आबादी की सही-सही संख्या सुनिश्चित करने पर दिख रहा है, जिसमें लिंग, उम्र, वैवाहिक स्थिति और धर्म का उल्लेख तो होगा, पर विकलांगता, आंतरिक पलायन की स्थिति, जन्म व मृत्यु दर जैसी जरूरी सूचनाएं और कुछ अन्य बातें नहीं होंगी। और भी कई चूक दिख रही हैं। राजनीतिक माहौल इसके खिलाफ न हो, तो इसके साथ भी नहीं है। जनगणना के बाद जनसांख्यिकी आंकड़ों में व्यापक उलटफेर का अंदेशा सियासी दलों को बेचैन कर रहा है, क्योंकि इसके नतीजे नेशनल असेम्बली में प्रांतीय सीटों की स्थिति और राजनीतिक दलों के वोटों को प्रभावित करेंगे। नेशनल फाइनांस कमीशन (एनएफसी) की संस्तुतियों पर भी असर पड़ेगा, जो पूरी तरह जनसंख्या के आंकड़ों पर निर्भर है। राज्यों के बीच संसाधन बांटने का फॉर्मूला भी नए सिरे से तय करना होगा। सच तो यह है कि पाकिस्तान ब्यूरो ऑफ स्टेटिस्टिक्स (पीबीएस) ने सुनियोजित तरीके से वक्त की कमी का हवाला देकर तमाम बिंदुओं को इस जनगणना से अलग कर दिया, और इस बार जनगणना के लिए 70 दिन तय किए गए हैं, जबकि अब तक यह काम महज दो हफ्तों में ही सिमटता रहा है। यानी मंशा साफ हो, तो अब भी ये सारी बातें शमिल हो सकती हैं। सोचना चाहिए कि जनगणना रोज-रोज तो होती नहीं है, लिहाजा बेहतर होगा कि अगली जनगणना का इंतजार किए बिना इन मसलों को इसमें शामिल कर लिया जाए। यह सही है कि इसके आंकड़े सियासी व आर्थिक, दोनों नजरिये से असर डालने वाले होंगे। हालांकि फिलहाल यही लगता है कि सियासत ने आर्थिक हित दरकिनार कर दिए हैं,जो उचित नहीं है। जरूरी है कि राजनीतिक दलों के हितों की चिंता न कर एक तथ्यपरक जनगणना सामने आए।

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  • Web Title:true lieu of this census