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जरदारी का गुस्सा

आसिफ अली जरदारी एक शांत, संतुलित और ठंडे मिजाज वाले शख्स के तौर पर जाने जाते हैं, इसलिए इस्लामाबाद में पार्टी के एक जलसे में फौज के खिलाफ उनके आक्रामक और बहुत हद तक मजाक उड़ाने वाले तेवर ने सबको हैरान कर दिया। मुल्क के पुराने सदर जरदारी ने अपनी पार्टी के ‘किरदार को खराब करने’ की कोशिश पर न केवल ऐतराज जताया, बल्कि फौज को चेतावनी भी दे दी कि अगर वह अपने पर काबू नहीं रखती है, तो वह ‘कई जनरलों के गलत कामों की’ कलई खोल देंगे। जरदारी के लहजे व अल्फाजों से साफ था कि फौज पीपीपी को फंसा रही है, इसके लिए उसने अपने दायरे को भी पार किया है और पीपीपी किसी मुकाबले से नहीं डरती। अगरे पूरे मामले पर नजर डालें, तो यह साफ हो जाता है कि जरदारी के पूरे भाषण का मकसद उकसाने वाला था। और जैसी की उम्मीद थी, सभी तरह की सियासी जमातों के नेता, जिनमें वजीर-ए-आजम नवाज शरीफभी शामिल हैं, फौज के बचाव व जरदारी की मलामत करने को निकल आए। इसमें कोई दोराय नहीं कि जरदारी की तकरीर ने सियासी हलके में हंगामा खड़ा कर दिया है और यहीं पर सवाल भी उठने लगा है कि क्या उनका गुस्सा अपनी जायज मांगों को बुलंद करने के लिए था या फिर इसका मकसद पीपीपी को सियासी मंच पर वापस सुर्खरू करने का? दूसरा सवाल यह है कि पीपीपी व फौज की खुली जंग में पीएमएल-नवाज क्या करेगी? मुनासिब तो यही कहना होगा कि पीपीपी का कदम दोनों मकसद से प्रेरित है। वरना हलफ उठाने के मामूली जलसे में पार्टी के दिग्गज, जिनमें हाल ही में पाकिस्तान लौटे बिलावल भुट्टो भी हैं, यूं शिरकत न करते। जरदारी की एक तकरीर ने पीपीपी को न सिर्फ बहस के केंद्र में ला दिया, बल्कि फौजी तानाशाही के खिलाफ संघर्ष की इसकी पुरानी साख को भी जिंदा कर दिया। इस वक्त पार्टी को इसकी सख्त जरूरत थी। बहरहाल, असमंजस में फंसे वजीर-ए-आजम की मजबूरी है कि वह इसमें दखल दें, क्योंकि मुख्तलिफ इदारों के बीच मेल-मिलाप कायम रखना वक्त की मांग है। यदि हालात बिगड़े, तो मियां शरीफ को किसी एक के साथ खड़ा होना पड़ेगा।
द नेशन, पाकिस्तान

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