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कचरे के पहाड़ से हादसा

श्रीलंका ने हाल के वर्षों में कई प्राकृतिक आपदाएं, कई हादसे झेले हैं, लेकिन पहली बार हुआ, जब कचरे का विशाल ढेर ढहने से बड़ी तबाही झेली। कोलंबो की इस घटना में 20 से ज्यादा जानें गईं। कुछ लोग लापता हैं, कुछ जख्मी। इसे मानवजनित पहाड़ के दरकने से हुआ हादसा कहना गलत नहीं होगा। घटना कोलंबो और हमारे नगरीय प्रशासन की कूड़ा निस्तारण योजना व तकनीक पर सवाल  है। इसने बताया है कि किस तरह कई दशकों से हमने अपना सोच नहीं बदला, जबकि शहर की आबादी और जरूरतें अप्रत्याशित रूप से बदली हैं।

यहां आज भी पारंपरिक तरीके ही कूड़ा कलेक्शन हो रहा है और निस्तारण की वैज्ञानिक तकनीक न होने से जगह-जगह कूड़े के पहाड़ बन गए हैं। सिंहला में नववर्ष के दिन ऐसे ही 91 मीटर ऊंचे पहाड़ के दरकने से हादसा हुआ। इसने तंत्र की नाकामी भी बेनकाब की कि इतने बड़े खतरे की किसी ने चिंता तक न की। प्राकृतिक आपदा पर आपका वश नहीं है, लेकिन यह तो आपके द्वारा पैदा की गई समस्या है, जो आपदा बनकर आई। जिम्मेदारों ने न सिर्फ इसकी अनदेखी की, बल्कि आस-पास के लोगों को इसके खतरों के प्रति आगाह करना भी जरूरी नहीं समझा। किसी को सूझा ही नहीं कि विशाल अट्टालिकाओं में तब्दील होता, आर्थिक विकास की रफ्तार से होड़ लेने को बेचैन यह शहर अपने अंदर नए किस्म का खतरा भी पैदा कर रहा है। कोलंबो को सिंगापुर बनाने का सपना देख रहे राजनेता इस खतरे से अनजान कैसे रह सकते हैं, जो उनके सपनों के महल से महज एक-दो किलोमीटर की दूरी पर आकार ले लेता है।

उन्हें अपना सिंगापुर बनाने का सपना पालने से पहले यह भी देख लेना चाहिए कि उस सिंगापुर ने ऐसी मुश्किलों का हल कैसे निकाला? वह दक्षिण-पूर्व एशिया का सबसे स्वच्छ शहर कैसे बन गया? इस हादसे ने ‘गुड गवर्नेंस’ का झंडा उठाए हमारे सिस्टम को भी आगाह किया है कि किसी भी देश का समेकित विकास कचरा निस्तारण की वैज्ञानिक तकनीक अपनाए बिना नहीं हो सकता। उन्हें यह भी सिखाया है कि कचरे का ढेर इतना विशाल कैसे हो सकता है कि जनता के लिए खतरा बन जाए?  
 सिलोन टुडे, श्रीलंका
 

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  • Web Title:incident from the mountain of garbage in sri lanka