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ऐतिहासिक फैसला

नेपाल के न्यायिक इतिहास में पहली बार किसी नागरिक अदालत ने सैन्य अफसरों को सजा सुनाई है। कावरे जिला अदालत ने नेपाली सेना के पूर्व कर्नल बॉबी खेत्री के साथ कैप्टन अमित पुन व सुनील अधिकारी को एक दशक से भी अधिक पुराने मामले में, जिसमें मैना सुनुवार की हिरासत में मौत हो गई थी, दोषी पाया और आजीवन कारावास की सजा सुनाई है। हालांकि इसी मामले में तत्कालीन मेजर और सेनाकर्मी निरंजन बासनेत को इस आधार पर बरी कर दिया कि वह महज आदेश का पालन कर रहे थे। मामला 17 फरवरी, 2004 का है, जब देश में युद्ध जैसे हालात थे और सेना ने माओवादियों से मिलीभगत के आरोप में सुनुवार को हिरासत में लिया था और आर्मी शिविर में यंत्रणा देकर उनकी हत्या कर दी गई थी। इस मामले की अनुगूंज दुनिया भर में पहुंची। 2005 में एक सैन्य ट्रिब्यूनल ने इसे एक हादसा मानते हुए सेना के अफसरों को महज गलत आचरण का दोषी माना था। हालांकि सुनुवार की मां की अपील और मानवाधिकार संगठनों के लगातार दबाव ने मामले को ताजा परिणति तक पहंुचाया है। फैसले ने न सिर्फ इस मामले की भयावहता का एहसास कराया है, बल्कि उन तमाम परिवारों के मन में भी उम्मीद जगा दी है, जो बरसों से उन दिनों की त्रासदी के घाव दबाए न्याय का इंतजार कर रहे हैं। दुर्भाग्यवश अभी यह साफ नहीं है कि इनकी सजा पूरी कैसे होगी? इन शंकाओं के पीछे कई उदाहरण हैं, जब सजा के बावजूद गिरफ्तारी नहीं हुई।

ऐसे में, सुनुवार की मां की इस बात से असहमति का कोई कारण नहीं है कि न्याय तभी माना जाएगा, जब सरकार अदालत के आदेश का पालन कराकर सजायाफ्ता लोगों को सलाखों के पीछे पहुंचाए। सरकार ने ऐसे मामलों के निस्तारण के लिए गठित अदालतों का कार्यकाल एक वर्ष के लिए भले बढ़ा दिया, पर कड़े फैसले का अधिकार न दिए जाने से भी लोगों में संदेह है। भूलना नहीं चाहिए कि इन मामलों में न्याय में विलंब न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर फिर से इसे मुद्दा बना सकता है, बल्कि यह आम जनमानस में भी असंतोष का कारण बनेगा। तमाम लोगों में उस दौर के जख्म अब भी ताजा हैं।

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  • Web Title:historic decision
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