Image Loading women of violence - Hindustan
सोमवार, 27 मार्च, 2017 | 10:18 | IST
Mobile Offers Flipkart Mobiles Snapdeal Mobiles Amazon Mobiles Shopclues Mobiles
खोजें
ब्रेकिंग
  • बॉलीवुड मसाला: दूसरे दिन 'फिल्लौरी' ने पकड़ी रफ्तार, कमाए इतने करोड़, यहां पढ़ें,...
  • भारतीय नागरिकता मिलने के दो दिन बाद ही शॉन टैट ने क्रिकेट के हर फॉरमैट से...
  • #INDvsAUS: तीसरे दिन का खेल शुरू, टीम इंडिया का स्कोर 248/6, रिद्धमान साहा (10) और रविंद्र...
  • टॉप 10 न्यूज: यूपी में आज भी हड़ताल पर होंगे मीट और मछली व्यापारी, सुबह 9 बजे तक की...
  • हिन्दुस्तान ओपिनियन: बिमटेक के डायरेक्टर हरिवंश चतुर्वेदी का विशेष लेख- पिछड़ता...
  • पंजाब: गुरदासपुर में BSF जवानों ने पहाड़ीपुर पोस्ट के पास एक पाकिस्तानी...
  • हेल्थ टिप्स: सीढ़ी चढ़ने से कम होता है हार्ट अटैक का खतरा, क्लिक कर पढ़ें
  • मौसम दिनभर: दिल्ली-एनसीआर, लखनऊ, पटना, रांची और लखनऊ में होगी तेज धूप।
  • ईपेपर हिन्दुस्तान: आज का समाचार पत्र पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
  • आपका राशिफल: मिथुन राशि वालों के आय में वृद्धि होगी, अन्य राशियों का हाल जानने के...
  • सक्सेस मंत्र: अवसर जरूर द्वार खटखटाते हैं, बस पहचानना आना चाहिए, क्लिक कर पढ़ें
  • टॉप 10 न्यूज: कश्मीर में आतंक-PDP मंत्री के घर पर हमला, दो पुलिसकर्मी हुए घायल, अन्य...

हिंसा की मारी औरतें

द डेली स्टार, बांग्लादेश First Published:17-03-2017 09:48:30 PMLast Updated:17-03-2017 09:48:30 PM

ब्राक (बिल्डिंग रिसोर्सेज अक्रॉस कम्युनिटीज) ने अपने एक ताजा अध्ययन में पाया है कि साल 2016 में बांग्लादेश में कम से कम 7,489 औरतें व लड़कियां हिंसा का शिकार बनीं। इस अध्ययन का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि हिंसा की शिकार औरतों व लड़कियों में 20 फीसदी मासूम बच्चियां थीं। बीते साल औसतन हर रोज दो बच्चियों के ऊपर बलात्कार जैसा जुल्म हुआ। ये आंकड़े निहायत शर्मनाक और परेशान करने वाले हैं। ये औरतों के साथ बर्बरता की दारुण तस्वीर उकेरते हैं। हम तकरीबन रोज ही बलात्कार और यौन उत्पीड़न की वारदात की खबरें छापते हैं। यह सूरतेहाल तब है, जब कि कई सारी घटनाएं दर्ज नहीं कराई जातीं, इसलिए 7,489 का आंकड़ा इस समस्या की मुकम्मल तस्वीर सामने नहीं लाता। ये आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि औरतों के खिलाफ हिंसा की घटनाएं मुल्क में काफी तेजी से बढ़ रही हैं। साल 2014 में 2,873 औरतें हिंसक घटनाओं का शिकार हुई थीं। इससे यह भी जाहिर होता है कि घरेलू हिंसा को रोकने की हमने जितनी भी तज्वीजें कीं, वे सब नाकाम रहीं। ब्राक की रिपोर्ट इस बात की खुली तस्दीक है, क्योंकि औरतों के साथ मार-पीट और जुल्म की अस्सी फीसदी घटनाएं घर की चारदीवारी के भीतर हुईं। आखिर तमाम सरकारी, गैर-सरकारी कवायदों के बावजूद यह स्थिति क्यों है? जाहिर है, कानून का ईमानदारी से पालन नहीं हो रहा। हमें ऐसे इदारे चाहिए, जो खवातीन के मसलों को लेकर संजीदा हों और ऐसे मुकदमों को तेजी से निपटाएं। गुनहगारों का सजा से बच जाना, न सिर्फ इंसाफ की राह में दुश्वारियां पैदा करता है, बल्कि इस वजह से पीड़ित औरत या बच्ची के खानदान वाले भी खौफ के साये में रहते हैं। ऐसी घटनाओं के खिलाफ बहस तो खूब होती है, मगर कानून लागू करने वाली एजेंसियां अपने फर्ज नहीं निभा पातीं। इस लिहाज से कानून के बारे में सही जानकारी के अलावा उनको ईमानदारी से लागू किए जाने की भी जरूरत है। हम प्रशासन से यही अपील कर सकते हैं कि वह ब्राक के अध्ययन को गंभीरता से ले और मुल्क में एक ऐसा माहौल बनाए, जिसमें कहीं कोई औरत खौफजदा न हो।

जरूर पढ़ें

 
Hindi News से जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
Web Title: women of violence
 
 
 
अन्य खबरें
 
From around the Web
जरूर पढ़ें
क्रिकेट स्कोरबोर्ड
संबंधित ख़बरें