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पानीदारों की बस्ती में न पान रहा, न पानी

पानीदारों की बस्ती में न पान रहा, न पानी

चरखारी, महोबा। उत्तर प्रदेश के इस चुनावी दौरे में ‘गुड गवर्नेंस’ का आदर्श उदाहरण इस छोटे और निर्जनप्राय कस्बे में देखने को मिला। वह यह कि जैसे ही हम यहां पहुंचे हमारा सामना निर्मल जल से लबालब भरे तालाबों से हुआ। इस कुख्यात जिले में जहां पानी कहीं-कहीं जमीन से 200 फीट तक खुदाई के बाद मयस्सर नहीं होता, वहां यह नजारा देखने लायक था।

पूछने पर मालूम पड़ा कि यहां एक जिलाधिकारी हुआ करते थे वीरेश्वर सिंह। वह जब यहां तैनात किए गए, तब हर ओर अवर्षण की वजह से सूखा पड़ा हुआ था। सारे जलस्रोत सूख गए थे और प्यासे कंठ लिए छुट्टे पशु हर ओर दिखते थे। सिंह ने जरूरत पड़ी तो खुद कुदाल उठाई। लोगों को इकट्ठा किया। सरकारी पैसे का दुरुपयोग होने से रोका। नतीजा सामने है। सात साल बाद जब यहां वर्षा हुई तो उसके जल ने जिले के सारे जलस्रोतों को भर दिया।

कुछ दिन पहले सिंह का यहां से स्थानांतरण कर दिया गया, पर वह लोगों के दिलोदिमाग पर गहरी छाप छोड़ गए हैं। लगभग 200 वर्ष पूर्व राजा विजय सिंह ने इन तालाबों को खुदवाया था। इनको पुनर्जीवन दिया वीरेश्वर सिंह ने।

पर यह तस्वीर का एक छोटा और हसीन पहलू है। महोबा के लोग अपने गौरवशाली अतीत को याद कर आज भी उदास हो जाते हैं। वीर बुंदेलों की इस भूमि ने आल्हा-ऊदल को जन्म दिया था। उन्होंने दिल्ली नरेश पृथ्वीराज चौहान तक को धूल चटा दी थी। यहां यह बताने में कोई हर्ज नहीं कि आल्हा-ऊदल वैसे ही काव्यात्मक चरित्र बन गए हैं, जैसे कि कोई अन्य अजर-अमर सूरमा।
सावन के दिनों में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश के गांवों में ‘आल्हा’ गाया जाता है, जो उनके शौर्य की गाथा है।
आल्हा-ऊदल आज होते तो यकीनन उन्हें एक लड़ाई खनन और क्रशर माफिया से भी लड़नी होती। बुंदेलखंड जो कभी दर्जनों छोटी नदियों का इलाका हुआ करता था, आज बेपानी हो गया है। अवैध खनन ने तमाम नदियों को सूखने या धारा मोड़ने पर मजबूर कर दिया है।
एक बात और, कभी महोबा का पान देश-विदेश में मशहूर हुआ करता था। पुराने लोग बताते हैं कि उस वक्त यात्री गाड़ियों में भी एक मालगाड़ी का डिब्बा लगाया जाता था, जिसमें यहां से पान का पत्ता लोड किया जाता था। हुकूमतों की अनदेखी ने पानी की तरह पान की मर्यादा भी खत्म कर दी है। पहले कभी यहां 438 एकड़ में पान का पत्ता उगाया जाता था, जो अब सिमटकर बमुश्किल 100 एकड़ रह गया है।


इसी का नतीजा है कि सारे इलाके में किसी से भी पूछो कि यहां का क्या मशहूर है अथवा यहां किस वस्तु का व्यापार आमतौर पर किया जाता है तो वे मुंह फाड़ देते हैं। इसी हफ्ते यहां के लोग एक बार फिर वोट डालेंगे, पर इसका उनको फायदा क्या होगा, इसकी भी जानकारी किसी को नहीं।
चुनावों ने अगर किसी को फायदा पहुंचाया है तो वह है नेताओं की जमात। आम आदमी जिसके पूर्वज कभी पानीदार हुआ करते थे, आज पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसता है।
(साथ में : के.के. उपाध्याय और सुनील द्विवेदी )

देशावरी का ‘दम’ फूला
महोबा के पानों में ‘देशावरी’ का खास स्थान है। इसकी सऊदी अरब, पाक और बांग्लादेश जैसे मुल्कों में काफी मांग है।

आंकड़े बोलते हैं
2012 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों के दौरान ललितपुर जिले में सबसे अधिक मतदान हुआ था
सर्वाधिक मतदान प्रतिशत वाले पांच जिले
- ललितपुर 72.65%
- सहारनपुर 70.89%
- जेपी नगर 69.11%
- पीलीभीत 67.71%
- सीतापुर 65.38%

सबसे कम मतदान प्रतिशत वाले पांच जिले
- देवरिया 51.92%
- गोरखपुर 52.77%
- बलिया 53.02%
- संतकबीरनगर 53.52%
- प्रतापगढ़ 53.69%

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  • Web Title:in bundelkhand no water no pan