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बदलते बनारस में चुनाव

बदलते बनारस में चुनाव

वाराणसी। बनारस की गलियों और सड़कों में भटकना उस बदलाव को देखना है, जो धीमे-धीमे आकार लेता है लेकिन अपने पुरानेपन को कभी नहीं छोड़ता।

राजनीतिक दृष्टि से बेहद सचेतन इस शहर की गुरुवार को जब परिक्रमा शुरू की तो सड़कें कुछ बदली नजर आईं। अतिक्रमण हटाने की कोशिश की गई है, बीच में डिवाइडर लगाए गए हैं, और गड्ढों को पाटने का भी प्रयास हुआ है। ये बात अलग है कि फक्कड़ बनारसी सहजता से कायदे-कानून को स्वीकार नहीं करते। लिहाजा पुराने कलेक्टर के तबादले के साथ अतिक्रमण फिर से चालू हो गया है। हालांकि, लोग लालबत्ती देखकर रुकने लगे हैं और ट्रैफिक रेंगता हुआ ही सही कुछ स्थानों पर आगे बढ़ता रहता है। कभी ये लाल-पीली-हरी बत्तियां सिर्फ शोभा की वस्तु होती थीं।

इसी तरह घाट और उनकी ओर ले जाने वाली गलियों में तब्दीली दीखती है। दशाश्वमेध से अस्सी तक सीढ़ियां दुरुस्त की गई हैं। गंगा-स्नान के बाद कपड़े बदलने के लिए ‘ओट’ की व्यवस्था की गई है। कूड़ेदान लगा दिए गए हैं। नतीजतन, गंगा भी कुछ साफ-सुथरी नजर आती है। यह बात अलग है कि घाटों की पक्की सीढ़ियों पर जगह-जगह पान की पीक के दाग हैं। बनारस अब तक इनके बिना अधूरा माना जाता रहा है।

केंद्र और राज्य सरकारों की ऐसी कुछ और कोशिशें हैं पर यह सच है कि ‘काशी’ और ‘क्योटो’ में अभी भी दूरी है। जिस शहर में अनगिनत पान और चाय की दुकानें हों, वहां बतकही न हो ऐसा संभव नहीं। जितने मुंह, उतनी बातें। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की चारदीवारी से सटे सीर गोवर्धनपुर में रुककर पूछता हूं कि किसकी हवा चल रही है? बदले में मुंह में पान भरे, माथे पर तिलक लगाए शख्स सवाल उछाल देते हैं-‘आप ही बताइए?’ आप इस शहर में किसी से पूछ देखिए, वो सीधा जवाब नहीं देगा। बतकही को लंबा खींचना काशीवासियों का प्रिय शगल है। वे इसे छोड़ना नहीं चाहते।

हालांकि थोड़ी मशक्कत के बाद वे खुलने लगते हैं और जब बोलते हैं, तो बेलाग बोलते हैं। मैं चौंक गया, जब एक नौजवान ने कहा कि मुझे सुरक्षा चाहिए। मैंने उससे आशय पूछा, तो उसने कहा कि हमें हमारी बिरादरी में ही सुरक्षा का एहसास होता है। मुजफ्फरनगर के एक गांव में भी सुरक्षा की बात उठाई गई थी। वहां इसका आशय धार्मिक गोलबंदी से था। दोनों जगह मामला जाति अथवा धर्म का या कानून-व्यवस्था का नहीं। क्या उत्तर प्रदेश एक तरीके से सोचता है? जवाब में कहा जा सकता है-काफी कुछ। धुर पश्चिम से लेकर पूर्वांचल की इस राजधानी तक जाति और धर्म प्रमुखतम मुद्दे हैं। लोग बातें कितनी भी लंबी-चौड़ी करें, पर अंत में वे इसी पर लौट आते हैं। मसलन, बनारस में चाय की दुकान चलाने वाली महिला ने सामने की ओर इशारा करके कहा कि इधर ‘अहिराना’ है। ये गठबंधन को वोट देंगे। पीछे ‘बामन’ रहते हैं, वो भाजपाई हैं। मदनपुरा और रामापुरा में अगर गठबंधन की ओर रुझान था तो पीछे घाट पर निषाद भाजपा की वकालत कर रहे थे। होटल के सफाईकर्मी को यह कहने में गुरेज नहीं था वह बहनजी को वोट देगा। 

अन्य पड़ोसी जिलों में भी इसी तरीके से जातीय तथा धार्मिक गठजोड़ों के आधार पर वोट पड़ने हैं। यही इस त्रिकोणीय संघर्ष का नसीब तय करेंगे। पार्टियों के लोगों के दावे जो भी हों, पर मतदाताओं की मुखरता तटस्थ प्रेक्षकों को सिर खुजाने पर मजबूर कर देती है। अपने इस लंबे चुनावी दौरे के दौरान कुछ सवाल मन को निरंतर मथते रहे कि क्या जातियों के बंधन कभी ढीले पड़ेंगे? क्या विकास के नारे महज रस्मी तौर पर लगाए जाते हैं?  देश का यह सबसे बड़ा सूबा सदियों पुरानी रवायतों को नहीं छोड़ेगा तो आगे कैसे बढ़ेगा? उत्तर के लिए मुझे भी 11 मार्च की प्रतीक्षा है।    (चुनावी यात्रा यहीं समाप्त होती है) 

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  • Web Title:election in varanasi