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अश्विनी आदि हैं गण्ड मूल के नक्षत्र
First Published:25-03-13 10:18 PM

गण्ड मूल के नक्षत्रों में जन्म लेने वाले जातकों पर क्या प्रभाव पड़ता है?
- कुसुमलता, झरिया, झारखंड
‘जातका भरणम’, ‘जातक पारिजात’ और ‘ज्योतिष पाराशर’ ग्रंथों में गण्डांत या गण्ड मूल नक्षत्रों का उल्लेख है। मुख्यत: वे नक्षत्र, जिनसे राशि और नक्षत्र दोनों का ही प्रारम्भ या अंत होता है, वे इस श्रेणी में आते हैं। इस तरह अश्विनी, आश्लेषा, मघा, ज्येष्ठा, मूल और रेवती नामक नक्षत्र गण्ड मूल नक्षत्र हैं। इन सभी नक्षत्रों के स्वामी या तो बुध हैं या केतु। शास्त्रों में इन सभी नक्षत्रों में जन्म लेने वाले जातकों के लिए जन्म से ठीक 27वीं तिथि को मूल शांति आवश्यक बताई गई है। वैसे इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले जातकों के जीवन में किसी तरह की नकारात्मक स्थिति होती है, ऐसा नहीं है। लेकिन इन जातकों के लिए धन-हानि और अर्जित निधि को खोने की आशंकाएं बनी रहती है। अश्विनी, मघा और मूल नक्षत्र के चतुर्थ चरण में जन्म लेने वाले जातक जीवन में सफल होते हैं, वहीं रेवती नक्षत्र के तृतीय चरण में जन्म लेने वाले जातक भाग्यशाली होते हैं।

अष्टगंध क्या है? इसका क्या महत्व है?
- प्रभु दयाल, बक्सर, बिहार
कर्मकांड और भिन्न-भिन्न देवी-देवताओं के यंत्र को लिखते समय अष्टगंध का प्रयोग होता है। अष्टगंध जैसा कि नाम से जाहिर है, आठ प्रकार की वस्तुओं को मिला कर ही बनता है। लेकिन विद्वानों में इसे लेकर मतभेद हैं। शैव संप्रदाय के लोग इनमें ये वस्तुएं प्रमुख मानते हैं- चंदन, अगरू, कपरूर, तमाल, पानी या जल, कंकु, कुशीत और कुष्ठ। इसके ठीक विपरीत- कुंकुम, अगरू, चंद्रभाग, कस्तूरी, त्रिपुरा, गोरोचन, तमाल और जल को बराबर-बराबर हिस्सों में मिला कर बनने वाली वस्तु को अष्टगंध कहते हैं। शाक्त और कहीं-कहीं शैव इसे ही अष्टगंध के रूप में स्वीकार करते हैं। वैष्णवों को चंदन, अगरू, हीरवेर, कुष्ठ, कुंकुम, सेव्यका, जटामांसी और मुर द्वारा बनाई गई अष्टगंध सर्वाधिक प्रिय है। कालिकापुराण में इसका विस्तार से वर्णन है। बिल्कुल चूर्ण की बनी हुई, आग में भस्म के रूप में बदल चुकी हो या फिर अच्छी तरह छान कर बनाई गई गंध देवी-देवताओं को विशेष प्रकार का सुख प्रदान करने वाली मानी गई है।
(इस दूसरे प्रश्न का समाधान पं. भानुप्रतापनारायण मिश्र ने दिया है)

 
 
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