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शिखर संत कवि नरसिंह मेहता
डॉ. संतोष कुमार तिवारी First Published:17-12-2012 10:49:41 PMLast Updated:00-00-0000 12:00:00 AM

जिस प्रकार किसी फूल की महक को शब्दों में बयां करना कठिन है, उसी प्रकार गुजराती के शिखर संत कवि नरसिंह मेहता की कृष्ण-भक्ति का वर्णन करना भी मुश्किल है। 15वीं शताब्दी के इस शीर्ष कवि का एक भजन महात्मा गांधी की दैनिक प्रार्थना का अंग था- ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए, पीड़ पराई जाणे रे। पर दु:खे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आने दे॥’(अर्थात सच्चा वैष्णव वही है, जो दूसरे की पीड़ा को समझता हो। दूसरे के दुख पर जब वो उपकार करे तो अपने मन में कोई अभिमान न आने दे।)

ब्रिटिश फिल्म निदेशक रिचर्ड एटेनबरो ने महात्मा गांधी पर जो फिल्म बनाई थी, उसमें भी यह भजन है। फिल्म में इस भजन को लता मंगेशकर ने गाया है और सितार पंडित रविशंकर ने बजाया है। सौराष्ट्र, गुजरात, में जन्मे नरसिंह राम की आयु जब पांच वर्ष थी तो उनके माता-पिता का देहांत हो गया था। उनका लालन-पालन उनके बड़े भाई और दादी ने किया था। लोग उन्हें गूंगा राम भी कहते थे। लगभग आठ वर्ष की उम्र तक उनका कंठ नहीं खुला था। फिर एक दिन उनके कान में एक साधु ने कुछ कहा तो उनके मुंह से निकला- ‘राधे कृष्ण राधे कृष्ण।’ कहा जाता है कि भगवान कृष्ण स्वयं साधु भेष में उनके पास आए थे।
वह कमाते-धमाते नहीं थे तो उनकी दादी की मृत्यु के बाद उनके भाई-भावज ने उन्हें घर से निकाल दिया था। नरसिंह मेहता का जीवन अलौकिक घटनाओं से भरा हुआ है। कहा जाता है कि वह जो करताल बजाते थे, वह भी भगवान श्रीष्ण ने स्वयं उनको दी थी। भगवान स्वयं उनकी पुत्री की शादी में भी आए थे। उनकी कृष्ण-भक्ति इतनी अधिक थी कि जब धनाभाव में उनकी इज्जत जाने की नौबत आ जाती थी तो भगवान श्रीकृष्ण स्वयं कोई अवतार लेकर उन्हें बचाने उसी प्रकार आते थे, जिस प्रकार वह द्रौपदी की इज्जत बचाने के लिए चीरहरण के समय आए थे।

नरसिंह मेहता नागर ब्राह्मण थे। एक बार वह निम्न जाति के एक व्यक्ति के घर पर भजन-कीर्तन करने गए। इस कारण उनकी बढ़ती लोकप्रियता से ईर्ष्यालु नागर ब्राह्मणों ने उन्हें अपनी जाति से बहिष्कृत कर दिया था।
गुजराती भाषा में नरसिंह मेहता का एक और भजन है- ‘नारायणनु नामज लेतां, बारे तेने तजियेरे।’ इस पूरे भजन का हिंदी में भावार्थ है- नारायण का नाम लेने से जो रोकता है, उसका त्याग कर दें। इसी कारण प्रह्लाद ने पिता को त्यागा था। इसीलिए भरत-शत्रुघ्न ने अपनी माता का त्याग किया था, परंतु श्रीराम को नहीं छोड़ा था।

 
 
 
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