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रियो की राह दिखी
First Published:08-08-12 09:31 PM
निशानेबाजी: विजय की जयकार यानी अच्छे आसार
दुर्भाग्य से बीजिंग ओलंपिक के हीरो अभिनव बिंद्रा की गन नहीं गरजी और रोंजन सोढी भी चूक गए, लेकिन गगन नारंग ने 10 मीटर एयर राइफल में कांस्य, फिर अनजान विजय ने लगातार तीसरे ओलंपिक में भारत को थोड़ा मुस्कराने का मौका दिया। जॉयदीप करमाकर का प्रदर्शन भी काबिले गौर रहा है। वह कांस्य पदक बेहद करीबी मुकाबले में चूक गए। गुजरे कुछ वर्षों में एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ और वल्र्ड चैंपियनशिप जैसे बड़े मंच पर भारतीय निशानेबाज गहरी छाप छोड़ते रहे हैं, शायद इसी कारणवश लंदन में अपेक्षाएं ज्यादा थीं। शूटिंग में गोल्ड भले ही हाथ न लगा हो, लेकिन पदकों की संख्या जरूर दोगुनी हो गई। अगर महिलाओं के प्रदर्शन पर नजर दौड़ाएं तो हीना सिद्धू से पदक की उम्मीद थी, लेकिन वह 10 मीटर एयर पिस्टल क्वॉलिफिकेशन में 12वें और राही सरनोबत 25 मीटर एयर पिस्टल क्वॉलिफिकेशन में 11वां स्थान ही हासिल कर पाईं।
बैडमिंटन: अच्छी दशा और दिशा
बैडमिंटन के पांचों स्वर्ण चीन के खाते में गए हैं, लेकिन एक कांस्य पर साइना ने झपट्टा मार ही दिया। सुपर साइना का यह कांस्य बैडमिंटन में भारत की स्थिति सुधारेगा। पुरुषों में पी. कश्यप भी खास खिलाड़ी बन गए हैं। एकल में मलेशियाई दिग्गज ली चोंग वेई से हार के पहले उनका प्रदर्शन ध्यान खींचने वाला रहा। बैडमिंटन में भारत का ग्रास रूट मजबूत है और इसके परिणाम सामने हैं। फिलहाल भारत की सफलताओं में कोच गोपीचंद और गाची बाउली स्थित बैडमिंटन अकादमी (हैदराबाद) का रोल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बॉक्सिंग: बेहतर कल
महिलाओं के 51 कि.ग्रा. वजन वर्ग में मणिपुरी मैरीकोम ने पदक पक्का कर बॉक्सिंग में गलत फैसले का शिकार रहे भारत के पुरुष मुक्केबाजों को हल्की तसल्ली दी। महिलाओं की बॉक्सिंग को लंदन ओलंपिक में पहली बार शामिल किया गया है। मैरीकोम 48 किग्रा. कैटेगरी की बॉक्सर रही हैं, लेकिन उन्होंने 51 किलो के वर्ग में भी खुद को ढाल लिया है। ऐसा करना आसान नहीं होता। इस स्टार मुक्केबाज की राहें आसान नहीं थीं। मैरी को बमुश्किल ओलंपिक का टिकट मिला था। वह फॉर्म में भी नहीं थीं, लेकिन अनुभव का पूरा फायदा उठा कर आखिर मैरी ने मेडल जीता। मुक्केबाजी में कुछ और पदक भी भारत की झोली में गिर सकते थे। भारत की सबसे बड़ी उम्मीद विजेंदर, 75 किग्रा. वर्ग में क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ सके, जबकि रैंकिंग न होने के बावजूद देवेन्द्रो ने चौंकाया। सुमित सांगवान, विकास कृष्ण और मनोज कुमार गलत फैसले का शिकार हुए। कुछ मामलों में तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने रेफरियों पर अंगुली उठाई और एक्शन भी लिया। इसके बावजूद बीजिंग ओलंपिक में भारतीय बॉक्सरों ने जो लकीर खींची थी, लंदन पहुंचते-पहुचते वह और गहरी हो गई।
तीरंदाजी: ‘अजरुन’ नहीं बन सका कोई
भारत की सबसे बड़ी उम्मीद दीपिका कुमारी थीं, लेकिन वह पदक राउंड तक भी नहीं पहुंच सकीं। दीपिका के अलावा बोम्बायला देवी, चेक्रोवालू स्वूरो, तरुणदीप राय, राहुल बनर्जी और जयंत तालुकदार सरीखे तीरंदाज थे, लेकिन कोई भी ‘अजरुन’ नहीं बन सका। कहा जा रहा है कि मीडिया का दबाव, ब्रिटेन का मौसम भारतीय तीरदांजों को रास नहीं आया। हालांकि ये सब बहाने हैं। सच यह है कि करोड़ों के खर्च के बावजूद भारत को मायूसी मिली। पूर्व अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज संजीव सिंह का कहना सही है कि कमजोर प्लानिंग से पदक नहीं मिला।
टेनिस: रास नहीं आई आपसी लड़ाई
आपसी झगड़ों के चलते टेनिस में देश को खाली हाथ लौटना पड़ा। महेश भूपति लाख कहें कि देश उनके लिए सबसे ऊपर है, लेकिन ओलंपिक से ठीक पहले उन्होंने लिएंडर पेस के साथ न खेलने का सार्वजनिक ऐलान कर दिया। उनके हठीले रवैये से ही भारत का दावा कमजोर हो गया। हालांकि टीम संयोजन को सटीक नहीं बनाने में अखिल भारतीय टेनिस संघ भी कम दोषी नहीं है। अगर पेस और भूपति अपने गिले-शिकवों को दूर कर कोर्ट में उतरते तो पुरुष युगल और हाल ही में फ्रेंच ओपन चैम्पियन भूपति-सानिया मिक्स्ड डबल्स में साथ होते, तब दो पदक और भारत की झोली में गिर सकते थे।
एथलेटिक्स : उम्मीद की किरण तो दिखी
एथलेटिक्स में उम्मीदों का दामन कृष्णा पूनिया और विकास गौड़ा थामे हुए थे। कृष्णा काफी तैयारियों के साथ लंदन गई थीं। वह भले ही अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन दोहरा न पाई हों, लेकिन चैम्पियनों के बीच भारत की मौजूदगी का अहसास कराया। विकास गौड़ा ने भी सुनहरे पलों की झलक दिखाई है।
हॉकी: फिर गंवाया मौका
भारत को लीग के पांचों मैचों में हारना पड़ा। आठ गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय हॉकी रसातल में समा गई है। हमें 11वीं और 12वीं पोजिशन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आस्ट्रेलियाई कोच माइकल नोब्स इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए माफी मांग चुके हैं।
दुर्भाग्य से बीजिंग ओलंपिक के हीरो अभिनव बिंद्रा की गन नहीं गरजी और रोंजन सोढी भी चूक गए, लेकिन गगन नारंग ने 10 मीटर एयर राइफल में कांस्य, फिर अनजान विजय ने लगातार तीसरे ओलंपिक में भारत को थोड़ा मुस्कराने का मौका दिया। जॉयदीप करमाकर का प्रदर्शन भी काबिले गौर रहा है। वह कांस्य पदक बेहद करीबी मुकाबले में चूक गए। गुजरे कुछ वर्षों में एशियन गेम्स, कॉमनवेल्थ और वल्र्ड चैंपियनशिप जैसे बड़े मंच पर भारतीय निशानेबाज गहरी छाप छोड़ते रहे हैं, शायद इसी कारणवश लंदन में अपेक्षाएं ज्यादा थीं। शूटिंग में गोल्ड भले ही हाथ न लगा हो, लेकिन पदकों की संख्या जरूर दोगुनी हो गई। अगर महिलाओं के प्रदर्शन पर नजर दौड़ाएं तो हीना सिद्धू से पदक की उम्मीद थी, लेकिन वह 10 मीटर एयर पिस्टल क्वॉलिफिकेशन में 12वें और राही सरनोबत 25 मीटर एयर पिस्टल क्वॉलिफिकेशन में 11वां स्थान ही हासिल कर पाईं।
बैडमिंटन: अच्छी दशा और दिशा
बैडमिंटन के पांचों स्वर्ण चीन के खाते में गए हैं, लेकिन एक कांस्य पर साइना ने झपट्टा मार ही दिया। सुपर साइना का यह कांस्य बैडमिंटन में भारत की स्थिति सुधारेगा। पुरुषों में पी. कश्यप भी खास खिलाड़ी बन गए हैं। एकल में मलेशियाई दिग्गज ली चोंग वेई से हार के पहले उनका प्रदर्शन ध्यान खींचने वाला रहा। बैडमिंटन में भारत का ग्रास रूट मजबूत है और इसके परिणाम सामने हैं। फिलहाल भारत की सफलताओं में कोच गोपीचंद और गाची बाउली स्थित बैडमिंटन अकादमी (हैदराबाद) का रोल नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
बॉक्सिंग: बेहतर कल
महिलाओं के 51 कि.ग्रा. वजन वर्ग में मणिपुरी मैरीकोम ने पदक पक्का कर बॉक्सिंग में गलत फैसले का शिकार रहे भारत के पुरुष मुक्केबाजों को हल्की तसल्ली दी। महिलाओं की बॉक्सिंग को लंदन ओलंपिक में पहली बार शामिल किया गया है। मैरीकोम 48 किग्रा. कैटेगरी की बॉक्सर रही हैं, लेकिन उन्होंने 51 किलो के वर्ग में भी खुद को ढाल लिया है। ऐसा करना आसान नहीं होता। इस स्टार मुक्केबाज की राहें आसान नहीं थीं। मैरी को बमुश्किल ओलंपिक का टिकट मिला था। वह फॉर्म में भी नहीं थीं, लेकिन अनुभव का पूरा फायदा उठा कर आखिर मैरी ने मेडल जीता। मुक्केबाजी में कुछ और पदक भी भारत की झोली में गिर सकते थे। भारत की सबसे बड़ी उम्मीद विजेंदर, 75 किग्रा. वर्ग में क्वार्टर फाइनल से आगे नहीं बढ़ सके, जबकि रैंकिंग न होने के बावजूद देवेन्द्रो ने चौंकाया। सुमित सांगवान, विकास कृष्ण और मनोज कुमार गलत फैसले का शिकार हुए। कुछ मामलों में तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने रेफरियों पर अंगुली उठाई और एक्शन भी लिया। इसके बावजूद बीजिंग ओलंपिक में भारतीय बॉक्सरों ने जो लकीर खींची थी, लंदन पहुंचते-पहुचते वह और गहरी हो गई।
तीरंदाजी: ‘अजरुन’ नहीं बन सका कोई
भारत की सबसे बड़ी उम्मीद दीपिका कुमारी थीं, लेकिन वह पदक राउंड तक भी नहीं पहुंच सकीं। दीपिका के अलावा बोम्बायला देवी, चेक्रोवालू स्वूरो, तरुणदीप राय, राहुल बनर्जी और जयंत तालुकदार सरीखे तीरंदाज थे, लेकिन कोई भी ‘अजरुन’ नहीं बन सका। कहा जा रहा है कि मीडिया का दबाव, ब्रिटेन का मौसम भारतीय तीरदांजों को रास नहीं आया। हालांकि ये सब बहाने हैं। सच यह है कि करोड़ों के खर्च के बावजूद भारत को मायूसी मिली। पूर्व अंतरराष्ट्रीय तीरंदाज संजीव सिंह का कहना सही है कि कमजोर प्लानिंग से पदक नहीं मिला।
टेनिस: रास नहीं आई आपसी लड़ाई
आपसी झगड़ों के चलते टेनिस में देश को खाली हाथ लौटना पड़ा। महेश भूपति लाख कहें कि देश उनके लिए सबसे ऊपर है, लेकिन ओलंपिक से ठीक पहले उन्होंने लिएंडर पेस के साथ न खेलने का सार्वजनिक ऐलान कर दिया। उनके हठीले रवैये से ही भारत का दावा कमजोर हो गया। हालांकि टीम संयोजन को सटीक नहीं बनाने में अखिल भारतीय टेनिस संघ भी कम दोषी नहीं है। अगर पेस और भूपति अपने गिले-शिकवों को दूर कर कोर्ट में उतरते तो पुरुष युगल और हाल ही में फ्रेंच ओपन चैम्पियन भूपति-सानिया मिक्स्ड डबल्स में साथ होते, तब दो पदक और भारत की झोली में गिर सकते थे।
एथलेटिक्स : उम्मीद की किरण तो दिखी
एथलेटिक्स में उम्मीदों का दामन कृष्णा पूनिया और विकास गौड़ा थामे हुए थे। कृष्णा काफी तैयारियों के साथ लंदन गई थीं। वह भले ही अपना श्रेष्ठ प्रदर्शन दोहरा न पाई हों, लेकिन चैम्पियनों के बीच भारत की मौजूदगी का अहसास कराया। विकास गौड़ा ने भी सुनहरे पलों की झलक दिखाई है।
हॉकी: फिर गंवाया मौका
भारत को लीग के पांचों मैचों में हारना पड़ा। आठ गोल्ड मेडल जीतने वाली भारतीय हॉकी रसातल में समा गई है। हमें 11वीं और 12वीं पोजिशन के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। आस्ट्रेलियाई कोच माइकल नोब्स इस शर्मनाक प्रदर्शन के लिए माफी मांग चुके हैं।
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