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राजा भैया का होगा पॉलीग्राफ परीक्षण, अदालत की इजाजत राजा भैया का होगा पॉलीग्राफ परीक्षण, अदालत की इजाजत
बदला चरित्र और चेहरा
डॉ. सुभाष कश्यप
First Published:09-05-12 07:52 PM
संसद का प्रमुख काम ही बदल गया है
पहले माना जाता था कि संसद का काम कानून बनाना है। वह विधायी संस्था है। इसीलिए संसद का 50 प्रतिशत समय कानून बनाने में लगता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछली 3 लोकसभा में संसद ने अपना केवल12 से 15 प्रतिशत समय ही कानून बनाने में खर्च किया है, जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अब संसद औसतन केवल 13 प्रतिशत समय ही कानून बनाने में खर्च करती है। यही वजह है कि जब भी संसद में किसी बिल पर बहस होती है तो अधिकांश सदस्यों की उपस्थिति न के बराबर होती है, जिससे साफ जाहिर है कि सदस्यों का रुझान भी इस काम में कम हुआ है, जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। पहले ऐसे मौकों पर सदस्य बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। खूब बहस होती थी।
पहले संसद में अभिजात्य वर्ग बैठता था, आज किसान वर्ग की अधिकता है
एक बड़ा बदलाव सदस्यों की पृष्ठभूमि को लेकर भी दिखाई देता है। पहले अधिकतर सदस्य अभिजात्य वर्ग के होते थे। वे देश के किसी महानगर या उपनगर में रहते थे। अधिकांश या तो विदेश के किसी बड़े शिक्षा संस्थान से पढ़ाई करके आते थे या भारत के किसी बेहद अच्छे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से शिक्षित होते थे। इनमें से अधिकांश तो वकील होते थे या फिर बेहद काबिल ऑडिटर्स या ऐसे ही किसी दूसरे क्षेत्र के अति-जानकार। खासतौर से पहली लोकसभा से 1962 तक ज्यादातर सदस्य ऐसी ही पृष्ठभूमि के थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज भारत के गांवों से भी लोग चुन कर संसद पहुंचते हैं। किसान वर्ग भी संसद में दिख रहा है, बल्कि आज तो अधिकांश सदस्य इसी वर्ग से आते हैं। भले वे गांवों में खेती न करते हों, मगर उनका संबंध ऐसे परिवारों से है, जिनकी पृष्ठभूमि में खेती है। यह बदलाव पिछली तीन या चार लोकसभा से दिखना शुरू हुआ है। भारत का आम वर्ग संसद में बैठ रहा है, यह एक अच्छी बात है। मगर इसका एक विपरीत असर भी दिखाई दे रहा है। दरअसल इस बदलाव की बाबत ही संसद में बहस का स्तर नीचे गिर गया है। चूंकि पहले बुद्धिजीवी वर्ग बड़ी संख्या में संसद में बैठता था, इसलिए बहस, वाद-विवाद और तर्क-वितर्क की संस्कृति बनी हुई थी, जो आज नदारद दिखती है। शायद इसीलिए आज अच्छे वक्ताओं की कमी भी खलती है। राष्ट्रीय मुद्दों पर हावी हो गईं स्थानीय समस्याएं
मुद्दों के मामले में भी संसद में बदलाव दिखते हैं। पहले अंतरराष्ट्रीय जगत की हलचलों पर संसद में चर्चा होती थी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू खुद एक सवाल इस विषय पर रखते थे। पर बाद के दिनों में विशेष रूप से इंदिरा गांधी के समय से यह परंपरा खत्म हो गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्दे संसद से गायब से होने लगे और राष्ट्रीय मुद्दे ज्यादा प्रखर या मुखर होते चले गए। लेकिन आज की स्थिति तो यह है कि राष्ट्रीय मुद्दे भी कम ही सुनने को मिलते हैं। स्थानीयता ज्यादा हावी हो गई है। कई बार तो संसद में ऐसे मुद्दों पर बहस होती है, जिन पर पंचायत या म्युनिसिपैलिटी में बहस होनी चाहिए। कमजोर हो गया है विपक्ष
पहले विपक्ष की स्थिति काफी मजबूत हुआ करती थी। भले विपक्ष संख्या में कम हो, लेकिन उसका प्रभाव काफी ज्यादा था। विपक्ष में बड़ी संख्या में दिग्गज लोग शामिल हुआ करते थे। डॉक्टर राम मनोहर लोहिया और राम नरेंद्र देव जैसे सशक्त नेता विपक्ष का हिस्सा थे, जिनकी बात काटना या टालना सरकार को भी अच्छा नहीं लगता था। इस संदर्भ में मुङो एक किस्सा याद आता है। राजगोपालाचारी उस समय जनता पार्टी से विपक्ष में थे। जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। एक बार राजगोपालाचारी ने किसी बात का समर्थन किया तो जवाहर लाल नेहरू ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि राजाजी को मालूम होना चाहिए कि बहुमत मेरे साथ है। इस पर राजगोपालाचारी ने जवाब दिया कि बहुमत आपके साथ होगा, मगर लॉजिक मेरे साथ है। यह जवाब सुन कर जवाहर लाल नेहरू ने उनकी बात मान ली। इस तरह से उस समय सरकार विपक्ष की बात मान लिया करती थी, क्योंकि विपक्ष की बातों में दम और गहरा प्रभाव होता था। स्पष्ट बहुमत से त्रिशंकु लोकसभा तक
पहले एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता था और वह सरकार बनाता था, जिससे उसकी स्थिति संसद में काफी मजबूत रहती थी। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछली कई लोकसभा से मिली-जुली सरकार बन रही है। ऐसे में सरकार की स्थिति भी कमजोर हो गई है। छोटी-मोटी पार्टियां भी आसानी से सरकार को ब्लैकमेल कर लेती हैं। सत्ता में बने रहने के लिए सरकार कई समझौते भी करती है। किसी अयोग्य व्यक्ति को मंत्री पद सौंप देती है या किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर से मुकदमे वापस ले लेती है। पहले चूंकि सरकार के पास अकेले बहुमत होता था, इसलिए ऐसी स्थितियां नहीं आती थीं। यही वजह है कि पहले सरकार अक्सर विपक्ष की बात मानने की दरियादिली दिखाती थी, लेकिन आज सरकार यह जोखिम नहीं उठा सकती। आज अगर सरकार विपक्ष की बात मानेगी तो उसे इसमें अपनी कमजोरी ही महसूस होगी। अनुशासनहीनता पर कड़ी कार्रवाई होती थी
आज जिस तरह से संसद में माइक फेंकना, गाली-गलौज करना या अपशब्दों का इस्तेमाल करना आम बात हो गई है, पहले ऐसा मुमकिन नहीं था। किसी भी तरह की अनुशासनहीनता पर कड़ी कार्रवाई की जाती थी। एक बार सदन में काफी शोर-गुल हो रहा था। अध्यक्ष की बात नहीं मानी जा रही थी। सदन चलने में भी रुकावट पैदा हो रही थी। ऐसी स्थिति में अनुशासनहीनता के आरोप में 63 सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया। बाद में उन सदस्यों ने माफी मांगी। इसका प्रभाव यह हुआ कि फिर ऐसी घटना नहीं हुई। आज इस तरह की कार्रवाई नहीं की जाती। चूंकि सरकार के पास बहुमत नहीं होता, इसलिए अमूमन वह अनुशासनहीनता की घटनाओं को नजरअंदाज कर देती है। उसे लगता है कि कहीं सरकार गिर न जाए।
(डॉक्टर कश्यप पूर्व लोकसभा महासचिव हैं। वह संविधान के अच्छे जानकारों में से एक हैं) ऐसी थी हमारी पहली लोकसभा
अवधि : 1952-57
गठन: 17 अप्रैल 1952
पहली बैठक: 13 मई 1952
कुल सदस्य: 499 (497 निर्वाचित व 2 नामांकित)
सदस्यों की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि
पेशा (संख्या प्रतिशत में)
- वकील: 35.6%
- किसान, जमींदार, भू-स्वामी: 22.4%
- कारोबारी व उद्योगपति: 12%
- पत्रकार व लेखक: 10.4%
- शिक्षक व शिक्षाशास्त्री: 9.9%
- डॉक्टर: 4.9%
- पूर्व शासक: 1.1% शैक्षिक पृष्ठभूमि
योग्यता (संख्या प्रतिशत में)
- स्नातक: 37%
- मैट्रिकुलेशन से कम: 23.2%
- पीएचडी तथा उच्च शिक्षा: 3.5% सदस्यों की औसत आयु: 45 वर्ष 8 माह
महिला सदस्यों की संख्या: 22 (कुल सदस्यों की 4.47%)
प्रमुख महिला सदस्य: रेणु चक्रवर्ती, सुचेता कृपलानी, राजकुमारी अमृत कौर, जयश्री रायजी, विजयलक्ष्मी पंडित, तारकेश्वरी सिन्हा। सत्ता पक्ष के प्रमुख सदस्य: पंडित जवाहरलाल नेहरू, पुरूषोत्तम दास टंडन, हरे कृष्ण माहताब
विपक्ष के प्रमुख सदस्य: आचार्य कृपलानी, एस पी मुखर्जी, ए के गोपालन, एच एन मुखर्जी,
लोकसभा अध्यक्ष: दादा साहेब गणेश वासुदेव मावलंकर पहली लोकसभा की कुल अवधि: 4 साल, 10 माह और 22 दिन प्रमुख विधायी कार्य: देश में पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत पहली लोकसभा के समय ही हुई, इसलिए इस लोकसभा में समाज को समाजवादी पैटर्न पर ढालने की कोशिश की गई। इस मकसद से कई कानून भी बने। इस लोकसभा के कार्यकाल में स्पेशल मैरिज एक्ट, कर्मचारी प्रोविडेंट फंड एक्ट जैसे कानून बने। सत्ताधारी दल: कांग्रेस पार्टी
प्रधानमंत्री : पंडित जवाहरलाल नेहरू
प्रमुख बातें: विपक्ष के आक्रामक रुख के चलते 1956 में टी टी कृष्णमाचारी को मंत्री पद छोड़ना पड़ा। प्रमुख वक्तव्य: पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि हमने संसदीय लोकतंत्रत्मक प्रणाली को सोच समझ कर ही चुना है। हमने इसे केवल इस कारण नहीं चुना कि हमारा सोचने का तरीका कुछ हद तक ऐसा ही रहा, बल्कि इस कारण भी कि यह प्रणाली हमारी पुरातन परंपराओं के अनुकूल है। स्वाभाविक है कि पुरातन परंपराओं का पुरातन स्वरूप में नहीं, बल्कि नई परिस्थितियों और नए वातावरण के अनुसार बदल कर अनुसरण किया गया है। इस पद्धति को चुनने का एक कारण यह भी है कि हमने देखा कि अन्य देशों में, विशेष रूप से ब्रिटेन में यह प्रणाली सफल रही है। ऐसी है हमारी 15वीं लोकसभा
अवधि : 18 मई 2009 से अब तक
कुल सदस्य: 543 सदस्यों की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि
पेशा (संख्या में)
- वकील: 14
- किसान, जमींदार, भू-स्वामी: 224
- कारोबारी व उद्योगपति: 90
- पत्रकार व लेखक: 9
- शिक्षक व शिक्षाशास्त्री: 26
- डॉक्टर: 21 शैक्षिक पृष्ठभूमि
योग्यता (संख्या में)
- स्नातक: 147
- मैट्रिकुलेशन से कम: 19
- पीएचडी तथा उच्च शिक्षा: 33 महिला सदस्यों की संख्या: 60 महिलाएं
प्रमुख महिला सदस्य: सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, सुषमा स्वराज, जयललिता, गिरिजा व्यास
सत्ता पक्ष के प्रमुख सदस्य: पी.चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी, राहुल गांधी
विपक्ष के प्रमुख सदस्य: लाल कृष्ण आडवाणी
लोकसभा अध्यक्ष: मीरा कुमार
सत्ताधारी दल: यूपीए
प्रधानमंत्री : मनमोहन सिंह
पहले माना जाता था कि संसद का काम कानून बनाना है। वह विधायी संस्था है। इसीलिए संसद का 50 प्रतिशत समय कानून बनाने में लगता था। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछली 3 लोकसभा में संसद ने अपना केवल12 से 15 प्रतिशत समय ही कानून बनाने में खर्च किया है, जिसके आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अब संसद औसतन केवल 13 प्रतिशत समय ही कानून बनाने में खर्च करती है। यही वजह है कि जब भी संसद में किसी बिल पर बहस होती है तो अधिकांश सदस्यों की उपस्थिति न के बराबर होती है, जिससे साफ जाहिर है कि सदस्यों का रुझान भी इस काम में कम हुआ है, जबकि पहले ऐसा नहीं होता था। पहले ऐसे मौकों पर सदस्य बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेते थे। खूब बहस होती थी।
एक बड़ा बदलाव सदस्यों की पृष्ठभूमि को लेकर भी दिखाई देता है। पहले अधिकतर सदस्य अभिजात्य वर्ग के होते थे। वे देश के किसी महानगर या उपनगर में रहते थे। अधिकांश या तो विदेश के किसी बड़े शिक्षा संस्थान से पढ़ाई करके आते थे या भारत के किसी बेहद अच्छे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों से शिक्षित होते थे। इनमें से अधिकांश तो वकील होते थे या फिर बेहद काबिल ऑडिटर्स या ऐसे ही किसी दूसरे क्षेत्र के अति-जानकार। खासतौर से पहली लोकसभा से 1962 तक ज्यादातर सदस्य ऐसी ही पृष्ठभूमि के थे, लेकिन आज ऐसा नहीं है। आज भारत के गांवों से भी लोग चुन कर संसद पहुंचते हैं। किसान वर्ग भी संसद में दिख रहा है, बल्कि आज तो अधिकांश सदस्य इसी वर्ग से आते हैं। भले वे गांवों में खेती न करते हों, मगर उनका संबंध ऐसे परिवारों से है, जिनकी पृष्ठभूमि में खेती है। यह बदलाव पिछली तीन या चार लोकसभा से दिखना शुरू हुआ है। भारत का आम वर्ग संसद में बैठ रहा है, यह एक अच्छी बात है। मगर इसका एक विपरीत असर भी दिखाई दे रहा है। दरअसल इस बदलाव की बाबत ही संसद में बहस का स्तर नीचे गिर गया है। चूंकि पहले बुद्धिजीवी वर्ग बड़ी संख्या में संसद में बैठता था, इसलिए बहस, वाद-विवाद और तर्क-वितर्क की संस्कृति बनी हुई थी, जो आज नदारद दिखती है। शायद इसीलिए आज अच्छे वक्ताओं की कमी भी खलती है। राष्ट्रीय मुद्दों पर हावी हो गईं स्थानीय समस्याएं
मुद्दों के मामले में भी संसद में बदलाव दिखते हैं। पहले अंतरराष्ट्रीय जगत की हलचलों पर संसद में चर्चा होती थी। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू खुद एक सवाल इस विषय पर रखते थे। पर बाद के दिनों में विशेष रूप से इंदिरा गांधी के समय से यह परंपरा खत्म हो गई। अंतरराष्ट्रीय मुद्दे संसद से गायब से होने लगे और राष्ट्रीय मुद्दे ज्यादा प्रखर या मुखर होते चले गए। लेकिन आज की स्थिति तो यह है कि राष्ट्रीय मुद्दे भी कम ही सुनने को मिलते हैं। स्थानीयता ज्यादा हावी हो गई है। कई बार तो संसद में ऐसे मुद्दों पर बहस होती है, जिन पर पंचायत या म्युनिसिपैलिटी में बहस होनी चाहिए। कमजोर हो गया है विपक्ष
पहले विपक्ष की स्थिति काफी मजबूत हुआ करती थी। भले विपक्ष संख्या में कम हो, लेकिन उसका प्रभाव काफी ज्यादा था। विपक्ष में बड़ी संख्या में दिग्गज लोग शामिल हुआ करते थे। डॉक्टर राम मनोहर लोहिया और राम नरेंद्र देव जैसे सशक्त नेता विपक्ष का हिस्सा थे, जिनकी बात काटना या टालना सरकार को भी अच्छा नहीं लगता था। इस संदर्भ में मुङो एक किस्सा याद आता है। राजगोपालाचारी उस समय जनता पार्टी से विपक्ष में थे। जवाहर लाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। एक बार राजगोपालाचारी ने किसी बात का समर्थन किया तो जवाहर लाल नेहरू ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि राजाजी को मालूम होना चाहिए कि बहुमत मेरे साथ है। इस पर राजगोपालाचारी ने जवाब दिया कि बहुमत आपके साथ होगा, मगर लॉजिक मेरे साथ है। यह जवाब सुन कर जवाहर लाल नेहरू ने उनकी बात मान ली। इस तरह से उस समय सरकार विपक्ष की बात मान लिया करती थी, क्योंकि विपक्ष की बातों में दम और गहरा प्रभाव होता था। स्पष्ट बहुमत से त्रिशंकु लोकसभा तक
पहले एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलता था और वह सरकार बनाता था, जिससे उसकी स्थिति संसद में काफी मजबूत रहती थी। लेकिन आज ऐसा नहीं है। पिछली कई लोकसभा से मिली-जुली सरकार बन रही है। ऐसे में सरकार की स्थिति भी कमजोर हो गई है। छोटी-मोटी पार्टियां भी आसानी से सरकार को ब्लैकमेल कर लेती हैं। सत्ता में बने रहने के लिए सरकार कई समझौते भी करती है। किसी अयोग्य व्यक्ति को मंत्री पद सौंप देती है या किसी व्यक्ति विशेष के ऊपर से मुकदमे वापस ले लेती है। पहले चूंकि सरकार के पास अकेले बहुमत होता था, इसलिए ऐसी स्थितियां नहीं आती थीं। यही वजह है कि पहले सरकार अक्सर विपक्ष की बात मानने की दरियादिली दिखाती थी, लेकिन आज सरकार यह जोखिम नहीं उठा सकती। आज अगर सरकार विपक्ष की बात मानेगी तो उसे इसमें अपनी कमजोरी ही महसूस होगी। अनुशासनहीनता पर कड़ी कार्रवाई होती थी
आज जिस तरह से संसद में माइक फेंकना, गाली-गलौज करना या अपशब्दों का इस्तेमाल करना आम बात हो गई है, पहले ऐसा मुमकिन नहीं था। किसी भी तरह की अनुशासनहीनता पर कड़ी कार्रवाई की जाती थी। एक बार सदन में काफी शोर-गुल हो रहा था। अध्यक्ष की बात नहीं मानी जा रही थी। सदन चलने में भी रुकावट पैदा हो रही थी। ऐसी स्थिति में अनुशासनहीनता के आरोप में 63 सदस्यों को सस्पेंड कर दिया गया। बाद में उन सदस्यों ने माफी मांगी। इसका प्रभाव यह हुआ कि फिर ऐसी घटना नहीं हुई। आज इस तरह की कार्रवाई नहीं की जाती। चूंकि सरकार के पास बहुमत नहीं होता, इसलिए अमूमन वह अनुशासनहीनता की घटनाओं को नजरअंदाज कर देती है। उसे लगता है कि कहीं सरकार गिर न जाए।
(डॉक्टर कश्यप पूर्व लोकसभा महासचिव हैं। वह संविधान के अच्छे जानकारों में से एक हैं) ऐसी थी हमारी पहली लोकसभा
अवधि : 1952-57
गठन: 17 अप्रैल 1952
पहली बैठक: 13 मई 1952
कुल सदस्य: 499 (497 निर्वाचित व 2 नामांकित)
सदस्यों की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि
पेशा (संख्या प्रतिशत में)
- वकील: 35.6%
- किसान, जमींदार, भू-स्वामी: 22.4%
- कारोबारी व उद्योगपति: 12%
- पत्रकार व लेखक: 10.4%
- शिक्षक व शिक्षाशास्त्री: 9.9%
- डॉक्टर: 4.9%
- पूर्व शासक: 1.1% शैक्षिक पृष्ठभूमि
योग्यता (संख्या प्रतिशत में)
- स्नातक: 37%
- मैट्रिकुलेशन से कम: 23.2%
- पीएचडी तथा उच्च शिक्षा: 3.5% सदस्यों की औसत आयु: 45 वर्ष 8 माह
महिला सदस्यों की संख्या: 22 (कुल सदस्यों की 4.47%)
प्रमुख महिला सदस्य: रेणु चक्रवर्ती, सुचेता कृपलानी, राजकुमारी अमृत कौर, जयश्री रायजी, विजयलक्ष्मी पंडित, तारकेश्वरी सिन्हा। सत्ता पक्ष के प्रमुख सदस्य: पंडित जवाहरलाल नेहरू, पुरूषोत्तम दास टंडन, हरे कृष्ण माहताब
विपक्ष के प्रमुख सदस्य: आचार्य कृपलानी, एस पी मुखर्जी, ए के गोपालन, एच एन मुखर्जी,
लोकसभा अध्यक्ष: दादा साहेब गणेश वासुदेव मावलंकर पहली लोकसभा की कुल अवधि: 4 साल, 10 माह और 22 दिन प्रमुख विधायी कार्य: देश में पंचवर्षीय योजनाओं की शुरुआत पहली लोकसभा के समय ही हुई, इसलिए इस लोकसभा में समाज को समाजवादी पैटर्न पर ढालने की कोशिश की गई। इस मकसद से कई कानून भी बने। इस लोकसभा के कार्यकाल में स्पेशल मैरिज एक्ट, कर्मचारी प्रोविडेंट फंड एक्ट जैसे कानून बने। सत्ताधारी दल: कांग्रेस पार्टी
प्रधानमंत्री : पंडित जवाहरलाल नेहरू
प्रमुख बातें: विपक्ष के आक्रामक रुख के चलते 1956 में टी टी कृष्णमाचारी को मंत्री पद छोड़ना पड़ा। प्रमुख वक्तव्य: पंडित जवाहर लाल नेहरू ने कहा था कि हमने संसदीय लोकतंत्रत्मक प्रणाली को सोच समझ कर ही चुना है। हमने इसे केवल इस कारण नहीं चुना कि हमारा सोचने का तरीका कुछ हद तक ऐसा ही रहा, बल्कि इस कारण भी कि यह प्रणाली हमारी पुरातन परंपराओं के अनुकूल है। स्वाभाविक है कि पुरातन परंपराओं का पुरातन स्वरूप में नहीं, बल्कि नई परिस्थितियों और नए वातावरण के अनुसार बदल कर अनुसरण किया गया है। इस पद्धति को चुनने का एक कारण यह भी है कि हमने देखा कि अन्य देशों में, विशेष रूप से ब्रिटेन में यह प्रणाली सफल रही है। ऐसी है हमारी 15वीं लोकसभा
अवधि : 18 मई 2009 से अब तक
कुल सदस्य: 543 सदस्यों की सामाजिक आर्थिक पृष्ठभूमि
पेशा (संख्या में)
- वकील: 14
- किसान, जमींदार, भू-स्वामी: 224
- कारोबारी व उद्योगपति: 90
- पत्रकार व लेखक: 9
- शिक्षक व शिक्षाशास्त्री: 26
- डॉक्टर: 21 शैक्षिक पृष्ठभूमि
योग्यता (संख्या में)
- स्नातक: 147
- मैट्रिकुलेशन से कम: 19
- पीएचडी तथा उच्च शिक्षा: 33 महिला सदस्यों की संख्या: 60 महिलाएं
प्रमुख महिला सदस्य: सोनिया गांधी, ममता बैनर्जी, सुषमा स्वराज, जयललिता, गिरिजा व्यास
सत्ता पक्ष के प्रमुख सदस्य: पी.चिदंबरम, प्रणब मुखर्जी, राहुल गांधी
विपक्ष के प्रमुख सदस्य: लाल कृष्ण आडवाणी
लोकसभा अध्यक्ष: मीरा कुमार
सत्ताधारी दल: यूपीए
प्रधानमंत्री : मनमोहन सिंह
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