गुरुवार, 18 दिसम्बर, 2014 | 02:57 | IST
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एक बिखरती हुई हवेली
First Published:14-04-12 09:16 PM

बांग्ला के यशस्वी उपन्यासकार बिमल मित्र का यह जन्मशती वर्ष है। उनके उपन्यास ‘साहब, बीवी और गुलाम’ पर फिल्म निर्माण के दौरान गुरुदत्त को उन्होंने करीब से देखा। उस दौर के संस्मरणों पर आधारित उनकी किताब ‘बिछड़े सभी बारी बारी’ का एक अंश यहां

धर इतनी देर शूटिंग करती हुई वहीदा का जो चेहरा मैंने देखा था, वह सचमुच मेरी जवा थी। वह बंगाली लड़की थी। अब जिसके बारे में सुन रहा था, वह वहीदा रहमान थी। गैर-बंगाली मुस्लिम महिला! लेकिन मुझे लगा, फिल्म के बाहर भी वह मानो वही बंगाली महिला है। उसने सेट पर जो साड़ी पहन रखी थी, उसके बाद भी वह वही साड़ी पहने रही। जुबान से भले हिन्दी बोल रही हो, लेकिन असल में वह चिरकालीन औरत थी!
मैंने उन दोनों ही औरतों को देखा था।

गुरु वहीदा के बारे में बहुत सारी बातें बताता रहा। उसने वहीदा को कैसे अभिनय सिखाया, कैसी-कैसी तकलीफें उठा कर उसने उसे फिल्मों में उतारा। उन दिनों वहीदा को भला पहचानता कौन था? उसका नाम तक भला कौन जानता था? वह तो एक दिन हैदराबाद जाकर गुरु की नजरों में आ गई और उसके बाद उसने फिल्म जगत में कदम रखा और प्रतिष्ठा-सफलता के शिखर पर जा बैठी।

वह सिर्फ प्रतिष्ठा के शिखर तक ही नहीं पहुंची, बल्कि गुरु के पारिवारिक जीवन से भी एकबारगी जुड़ गई थी। जब फिल्म का काम नहीं होता था, वह तब भी स्टूडियो में आती थी, जब फिल्म का काम चल रहा होता था, तब तो आती ही थी, आना ही पड़ता था। वह कम्पनी की स्थायी आर्टिस्ट थी, फिल्म की जरूरत पर ही वह अपरिहार्य जरूरत बन गई थी। कम्पनी को भी उससे काफी फायदा हुआ था, वहीदा भी उस कम्पनी से जुड़ कर फायदे में थी। दोनों लोग, दोनों के लिए पारस्परिक जरूरत बन गए थे। उसके बाद दोनों ही पक्ष एक-दूसरे से मिलते-जुलते रहे और मौके-मौके से एक-दूसरे के सुख-दुख में भागीदार बनते गए। उस कम्पनी में जितनी भी फिल्में निर्मित हुईं, वहीदा ही उन फिल्मों की नायिका बनी। इससे कम्पनी के सुनाम में भी चार चांद लगे और वहीदा की शोहरत भी बढ़ती गई। लेकिन सबके देखते-न-देखते गुरुदत्त के पारिवारिक जीवन में किसी अशांति का बीज भी जाने कब बो दिया गया था, इसकी खबर किसी को भी नहीं हुई। जब इसका अहसास हुआ, तब तक उस बीज में अंकुर निकल आया था। सबके अनजाने में अब उसकी जड़ें, उन सबके जीवन में गहरे तक उतर कर, सब पर असर डाल रही थीं।

इन्हीं सब परिस्थितियों में ‘साहब-बीवी-गुलाम’ का निर्माण शुरू हो गया। गुरुदत्त की जिंदगी में मानो ‘साहब-बीवी-गुलाम’ में अन्तर्निहित ट्रेजेडी, चुपके-चुपके जड़ें जमा रही थी। उसके बाद उसके हाथों में वह किताब आई। उसने कलकत्ता से वह किताब मंगाई। उसने वह किताब पढ़नी भी शुरू कर दी। बांग्ला पढ़ना उसने बचपन में ही सीखा था। उसे वह किताब अच्छी लगी। उसने वह किताब दुबारा पढ़ी। उसे वह किताब और भी ज्यादा पसन्द आई। इस तरह उसने वह किताब पांच बार पढ़ डाली। अन्त में उसने मुझे बम्बई बुला भेजा।

यह सब बहुत वर्ष पहले की घटना है। लेकिन उसके बाद कितनी ही बार दुविधा-संकोच जाग उठा। उसने कितने ही लोगों को वह किताब पढ़ाई, कितनों को ही कहानी सुनाई। किसी ने मन्तव्य दिया- ‘बेहद दिलचस्प कहानी है’, किसी ने राय दी- ‘नहीं, इस किताब पर फिल्म न बनाएं।’

गुरु ने भी कई बार सोचा- नहीं, वह यह फिल्म नहीं बनाएगा। लेकिन फिर जाने कैसे पारिवारिक त्रासदी दुबारा सिर उठाने लगती थी। मारे अशान्ति और बेचैनी के उसकी रातों की नींद हराम हो गई। मियां-बीवी में झगड़ा ठन गया, जैसा कि हर गृहस्थी में होता है। दाम्पत्य कलह! गीता नाराज होकर पीहर चली गई। उसने बेटे को दाजिर्लिंग के स्कूल में भेज दिया। पाली-हिल का वह खूबसूरत बंगला, दाम्पत्य-कलह की वजह से कुछ दिनों के लिए श्मशान में परिणत हो गया। उन दिनों, अपने बगीचे-समृद्ध बंगले में गुरु को फिर ‘साहब-बीवी-गुलाम’ की याद हो आई। अपनी जिन्दगी की अशांति-कलह को जड़ से उखाड़ फेंकने की कोशिश में उसने ‘साहब-बीवी-गुलाम’ को ही कस कर थाम लिया।

दिनभर स्टूडियो में अकेले-अकेले वक्त गुजारने के बाद, जब रात को वह घर लौटता तो अपने अकेले बिस्तर पर छटपटाते हुए, वह आकुल-व्याकुल हो उठता। उन पलों में उसे फिर खयाल आता, यह फिल्म ही पूरी कर ली जाए। ‘साहब-बीवी-गुलाम’ के जरिए वह मानो अपने दिल की बात बाहरी लोगों के सामने पेश कर सकेगा। वह अपने को व्यक्त कर सकेगा। उसके मन का बोझ हल्का हो सकेगा।

मैंने गौर किया, इसीलिए, जब भी मैं बम्बई जाता था, वह बहुत खुश हो जाता था। मुझसे बातें करके उसके मन को राहत मिलती थी यानी मेरी कहानी के जरिए, उसे मुक्ति का पता मिलता था। मैं समझ रहा था, उसके मन के अन्दर अशान्ति की आग धधक रही है। मुझसे बातें करके वह अपनी आग बुझाना चाहता था। आखिर कैसे उसे इस बेचैनी, इस आग से निष्कृति मिलेगी?

इसके बाद, अचानक ही ‘चौदहवीं का चांद’ फिल्म से आगध दौलत उसके हाथ में आ गई। दौलत की जरूरत पूरी हो गई। अब ‘साहब-बीवी-गुलाम’ फिल्म शुरू की जा सकती थी। ‘साहब-बीवी-गुलाम’ फिल्म में उसे नुकसान भी उठाना पड़े तो भी कोई हर्ज नहीं! ‘साहब-बीवी-गुलाम’ का श्रीगणेश हुआ।

मेरे ‘साहब-बीवी-गुलाम’ उपन्यास पर बनी फिल्म की जड़ में, यही है - इतिहास।
वही फिल्म, इतने दिनों बाद, पहली जनवरी 1960 में आखिर शुरू हो ही गई। मुझे यह देख कर भी बेहद अच्छा लगा कि गीता और वहीदा रहमान एकाकार हो सकी थीं। गुरु का मन भी मानो काफी कुछ शान्त नजर आया।

अचानक स्टूडियो की घंटी बज उठी। शूटिंग दुबारा शुरू होने वाली थी। गुरु की पुकार हुई। वहीदा जी को भी नीचे आने की पुकार हुई। वे दोनों चले गए। मैं और गीता, बस, दो लोग ही बैठे रहे।
..
गीता ने कहा, ‘देखिए, एक जमाना था, मैं बसों में सवार होकर, गानों की टय़ूशनें करती फिरती थी। टूटी चप्पल घसीटते हुए, घर-घर लड़कियों को गाना सिखाती थी। उसके बाद फिर ऐसा भी दिन आया, जब साल में पूरे पचास हजार रुपए इन्कम-टैक्स चुकाने लगी। लेकिन, फिर भी लगता है कि वे दिन ही अच्छे थे, उन्हीं दिनों मैं ज्यादा सुखी थी।’

गीता जब बातें करती थी, अपना दु:ख सुनाती थी, तब मैं उसकी एक-एक बात बड़े ध्यान से सुनता था। अच्छा, इन्सान जो चाहता है, वही उसे मिल जाए, तब भी वह सुखी क्यों नहीं होता? बचपन से ही देखता आया हूं, बच्चों को जो शिक्षा-दीक्षा दी जाती है, सभी धन कमाने के लिए, रुपए रोजगार करने के लिए, ताकि बड़े होने पर उन्हें खाने-पीने का अभाव न हो।

लेकिन गीता के साथ यही हुआ था। इस्तेमाल के लिए, अपनी निजी, हक्कानी-सी कार! साड़ी, गहने, ऐश्वर्य, ऐश-विलास- उसे किसी चीज की कोई कमी नहीं थी। बम्बई की किसी भी औरत के लिए गीता ईर्ष्या की वस्तु थी। गीता जितनी ख्याति आखिर किसकी थी? गीता गाना गाने के लिए लन्दन जाती थी, वहां से लौटते ही, तत्काल हैदराबाद के सफर पर निकल पड़ती थी। शायद उसके अगले ही दिन कलकत्ता आ पहुंचती थी। सिर्फ ख्याति ही नहीं, पैसों की भी, क्या उसे कोई कमी थी? पति के पास भी अगाध दौलत, उसके अपने पास भी दौलत का अम्बार! उधर वहीदा रहमान भी ख्याति और दौलत के साथ जीवन में सुप्रतिष्ठित थी। दोनों का ही अविश्वसनीय स्तर का स्वभाव-चरित्र! शरीफ,विनयी और गुणी! तीनों का मेल भी गजब का था।

गुरु की जिन्दगी में ये दोनों ही औरतें मददगार रहीं। गीता ने गुरु की गृहस्थी की सार-सम्हाल की, वहीदा ने गुरु की फिल्में! परेशानी की कहीं कोई वजह नहीं थी और घटनाचक्र में इन लोगों के बीच, मैं निरा दर्शक बन कर जा पहुंचा। मैं यह कहानी लिख जरूर रहा हूं, लेकिन मैं अपनी निगाहों का क्या करूं? मेरी निगाहें, अगर इन्सान के अंतस को भेदकर बिल्कुल गहरे न उतर जाएं तो मुझे तृप्ति नहीं मिलती। मैं इन्सान को जानना जो चाहता हूं। इन्सान ने ही मुझे चिरकाल आकर्षित किया है।
मैं कुछ देर खामोश ही रहा।
गीता ने फिर कहा, ‘पता है, आज मैं नहीं आती, लेकिन उसने मुझे खासतौर पर आने को कहा, इसीलिए मैं..’
‘आपको यहां देख कर मैं बेहद खुश हुआ हूं।’
‘आना तो मैं भी चाहती हूं। पहले मैं यहां रोज आया करती थी, शूटिंग भी देखती थी, लेकिन फिर..एक दिन..मैंने आना बन्द कर दिया।’
‘क्यों?’
‘मुझे लगा, इन सब पर मेरा कोई हक नहीं है।’
‘यह आपकी गलतफहमी है! मन की भूल! आपके बारे में गुरु से मेरी बहुत सारी बातें हुई हैं। गुरु आपका कद्रदान है। मुझसे आपकी खूब-खूब तारीफ की है।’
गीता को जैसे विश्वास नहीं हुआ।
‘आप सच कह रहे हैं?’ गीता ने पूछा।
‘मैं सच कह रहा हूं। आपसे झूठ बोल कर मुझे क्या फायदा है?’
‘कभी-कभी मुझे लगता है, शायद मैं सुखी हूं।’
‘बेशक आप सुखी हैं। आपसे कितनी ही औरतें ईर्ष्या करती हैं, आप जानती हैं? यह बात सभी जानते हैं कि आपका बहुत नाम है, आपके पास अटूट दौलत है।’
‘काश, उन लोगों को मेरे मन की भी खबर होती।’

‘इसकी जरूरत नहीं है, आपका इतना सुनाम है, आपके पास इतनी दौलत है, इसीलिए तो वे लोग आपसे जलती हैं। असल में वे लोग आप जैसी बनना चाहती हैं। आम औरतें बावर्चीखाने में खाना पकाती हैं, बच्चे पालती हैं। ऐसी जिन्दगी से उन लोगों को हिकारत होने लगी है।’
‘कभी-कभी मुझे लगता है कि वही जिन्दगी ही शायद बेहतर थी। लेकिन मैं गाना कैसे छोड़ं, बताइए तो?’
‘क्यों? गाना क्यों छोड़ेंगी भला?’
‘आप ही बताएं न! वह हमेशा मुझ से गाना छोड़ देने की रट लगाए रहता है।’
‘गाना छोड़ने को कहता है?’
‘जी हां, कहता है, गाना छोड़ दो और गृहस्थी की देखभाल करो। वह नहीं चाहता कि मैं गाना गाऊं।’
गीता की बातें सुन कर मैं अचम्भे में पड़ गया।

 
 
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