गुरुवार, 23 मई, 2013 | 01:57 | IST
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सौ प्रतिशत सुरक्षित होगा इसरो का भावी मिशन
First Published:28-03-10 07:41 PM
Last Updated:28-03-10 08:08 PM
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इंडियन स्पेस रिसर्च ऑर्गेनाइजेशन (इसरो) 2016 तक दो एस्ट्रोनॉट्स वाले अपने मिशन के लिए स्पेस कैप्सूल बनाने की शुरुआत करने वाला है। इसरो का सेटेलाइट केंद्र एंथ्रोपोमीट्रिक डाटा या भारतीयों की औसत कद-काठी के आधार पर तीन सदस्यीय कैप्सूल का निर्माण करेगा। सेटेलाइट केंद्र अवरुद्ध तकनीकों के विकास के संबंध में भी कार्य करेगा और चाँद पर भावी मिशन की दिशा में काम करेगा।

अमेरिकी स्पेस शटल्स के भिन्न, जो वापस लौटने पर रनवे पर दौड़कर उतरते हैं, भारत रूसी और चीनी तरीके अपनाएगा जिसमें स्पेस कैप्सूल को समुद्र में गिरने के बाद उठाया जाता है। रॉकेट की मदद से छोड़े जाने वाले कैप्सूल के यात्रियों के सुरक्षित लौटने की प्रक्रिया खासी जटिल होगी। इसरो के ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोग्राम के मुख्य कार्यकारी एस. रामाकृष्णन कहते हैं, ‘भरोसे का पक्ष सामान्य से अधिक होना चाहिए। हम इंसानी जान का रिस्क नहीं ले सकते। वह सौ प्रतिशत सुरक्षित होने चाहिए। हमें मल्टीपल रिडंडेंट वातावरण तैयार करने होंगे, हरेक कदम पर एक क्रू एस्केप सिस्टम, जो उन्हें सुरक्षित पृथ्वी पर ले आए।’ रामाकृष्णन के अनुसार शुरुआती तैयारी के मद्देनजर भारतीय एस्ट्रोनॉट्स की एक टीम रूस के मानवयुक्त मिशन में हिस्सा लेगी। भारत के पहले एस्ट्रोनॉट राकेश शर्मा 1984 में सोवियत स्पेस मिशन का हिस्सा थे।

इस 10,000 करोड़ के  प्रोजेक्ट को हरी झंडी मिलने के बाद भारत सफल मानवीय स्पेस मिशन पूरे करने वाले अमेरिका, रूस और चीन जैसे गिने-चुने देशों की सूची में आ जाएगा। अभी तक सरकार ने शुरुआती कार्य के लिए 380 करोड़ रुपए पारित किए हैं। योजना आयोग ने गत वर्ष फरवरी में इस प्रोग्राम को मंजूरी दी थी। इसरो इस मानवीय मिशन के लिए अन्य राष्ट्रीय विज्ञान इकाइयों जैसे डिफेंस रिसर्च एंड डिवेलपमेंट ऑर्गेनाइजेशन (डीआरडीओ), नेशनल एयरोस्पेस लैबोरेट्रीज, सैन्य बलों और इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस और इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ साइंस एवं इंडियन इंस्टीटय़ूट ऑफ टैक्नोलॉजी जैसे शैक्षणिक संस्थानों के साथ मिलकर कार्य करेगा। पृथ्वी की निचली कक्षा में एक सप्ताह तक चलने वाले इस मिशन के कैप्सूल में पृथ्वी जैसा ऑक्सीजन सप्लाई वातावरण और एस्ट्रोनॉट्स की सुरक्षा के लिए एक रियल टाइम हैल्थ मॉनीटरिंग सिस्टम भी होगा। निदेशक सी. वी. पदकी के अनुसार स्पेस सूट का शुरुआती कार्य डिफेंस बायो इंजीनियरिंग एंड इलैक्ट्रो मेडिकल लैबोरेटरी की एक यूनिट देबेल में शुरू हो गया है। इसी तरह, इसरो लाइफ सपोर्ट के रेस्क्यू और रिकवरी जैसे जरूरी सिस्टम के अतिरिक्त प्रोग्राम के लिए मिशन-मैनेजमेंट और कंट्रोल सिस्टम्स की दिशा में भी अग्रसर है। इसके लिए  एस्ट्रोनॉट्स ट्रेनिंग सेंटर,बेंगलूरु के अतिरिक्त पूर्वी तट पर श्रीहरिकोटा में नया लांच पैड तैयार किया जा रहा है।

इसरो ने 2007 में कैप्सूल रिकवरी तकनीक का पहली बार परीक्षण किया था जिसमें पृथ्वी की कक्षा में पुन: लौटने के लिए ऊष्मा रोधी मैटीरियल लगा था। इसरो अगले चार वर्षो में कम से कम दो मानवरहित स्पेस मिशन अभ्यास करेगा। अग्रणी एयरोस्पेस वैज्ञानिक रॉड्डम नरसिम्हा कहते हैं, ‘तकनीक निर्माण में समय लगता है, लेकिन इस प्रोजेक्ट से हमारे भीतर आत्मविश्वास बढ़ेगा। यह हमें नई ऊंचाई तक ले जाएगा।’

भारतीय वायुसेना की एक इकाई इंस्टीटय़ूट ऑफ एयरोस्पेस मेडिसिन (आईएएम) पायलेटों पर फाइटर जेटों और टेस्ट कंडीशन्स के असर का अध्ययन करेंगी जो बाहरी अंतरिक्ष के वैक्यूम सरीखा होता है। आगामी दो-तीन वर्षो में आईएएम उन पायलेटों को सूचीबद्ध करेगा जो एस्ट्रोनॉट्स बनेंगे, और उनमें से अंतिम दो चुने जाएंगे।  इस कार्य के दौरान हम एस्ट्रोनॉट्स को प्रशिक्षित करने के लिए अपने मौजूदा इन्फ्रास्ट्रक्चर का भी विकास हो रहा है।

मिशन के इस्तेमाल में लाया जाने वाला रॉकेट ह्यूमन स्पेस फ्लाइट प्रोग्राम अभी तैयार होना है। इस वर्ष भारत का सबसे भारी रॉकेट छोड़ा जाएगा  जो जियोसिंक्रोनस सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल होगा और देसी क्रायोजेनिक स्टेज से संपन्न होगा। यह तरल ऑक्सीजन और हाइड्रोजन से चलता और कम्युनिकेशन सेटेलाइटों को कक्षा में स्थापित करता है। यह 10 टन के कैप्सूल को पृथ्वी की निचली कक्षा में स्थापित कर सकेगा जिसमें तीन एस्ट्रोनॉट होंगे।

 
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