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फिल्म रिव्यू : जन्नत 2
First Published:05-05-12 12:28 AM
Last Updated:05-05-12 10:38 AM
इस फिल्म में इमरान हाशमी का नाम है सोनू दिल्ली, जो याद दिलाता है सोनू पंजाबन (दिल्ली में कॉलगर्ल रैकेट चलाने के लिए कुख्यात) की। यह समानता इसलिए क्योंकि रील और रियल लाइफ में ये दोनों नाम ही अपने-अपने फील्ड के माहिर दिखाए गए हैं।
‘जन्नत’ का सीक्वल ‘जन्नत 2’ इस बार क्रिकेट पर फोकस न होकर हथियारों के अवैध धंधे पर केन्द्रित है। फिल्म के केन्द्र में इमरान हाशमी यानी सोनू दिल्ली केकेसी, पिस्तौल, तमंचे, देसी कट्टे, विदेशी रिवॉल्वर आदि का एक ऐसा दलाल है, जो देखते ही बता देता है कि फलां पिस्तौल से कितनी गोलियां चली हैं। बावजूद इसके वह गली-कूचों में छोटे-मोटे हथियार बेचता फिरता है।
इस कहानी में दिल्ली पुलिस की स्पेशल ब्रांच का एक अफसर भी है। नाम है प्रताप (रणदीप हुड्डा), जिसे तलाश है अवैध हथियारों का धंधा चलाने वाले सरगना की। दिन-दहाड़े हुई एक हत्या के संबंध में प्रताप सोनू को धर लेता है। उसके सहारे वह एक अन्य डीलर तक पहुंचना चाहता है।
सोनू उसकी मदद भी कर देता है, लेकिन इससे बाद वह प्रताप के जाल में फंस-सा जाता है। उसे प्रताप की और ज्यादा मदद करनी पड़ती है। ऐसे में सोनू की मुलाकात जाह्न्वी (ईशा गुप्ता) से होती है। वह उससे प्यार करने लगता है। जल्द ही सोनू को पता चलता है कि इस धंधे का बॉस है मंगल सिंह तोमर (मनीष चौधरी)। अब प्रताप और सोनू दिल्ली को उसे ही धर दबोचना है।
कहानी के लिहाज से ‘जन्नत 2’ ‘जन्नत’ से काफी हल्की फिल्म है। पूरी फिल्म इमरान हाशमी के आभामंडल (ऑरा) से ग्रस्त है। उन्हें और प्रताप के किरदार को एक सुपरहीरो की तरह दिखाया गया है, जिनसे कोई गलती नहीं होती। फिल्म की शुरुआत काफी तेजी से होती है। तेज संगीत के बीच तेजी से गुजरते सीन्स, तेजी से बदलता घटनाक्रम और जल्दी-जल्दी बोले गए संवाद। इससे इमरान हाशमी का एक नया लुक सामने आता है।
उन्होंने दिल्लीवाला लहजा अपनाने की कोशिश की है। कई खास शब्दों का पैर उन्होंने ठीक से पकड़ा है, लेकिन निर्देशक इस फिल्म को खालिस दिल्ली वाली अप्रोच से लबरेज नहीं रख सके। इसकी एक सबसे बड़ी वजह यह सामने आती है कि उन्होंने दिल्ली में मुंबई के स्टाइल का कारोबार दिखाया है। अवैध हथियारों का कारोबार, जो फिल्म के शुरुआती हिस्सों में काबिज दिखता है और बाद में जिसे खींचने की कोशिश की गई है।
फिल्म जब इमरान की ग्रिप से निकलती है तो रणदीप के हठ के सामने रुक जाती है। रणदीप के किरदार को शुरु से अंत तक शराब के नशे में धुत्त दिखाया गया है। आखिर क्यों? क्या कोई पुलिस वाला इस हद तक शराब के नशे में धुत्त रह सकता है। मुंह से बोतल लगा कर उसे एक झटके में नीट पीकर आधी कर देना क्या यह एक सनकी पुलिस वाले की ही निशानी हो सकती है। दरअसल कुणाल देशमुख ने फिल्म के किरदारों को पनपने का मौका ही नहीं दिया है। जहां सोनू दिल्ली का किरदार खुल कर सामने आना चाहिए, वहां उसे प्रताप के सामने दबा दिया गया है।
सोनू दिल्ली अपनी प्रेमिका के सामने देसी अंदाज के साथ बातें करता दिखता है और हथियारों की डील करते वक्त भी वैसा ही रहता है यानी उसका रवैया कभी नहीं बदलता। तो फिर वह प्रताप जैसे अफसर के सामने इतना चीख-चिल्ला कर कैसे बात कर सकता है। इसके अलावा फिल्म का प्लॉट 70-80 के दशक की फिल्मों की याद दिलाता है, जिसमें इंटरवल एक खास सीन पर होता था और वहां से फिल्म की कहानी एक नई करवट लेती थी। इस फिल्म के साथ भी ऐसा ही हुआ है। इन तमाम बातों के बावजूद ‘जन्नत 2’ देखी जा सकती है। इसके लिए जरूरी है कि आप इमरान हाशमी के फैन हों। उनके इस नए स्टाइल को पचाने के लिए हाजमा दुरुस्त रखना होगा। हां, फिल्म को देखने की एक वजह और भी है और वह है इसका संगीत। शुरु से अंत तक फिल्म में संगीत बांधे रखता है।
कलाकार: इमरान हाशमी, रणदीप हुड्डा, ईशा गुप्ता, मनीष चौधरी, मो. जीशान अय्यूब, ब्रिजेन्द्र काला, आरिफ जकारिया
निर्देशक: कुणाल देशमुख
निर्माता/बैनर: महेश भट्ट/फॉक्स स्टार स्टूडियो और विशेष फिल्म्स
संगीत: प्रीतम, कहानी : शगुफ्ता रफीक पब्लिक कमेंट
मस्त मूवी है। इसका म्यूजिक खास तौर से पसंद आया। ईशा गुप्ता काफी अच्छी लगी हैं।
सौम्या मांगलिक, एचआर मैनेजर एक बार देखने लायक फिल्म है। अगर फिल्म के संवादों में से गालियां निकाल दी जातीं तो बेहतर होता।
दीपक सोलंकी, वर्किग मूवी में कई सारी लोकेशंस काफी अच्छी लगी हैं। रणदीप हुड्डा ने काफी अच्छा काम किया है। ईशा गुप्ता भी अच्छी लगी हैं।
पवन, वर्किग
निर्देशक: कुणाल देशमुख
निर्माता/बैनर: महेश भट्ट/फॉक्स स्टार स्टूडियो और विशेष फिल्म्स
संगीत: प्रीतम, कहानी : शगुफ्ता रफीक पब्लिक कमेंट
मस्त मूवी है। इसका म्यूजिक खास तौर से पसंद आया। ईशा गुप्ता काफी अच्छी लगी हैं।
सौम्या मांगलिक, एचआर मैनेजर एक बार देखने लायक फिल्म है। अगर फिल्म के संवादों में से गालियां निकाल दी जातीं तो बेहतर होता।
दीपक सोलंकी, वर्किग मूवी में कई सारी लोकेशंस काफी अच्छी लगी हैं। रणदीप हुड्डा ने काफी अच्छा काम किया है। ईशा गुप्ता भी अच्छी लगी हैं।
पवन, वर्किग
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टिप्पणियाँ
टिप्पणियॉ पढ़े(4)
जिस तरह की कहानी उस टाइप की मूवी लेकिन पैसा वसूल मूवी
By Pankaj Meena (19th-May-2012 07:04:AM)
anyway but song good
By kailsh chandravanshi (5th-May-2012 01:25:PM)
बहुत हो गया आज मैं देखने जा रहा डेल्ही कामिनी चीज
By Sandeep Kumar (5th-May-2012 12:32:PM)
सुपर मूवी है इस मूवी को रुपिया वसूल बोले तो कोई गलत नहीं होगा
By BARUN MISHRA (5th-May-2012 10:44:AM)
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