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हरि शयनी एकादशी के व्रत से मिलता है फल
सूर्यभान महाराज
First Published:25-06-12 09:13 PM
जीवन में योग, ध्यान व धारणा का बहुत महत्व है, क्योंकि इससे सुप्त शक्तियों का नवजागरण एवं अक्षय ऊर्जा का संचय होता है। इसका प्रतिपादन हरिशयनी एकादशी से भली-भांति होता है, जब भगवान विष्णु स्वयं चार महीने के लिए योगनिद्रा का आश्रय ले ध्यान धारण करते हैं। आषाढ़ मास की शुक्लपक्ष एकादशी को हरिशयनी या देवशयनी एकादशी कहा जाता है। इसे शेषशयनी एकादशी व पद्मनाभा एकादशी भी कहते हैं। भारतवर्ष में गृहस्थों से लेकर संत, महात्माओं व साधकों तक के लिए इस आषाढ़ी एकादशी से प्रारम्भ होने वाले चातुर्मास का प्राचीन काल से ही विशेष महत्व रहा है।
इस महाएकादशी का महात्म्य ब्रह्मवैवर्त पुराण में विस्तारपूर्वक बताया गया है। पद्मनाभ श्री हरि का शयनकाल प्रारम्भ होने के कारण इस दिन से चार मास यानी देवोत्थानी या प्रबोधिनी एकादशी तक सभी शुभ कार्य वजिर्त माने गए हैं। बताया गया है कि इन चार माह समस्त तीर्थ आकर ब्रजभूमि में निवास करते हैं, अत: इन दिनों ब्रज की यात्रा विशेष पुण्यदायी है। भविष्यपुराण में हरिशयन का प्रतिपादन भगवान विष्णु की योगनिद्रा के रूप में किया गया है। श्रीमद्भागवत महापुराण के अष्टम स्कन्ध में दानवीर बलि का आख्यान इसके पौराणिक महत्व को दर्शाता है। भगवान वामन ने जब राजा बलि से साढ़े तीन पग भूमि का दान मांगा और तीन ही पग में तीनों लोक नाप लिए, तब भी साक्षात् श्री हरि का सान्निध्य पा चुके ज्ञानवान राजा बलि साहस और वचनहीन न होते हुए बोले-प्रभु धन से ज्यादा महत्व धनी का होता है, अतएव जिसके धन को तीन पग में शुमार किया है आपने, आधा पग उसकी देह का भी आकलन कर लें। बलि की प्रेमपूरित भक्ति, अनुराग एवं त्याग से गद्गद् भगवान विष्णु ने उसे पाताल लोक का अचल राज्य देकर और वरदान मांगने को कहा। राजा बलि ने वचनबद्ध हो चुके विष्णुजी से कहा- प्रभु, आप नित्य मेरे महल में निवास करें। उसी समय से श्री हरि द्वारा वर का अनुपालन करते हुए तीनों देवता-देवशयनी एकादशी से देव प्रबोधिनी एकादशी तक विष्णु, देवप्रबोधिनी से महाशिवरात्रि तक शिवजी और महाशिवरात्रि से देवशयनी एकादशी तक ब्रह्माजी पाताल लोक में निवास करते हैं। संत एवं साधक इस देवशयन काल को विशेष आध्यात्मिक महत्व देते हैं। कहा जाता है कि जिसने केवल इस आषाढ़ एकादशी का व्रत रख कर कमल पुष्पों से भगवान विष्णु का पूजन कर लिया, उसने त्रिदेव का पूजन कर लिया।
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