गुरुवार, 23 मई, 2013 | 08:00 | IST
  RSS |    Site Image Loading Image Loading
 
रुद्रावतार हनुमान
अरुण कुमार जैमिनि
First Published:07-05-12 07:14 PM
 ई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ-
आखिरकार हनुमान ने सुरसा की बात मान ली। उन्होंने खुद को उसका भोजन बनना स्वीकार कर लिया। सुरसा को वरदान मिला हुआ था कि समुद्र के ऊपर से जाते हुए जिस भी प्राणी की छाया समुद्र में पड़ेगी, वह उसका भोजन होगा। वरदान ही ऐसा था। पवन पुत्र ने सुरसा से मुंह खोलने को कहा। उसने ज्यों ही मुंह खोला, उन्होंने अपना आकार विशाल कर लिया। यह देख सुरसा ने भी अपना आकार विशाल कर लिया। अब एक भक्त और राक्षस के बीच अपना-अपना आकार विशाल करने की होड़ लग गई। जब हनुमान ने देखा कि सुरसा ने अपनी सीमा लांघ कर मुंह का आकार और भी बड़ा कर लिया है तो वे तत्काल अपने विशाल रूप को समेटते हुए उसके मुंह के अंदर गए और बाहर वापस आ गए।

अब चौंकने की बारी सुरसा की थी, क्योंकि उसे मिले हुए वरदान के अनुसार हनुमान उसके मुंह के अंदर भोजन के रूप में गए और बाहर सकुशल लौट भी आए। पवन पुत्र ने मुस्कुराते हुए कहा, ‘‘माता, मैंने आपका कहा मान लिया है। अब तो मैं भगवान के कार्य से जा सकता हूं?’’ सुरसा ने हनुमान को आशीर्वाद देते हुए कहा, ‘‘पुत्र तुम अपने कार्य में सफल हो। मैं तो देवताओं की प्रेरणा से तुम्हारे बुद्धि कौशल की परीक्षा लेने आई थी।’’ यह प्रसंग सीता जी की खोज में निकले हनुमान के सागर पार करने के समय का है। हनुमान परीक्षा में सफल हुए।

लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किस चमत्कारिक सिद्धि के बल पर हनुमान ने अपने शरीर को पहले विशालकाय और फिर एक छोटे रूप में कर लिया। यह सिद्धि थी-महिमा और लघिमा। समय-समय पर पवन पुत्र ऐसी कई परीक्षाओं से गुजरे और हर बार कसौटी पर खरे उतरे। हनुमान रुद्र के ग्यारहवें अवतार माने जाते हैं। रुद्र यानी देवों के देव-महादेव। भगवान आशुतोष। शीघ्र संतुष्ट होने वाले। समस्त सुखों को देने वाले औघड़दानी, जो स्वयं वैराग्य में जीते हैं।

ऐसे शिव के आराध्य हैं श्रीराम और श्रीराम के सेवक हैं- रुद्रावतार हनुमान। पवन पुत्र और श्रीराम का अनोखा रिश्ता है। हनुमान की भक्ति करने से श्रीराम प्रसन्न होते हैं और श्रीराम की भक्ति करो तो हनुमान। है न सेवक और स्वामी का अद्भुत संबंध।

सभी देवता जानते थे कि समस्त शक्तियों और वरदानों को साध लेने की क्षमता सिर्फ हनुमान में ही है। वही इनके लिए सुयोग्य पात्र हैं। वही इनके मान की रक्षा कर सकते हैं। तभी तो ब्रह्म पाश से मुक्त रहने के वरदान के बावजूद वे ब्रह्मा जी के मान की रक्षा के लिए मेघनाद द्वारा छोड़े गए ब्रह्म पाश में बंध गए। अद्भुत हैं हनुमान। कर्ता के मान से परे हैं-शंकर सुवन। संकटमोचक हनुमान सिर्फ संकट से ही नहीं बचाते, बल्कि वे अष्ट सिद्धि और नव निधि के दाता भी हैं।

अणिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, महिमा, ईशित्व और वशित्व ये आठ प्रकार की सिद्धियां कही गई हैं। असल में सिद्धियां हनुमान में इस प्रकार एकाकार हो गई हैं कि वे जो भी कार्य करते हैं, सिद्ध हो जाता है। राम जब लक्ष्मण के साथ सीता जी को वन-वन खोज रहे थे तो ब्राह्मण वेश में हनुमान अपनी सरलता, वाणी और ज्ञान से राम जी को वश में कर लेते हैं। यह वशीकरण वशित्व सिद्धि है। माता सीता को खोजने के क्रम में जब पवन पुत्र सागर को पार करने के लिए विराट् रूप धारण करते हैं तो उनका यह कार्य महिमा सिद्धि का रूप धारण कर लेता है।

इसी प्रकार जब हनुमान सागर पार कर लंका में प्रवेश करने के लिए आगे बढ़े तो सूक्ष्म रूप धर कर अणिमा सिद्धि को साकार किया। माता सीता को खोजते-खोजते जब बजरंग बली अशोक वाटिका में पहुंचे तो उनके लघु रूप बनने में लघिमा सिद्धि काम आई और वे सीता जी से मिले। इसी प्रकार पवन सुत की गरिमा सिद्धि के दर्शन करने के लिए महाभारत काल में जाना होगा। महाबली भीम के बल के अहंकार को तोड़ने के लिए एक बार हनुमान बूढ़े वानर का रूप धर भीम के मार्ग में लेट गए।

भीम ने जब उन्हें मार्ग से हटने के लिए कहा तो उन्होंने कहा कि वे उनकी पूंछ एक ओर हटा कर निकल जाएं। जब भीम ने वानर रूपधारी आंजनेय की पूंछ हटानी चाही तो वह इतनी भारी हो गई कि उनसे हिली तक नहीं और उनके बल का अहंकार टूटते जरा भी देर नहीं लगी। इसी प्रकार बाल पवन पुत्र के मन में उगते हुए सूर्य को पाने की अभिलाषा जागी तो उन्होंने उसे पकड़ कर मुंह में रख लिया तो अभिलाषा सिद्धि के दर्शन हो गए।

प्राकाम्य सिद्धि को समझने के लिए पवन पुत्र की राम के प्रति भक्ति को समझना होगा। रामभक्त हनुमान ने राम की भक्ति के अलावा और कुछ नहीं चाहा और वह उन्हें मिल गई, इसलिए कहा जाता है कि हनुमान की कृपा पाए बिना राम की कृपा नहीं मिलती। पवन पुत्र की राम के प्रति अनन्य भक्ति का ही परिणाम था कि उन्हें प्रभुत्व और अधिकार की प्राप्ति स्वत: ही हो गई, इसे ही ईशित्व सिद्धि कहा जाता है।

इसी प्रकार नव रत्नों को ही नौ निधि कहा जाता है। ये हैं-पद्म, महापद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील और खर्व। सांसारिक जगत के लिए ये निधियां भले ही बड़ा महत्व रखती हों, लेकिन हनुमान के लिए तो केवल राम नाम की मणि ही सबसे ज्यादा मूल्यवान है। इसे इस प्रसंग से समझा जा सकता है।

रावण वध के पश्चात् एक दिन श्रीराम सीता जी के साथ दरबार में बैठे थे। उन्होंने सभी को कुछ-न-कुछ उपहार दिए। श्रीराम ने हनुमान को भी उपहारस्वरूप मूल्यवान मोतियों की माला भेंट की। पवन पुत्र ने उस माला को उलट-पुलट कर देखना शुरू किया। जब कुछ समझ नहीं आया तो वे माला से मोती निकाल-निकालकर दांतों से तोड़-तोड़कर देखने लगे। इतने कीमती मोतियों की ऐसी दुर्दशा देखकर दरबारी आपस में कहने लगे, ‘‘हनुमान हैं तो वानर ही। इन्हें इन कीमती मोतियों की क्या पहचान!’’

हनुमान के इस कार्य को देखकर भगवान राम ने हनुमान से पूछा, ‘‘हे पवन पुत्र! आप इन मोतियों में क्या ढूंढ़ रहे हैं?’’ पवन पुत्र ने कहा, ‘‘प्रभु मैं आपको और माता को इन मोतियों में ढूंढ़ रहा हूं। लेकिन आप इसमें कहीं नहीं दिखाई दे रहे हैं और जिस वस्तु में आप नहीं, वह मेरे लिए व्यर्थ है।’’ यह सुनकर एक दरबारी से रहा नहीं गया और उसने कहा, ‘‘पवन पुत्र क्या आपको लगता है कि आपके शरीर में भी भगवान हैं? अगर ऐसा है तो हमें दिखाइए, वरना आपका शरीर भी इन मोतियों की तरह व्यर्थ है।’’

हनुमान ने कहा, ‘‘भाई तुम सही कह रहे हो। मेरा मानना है कि मेरे हृदय में प्रभु राम हैं और अगर नहीं हैं तो ऐसी देह से क्या लाभ? इसका नष्ट हो जाना ही बेहतर है।’’ ऐसा कह कर हनुमान ने भरी सभा में अपना सीना चीरकर दिखा दिया। पूरी सभा यह देखकर हैरान थी कि भगवान राम माता जानकी के साथ हनुमान के हृदय में विराजमान हैं। सब प्रभु के इस सेवक की जय-जयकार करने लगे। भगवान ने आगे बढ़कर पवन पुत्र को गले लगा लिया। तो, ऐसे हैं हनुमान!

 
 Image Loadingई-मेल Image Loadingप्रिंट  टिप्पणियॉ: (0) अ+ अ- share  स्टोरी का मूल्याकंन
 
 
टिप्पणियाँ
 
आज का मौसम राशिफल
अपना शहर चुने  
बादलसूर्यादय
सूर्यास्त
नमी
 : 7:14 AM
 : 17:48 PM
 : 70% %
अधिकतम
तापमान
21.9°
.
|
न्यूनतम
तापमान
8.5°