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मराठी दलित कविता संचयन
संदीप जोशी
First Published:14-07-12 10:25 PM
पुस्तक में मराठी साहित्य की दलित काव्यधारा के कुछ दृष्टांत मिलते हैं, जिन्हें बहुत कर्मठता से वरिष्ठ लेखक-अनुवादकों निशिकांत ठकार व चंद्रकांत पाटील ने अनूदित किया है। मराठी दलित साहित्य में यों भी सत्तर के दशक में आत्मकथाओं और जीवनियों का खासा बोलबाला रहा है और बाद में कविताएं भी इस दायरे में आईं। वामन निम्बाळकर, अर्जुन डांगले, प्रकाश जाधव और कई अन्य जाने-माने नामों की कविताएं यहां पढ़ने को मिलती हैं। कविताओं की एक खास बात जो प्रथम दृष्टया समझ आती है, वह है उनकी भावात्मक गहराई और अथक मानवीयता। एक विशाल फलक को छू लेने की छटपटाहट और अपने आसपास के हालात के प्रति गहरी संवेदनशीलता कविताओं का मूल है। मराठी की प्रतिनिधि दलित कविता, संपादन-अनुवाद: निशिकांत ठकार, चंद्रकांत पाटील, प्रकाशक: साहित्य भंडार, इलाहाबाद-3, मूल्य: 300 रु.
बच्चों की दुनिया
जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, प्रस्तुत पुस्तक बच्चों के लिए है। इसमें केंद्रीय चरित्र चाचा अफलातून का है, जो गजब के किस्सागो हैं। वह बच्चों के चहेते हैं और अपने किस्सों से उन्हें अभिभूत रखते हैं। किसी कहानी में वह शेर की सवारी करते हैं और किसी में उससे भी कई कदम आगे जाकर डायनासोर की। दरअसल, बच्चों के सच्चे हमसफर चाचा अफलातून जैसी ये कहानियां हर पीढ़ी के बचपन की धरोहर होती हैं। लेखिका क्षमा शर्मा ने हर कहानी की तारतम्यता को एक-दूसरे से जोड़ा है और पूरी पुस्तक एक लंबी कहानी लगती है। दूसरी खास बात है बच्चों और बड़ों की मानसिकता की गहराई से परख करने की। बच्चों का कौतुहल और उसे देख बड़ों में फिर से जागता बचपन, कहानियों में बखूबी पिरोया गया है। डायनोसोर की पीठ पर, लेखिका: क्षमा शर्मा, प्रकाशक: प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली-3, मूल्य: 80 रु. कल और आज के बीच
प्रस्तुत उपन्यास में आधुनिक मनोभावों को उकेरते हुए सांस्कृतिक अतीत के हवाले से कहानी कही गई है। एक फिल्मकार और उसके दो प्रेम की दास्तां है उपन्यास का कथानक, जिसमें अपने-अपने खोल में बंद चरित्रों और बाहरी दुनिया के संघर्षो में घिसती जा रही इनसानी संवेदनाओं का कुशल हवाला दिया गया है। कथानक बीते कल की ओर जरूर देखता है, लेकिन उसके पात्रों की समूची रंगशाला आज का शहरी जगत है। एक नई फिल्म बनाने को बेचैन नायक फिल्मकार के मन की उथल-पुथल पर लेखिका अगर अपनी दृष्टि गढ़ाती है तो वहीं उसके जीवन में आने वाली दो युवतियों की आकांक्षाओं का लगभग बिंदास आकलन भी करती है। शालभंजिका, लेखिका : मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-3, मूल्य: 100 रु. संबंधों की धूपछांव
उपन्यास स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ-साथ सामाजिक अंतर्द्वद्वों और निकट संबंधों को गहरे से परखता है। कहानी एक ओर निजी त्रासदियों के चलते छिन्न-भिन्न हो जाने वाले संबंधों की है, तो वहीं पहचान की तलाश को तड़पती स्त्री के मानसिक उद्वेलन का जायजा लेती है। लेखिका यदि स्त्री-पुरुष संबंधों को पारंपरिक पैराए से देखती है तो वहीं उसके पात्र परंपराओं की जकड़न से छुटकारा पाने को छटपटाते दिखते हैं। सांसारिक नियमों को अनदेखा करना जीते जी आसान नहीं होता, और यही संबंध आखिरकार भीतर और बाहर दोनों ओर से जोर मारते हैं। कथा का परिवेश चिर-परिचित भारतीय समाज और संस्कारों का उदाहरण है। मूल बांग्ला उपन्यास का यह हिन्दी अनुवाद सरल-सुबोध है। छिन्नतार, लेखिका: सुचित्र भट्टाचार्य, प्रकाशक: पेंगुइन बुक्स, नई दिल्ली-17, मूल्य: 225 रु.
जैसा कि शीर्षक से जाहिर है, प्रस्तुत पुस्तक बच्चों के लिए है। इसमें केंद्रीय चरित्र चाचा अफलातून का है, जो गजब के किस्सागो हैं। वह बच्चों के चहेते हैं और अपने किस्सों से उन्हें अभिभूत रखते हैं। किसी कहानी में वह शेर की सवारी करते हैं और किसी में उससे भी कई कदम आगे जाकर डायनासोर की। दरअसल, बच्चों के सच्चे हमसफर चाचा अफलातून जैसी ये कहानियां हर पीढ़ी के बचपन की धरोहर होती हैं। लेखिका क्षमा शर्मा ने हर कहानी की तारतम्यता को एक-दूसरे से जोड़ा है और पूरी पुस्तक एक लंबी कहानी लगती है। दूसरी खास बात है बच्चों और बड़ों की मानसिकता की गहराई से परख करने की। बच्चों का कौतुहल और उसे देख बड़ों में फिर से जागता बचपन, कहानियों में बखूबी पिरोया गया है। डायनोसोर की पीठ पर, लेखिका: क्षमा शर्मा, प्रकाशक: प्रकाशन विभाग, नई दिल्ली-3, मूल्य: 80 रु. कल और आज के बीच
प्रस्तुत उपन्यास में आधुनिक मनोभावों को उकेरते हुए सांस्कृतिक अतीत के हवाले से कहानी कही गई है। एक फिल्मकार और उसके दो प्रेम की दास्तां है उपन्यास का कथानक, जिसमें अपने-अपने खोल में बंद चरित्रों और बाहरी दुनिया के संघर्षो में घिसती जा रही इनसानी संवेदनाओं का कुशल हवाला दिया गया है। कथानक बीते कल की ओर जरूर देखता है, लेकिन उसके पात्रों की समूची रंगशाला आज का शहरी जगत है। एक नई फिल्म बनाने को बेचैन नायक फिल्मकार के मन की उथल-पुथल पर लेखिका अगर अपनी दृष्टि गढ़ाती है तो वहीं उसके जीवन में आने वाली दो युवतियों की आकांक्षाओं का लगभग बिंदास आकलन भी करती है। शालभंजिका, लेखिका : मनीषा कुलश्रेष्ठ, प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, नई दिल्ली-3, मूल्य: 100 रु. संबंधों की धूपछांव
उपन्यास स्त्री-पुरुष संबंधों के साथ-साथ सामाजिक अंतर्द्वद्वों और निकट संबंधों को गहरे से परखता है। कहानी एक ओर निजी त्रासदियों के चलते छिन्न-भिन्न हो जाने वाले संबंधों की है, तो वहीं पहचान की तलाश को तड़पती स्त्री के मानसिक उद्वेलन का जायजा लेती है। लेखिका यदि स्त्री-पुरुष संबंधों को पारंपरिक पैराए से देखती है तो वहीं उसके पात्र परंपराओं की जकड़न से छुटकारा पाने को छटपटाते दिखते हैं। सांसारिक नियमों को अनदेखा करना जीते जी आसान नहीं होता, और यही संबंध आखिरकार भीतर और बाहर दोनों ओर से जोर मारते हैं। कथा का परिवेश चिर-परिचित भारतीय समाज और संस्कारों का उदाहरण है। मूल बांग्ला उपन्यास का यह हिन्दी अनुवाद सरल-सुबोध है। छिन्नतार, लेखिका: सुचित्र भट्टाचार्य, प्रकाशक: पेंगुइन बुक्स, नई दिल्ली-17, मूल्य: 225 रु.
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