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सबकी तो सुनते हैं अपनी सुनी?

First Published:18-10-2015 09:02:02 PMLast Updated:18-10-2015 09:02:02 PM

दूसरों की राय जरूरी है और उनका समर्थन भी। पर कुछ बातें ऐसी होती हैं, जिन्हें आप ही सबसे बेहतर जानते हैं। जिसके लिए आपको अपनी ही आवाजें सुननी होती हैं। हर समय अपनी समस्याओं का पिटारा सबके सामने खोलना और कुछ नहीं खुद से दूर होना है।

अकसर ऐसे लोगों से मिलना होता, जो कहते हैं वे पूरी तरह से टूट चुके हैं। उन्हें लगता है कि उन्हें सही दिशा की सख्त जरूरत है। वे चाहते हैं कि मैं उन्हें कोई राह दिखाऊं। उस समय मेरे कानों में उनकी पंक्तियां कुछ ऐसी सुनाई देती हैं, जैसे- मुझे अपना काम पसंद नहीं और मैं उसे छोड़ना चाहता हूं, क्या मुझे ऐसा करना चाहिए? मेरे पति अकसर मुझसे बुरा बर्ताव करते हैं, मुझे तलाक चाहिए। आप क्या कहती हैं, क्या यह सही होगा? मैं जिंदगी से नाखुश हूं, आप बताएं मुझे क्या करना चाहिए? ऐसी ही बहुत सी परिस्थितियों में इंसान खुद को अकेला पाकर हताश हो जाता है। हम खुद को ऐसे चौराहे पर पाते हैं, जहां तनाव अधिक और भावुकता अपने चरम पर होती है। हमें ऐसे दोस्त या साथी की तलाश रहती है, जो हमारे सवालों के जवाब दे सके। पर सच यह है कि राहत वाले जिन जादुई शब्दों की तलाश हम बाहर कर रहे होते हैं, वे हमारे भीतर ही होते हैं।

जानते हैं, पर स्वीकारते नहीं
अगर आप मुझसे मेरी उम्र पूछें और मैं कहूं कि मेरी उम्र 63 वर्ष है तो निश्चय ही आप मुझ पर हंसेंगे। यहां आपने मुझसे एक सवाल किया और मैंने उसका उत्तर दिया, लेकिन इस जवाब को आप पचा नहीं पाए। फिर आगे बढ़कर मैंने कहा कि मैं 42 वर्ष की हूं, तो भी आपने विश्वास नहीं किया। तब मैंने कहा कि मैं 32 वर्ष की हूं और अब आपने 'हां' में सिर हिलाकर कहा कि हां, ये संभव है। आप समझ रहे होंगे कि मैं क्या कहना चाह रही हूं। जो प्रश्न आपने मुझसे पूछा था, उसके जवाब का करीब-करीब एक आकलन आप पहले ही कर चुके थे। बस उन शब्दों की तलाश में थे, जो आपके अनुमान से मेल खा जाएं।

जब भी हम कोई प्रश्न पूछते हैं या हमें कोई भ्रम होता है तो हमें साथ ही उसका करीबी जवाब भी मालूम होता है। जब हम दूसरों से किसी जवाब की चाह रखते हैं तो वास्तव में भरोसा उसी बात पर करते हैं, जो हम सोच रहे होते हैं।

जब हम अपनी समस्याओं के लिए दूसरों की तरफ देखते हैं, तब वास्तव में अपने अकेलेपन को कम करने की कोशिश करते हैं। किसी भी काउंसलर के लिए वो वक्त बहुत ही निराशपूर्ण होता है, जब उसका क्लाइंट सलाह को नहीं मानता। दरअसल वह किसी सलाह के लिए कोई फीस नहीं देता, वह खुद को समझने के लिए पैसा चुकाता है। इस सुनने व समझने की प्रक्रिया में उसे खुद के विवेक से अपने निर्णय की ओर बढ़ने में मदद मिलती है।

विश्वास की दस्तक
वर्कशॉप के दौरान एक खेल का आयोजन होता है, जिसमें लोगों को अंगारांे पर नंगे पांव चलना होता है। उस समय हमारे पैर क्यों नहीं जलते, इससे जुड़ी कई दलीलें आपने पढ़ी होंगी। फिजिक्स से लेकर बायोलॉजी, फिलॉसफी और अध्यात्म तक की कई बातों का हवाला भी दिया जा सकता है। मैं भी बहुत कुछ बताती हूं, पर यकीन मानिए जिस वक्त आप लाल अंगारों पर चल रहे होते हैं, तब एक बात याद नहीं रहती। दरअसल डर किसी विज्ञान और निष्ठा को नहीं समझता। डर सिर्फ आपके दृष्टिकोण को ही जानता है। और जिस समय डर दस्तक दे रहा होता है, उस समय आप खुद को क्या कहते हैं, यही निर्णय करता है कि आप अंगारों की ओर कदम बढ़ाएंगे या नहीं। यह वह समय होता है जब आप खुद से प्रचंड बातचीत कर रहे होते हैं। कुछ लोग सहजता से ऐसा कर जाते हैं। जब मैं उनसे पूछती हूं कि उन्होंने यह कैसे किया, तो वे कहते हैं, 'मैंने खुद से कहा...' यहां उन्होंने जो खुद से खुद को जो कहा, वही विश्वास अंगारों के पार ले गया। सलाह अच्छी होती है, ज्ञान अर्जित करना सर्वोत्तम है। लेकिन आखिर में आप ही वे होते हैं, जो खुद की सच्चाई से भलीभांति परिचित होते हैं।

मन : अपना हर दिन अच्छा बनाना है तो इन दो खबरों को हर रोज पढ़ें।
एक बुरी खबर: आप दूसरों को इस बात के लिए मजबूर नहीं कर सकते कि वे आपको पसंद करें, प्यार करें, समझें, स्वीकार करें और आपके साथ अच्छा व्यवहार करें।
आपका उन पर कोई नियंत्रण भी नहीं है। एक अच्छी खबर: इससे कुछ फर्क भी नहीं पड़ता।

वचन: घर, ऑफिस, शादी-ब्याह, कुछ लोग होते हैं, जिन्हें नाटक करने में मजा आता है। झूठे दिखावों से अपनी ओर सबका ध्यान खींचना उन्हें बखूबी आता है। और आप हैं कि ये देखकर चिढ़ते रहते हैं। लेखिका चेरल रिचर्डसन कहती हैं, 'महज इसलिए कि कुछ लोगों को नाटकीयता पसंद है, इसका मतलब यह नहीं कि आप उनके प्रदर्शन को तवज्जो भी दें।'

काया : बाहरी कवर में इतने उलझ गए हैं कि भीतर के पन्नों का उजाला धरा का धरा रह जाता है। आंखों पर चढ़े रंग, नैन-नक्श, साइज और साज-सज्जा के चश्मे ने शरीर को अलग-अलग हिस्सों में बांटकर रख दिया है। पर किसी ने कहा है कि अगर आंखें, दूसरों के शरीर को देखने की जगह उनकी आत्मा को देखने लगें, तो सुंदरता के हमारे मानक भी बदल जाएंगे।

अंगारों पर चलने के समान जीवन में भी दो विकल्प होते हैं। पहला, खुद पर भरोसा रखकर आगे कदम बढ़ाना और दूसरा, डर की जिंदगी में वापस लौट जाना। आपके कदमों को आगे ठेलने का कार्य आपकी खुद की आवाज को ही करना होता है, वरना आप कभी यह अनुभव नहीं कर पाएंगे कि अंगारों पर कैसे चला जाता है। आप नहीं जान पाएंगे कि आप जिंदगी में अपने प्यार को दोबारा पा सकेंगे या नहीं। आप यह भी नहीं जान सकेंगे कि आपका अगला बॉस सचमुच अच्छा इंसान ही है। आपको यह भी नहीं मालूम चलेगा कि सचमुच अंगारों की गर्मी आपके भरोसे से अधिक थी या कम। अगर आपने वह जरूरी साहस जुटा लिया तो निस्संदेह एक बात आप जरूर जान लेंगे। वह यह कि जैसे ही आप आगे बढ़ने का मन बनाते हैं, तब पुरानी असफलताओं और डर के बावजूद, पूरा सिस्टम आपकी मदद कर रहा होता है। नतीजा कुछ भी हो, आप खुद को बेहतर पाते हैं।
अब अगली बार जब भी खुद को किसी द्वंद्व में फंसा पाएं तो इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अपने दिल की सुनें। सिर्फ आप यह सच्चाई जानते हैं कि आप कौन हैं और आप क्या अच्छे से करना जानते हैं। हम कुछ करें या न करें, लेकिन यह जानते हैं कि क्या करना सही है, क्या नहीं। हम एक ऐसे समाज में रहते हैं, जिसमें हम दूसरों की राय और उनके समर्थन के साथ आगे बढ़ते हैं। पर सबसे पहले अपनी खुद की आवाज सुनना जरूरी है, ताकि ऐसा न हो कि दूसरों के शोर में आप कहीं गुम हो जायें।

प्रिया कुमार
मोटिवेशनल स्पीकर, कॉरपोरेट ट्रेनर। 'आई एमएनदर यू' व 'परफेक्ट वर्ल्ड'पुस्तक की लेखिका। सपने देखना पसंद करती हैं।

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