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परमेश्वर बिल्कुल अकेला है

डॉ. विनोद कुमार यादव First Published:20-03-2017 11:23:19 PMLast Updated:20-03-2017 11:23:19 PM

एक तपस्वी अपने आध्यात्मिक गुरु के सान्निध्य में कई वर्षों तक तपस्या करता रहा। एक दिन उसने अपने गुरु से कहा, ‘श्रद्धेय गुरुवर, आपकी अनुकंपा से मुझे साधना के अनेक सूत्रों की गहन जानकारी हो गई है, अब मैं जंगल में जाकर एकांत साधना करना चाहता हूं।’ गुरु ने कहा, ‘ठीक है वत्स, जैसी तुम्हारी इच्छा।’ तपस्वी ने गुरु का चरण-स्पर्श कर आशीर्वाद लिया और जंगल की ओर प्रस्थान किया। जंगल में तपस्वी ने कुटी बनाई और एकांत साधना में लीन हो गया। साधना करते-करते उसे यह एहसास होने लगा कि वह बिल्कुल अकेला है।

एक रात उसे सपने में परमेश्वर के दर्शन हुए तो उसने पाया कि परमेश्वर तो उससे भी अकेला है। परमात्मा के अकेलेपन को देख कर वह आश्चर्य में पड़ गया। चकित होकर उसने परमेश्वर से पूछा, ‘भगवन, क्या आप भी इतने अकेले हैं? किंतु आपके तो असंख्य भक्त हैं, वे सब कहां हैं?’ उसकी बातें सुन कर परमेश्वर ने कहा, ‘मैं तो हमेशा से अकेला ही हूं, इसलिए जो नितांत अकेले हो जाते हैं, केवल वे ही मेरी अनुभूति कर पाते हैं। रही बात भक्तों की और तथाकथित धार्मिक लोगों की तो वे मेरे साथ कभी नहीं थे। और वे कभी मुझसे जुड़ भी नहीं सकते, क्योंकि उन्होंने अपनी सुविधा और अपने स्वार्थों के अनुसार अपने इष्टदेव तथा अपने-अपने पंथ और मजहब बना रखे हैं।’ परमेश्वर ने अपनी बात पूरी करते हुए कहा, ‘मैं सदैव अकेला हूं। इसलिए जो एकनिष्ठ है, आत्मनिष्ठ और स्थितप्रज्ञ है, केवल उसी को मेरी उपस्थिति का एहसास होता है।’

इतने में तपस्वी का स्वप्न टूट गया और वह घबराहट के साथ जाग गया। वह भागते-भागते अपने गुरु के आश्रम में पहुंचा। सवेरा होने वाला था, गुरुजी अपने स्नान-ध्यान की तैयारी कर रहे थे। उसने हांफते हुए गुरुजी से अपने सपने का वृत्तांत सुनाया और कहा, ‘गुरुजी इस स्वप्न का क्या अर्थ है?’ गुरुजी ने उसे समझाया, ‘स्वप्न होता तो मैं अर्थ भी स्पष्ट कर देता, किंतु यह तो सत्य ही है। और सत्य, सत्य ही होता है। सत्य की व्याख्या नहीं की जा सकती। वत्स, अपने विवेक को जागृत करो और अंतर्दृष्टि पर पड़े हुए पंथ और संप्रदाय रूपी आवरण को हटा कर देखो, तब तुम्हें अपने अंत:करण में दिव्यता का एहसास होगा। यही तुम्हारा धर्म है।’

प्राय: पंथ के नाम पर इनसान दूसरे लोगों से तुलनात्मक व्यवहार करने लगता है। वह अपने पंथ को श्रेष्ठ साबित करना चाहता है। व्यक्ति की यह चाहत ही उसको अंहकारी बना देती है। मनुष्य के मन की सबसे बड़ी बाधा यही है कि उसका अहंकार दूसरे पंथ के लोगों से समन्वय स्थापित नहीं होने देता, जिससे उसके मन व अंत:करण के मध्य असंतुलन बना रहता है। इस असंतुलन से धर्म की उत्पत्ति कदापि नहीं हो सकती। जब हम अपने मन, हृदय व सामाजिक परिवेश, तीनों में संतुलन स्थापित कर देते हैं, तब अपने वास्तविक स्वरूप में स्थित होते हैं, अपने धर्म में स्थित होते हैं।

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