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पानी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं?

पानी चुनावी मुद्दा क्यों नहीं?

पिछले दिनों हम चित्रकूट के पास मंदाकिनी के उद्गम स्थल पर खडे़ थे। अद्भुत दृश्य था। सामने विंध्य पर्वतमाला की तली से उतावली जलधार निकलकर कुदरती ढलान पर पसरती जा रही थी। हजारों साल से इस बहाव ने बुंदेलखंड की पवित्र-पावन नदी मंदाकिनी को सदानीरा बना रखा है। बाहर से आए श्रद्धालुओं के लिए यह ‘मां अनुसुइया’ का स्मृति प्रतीक है, जबकि स्थानीय लोगों के लिए जीवन-रेखा।

यहां नदी की धार इतनी साफ है कि नीचे तैरती मछलियां तक स्पष्ट दिखती हैं। वे खासी निडर हैं, क्योंकि कोई उन्हें चोट नहीं पहुंचाता। यदि आप पैदल चलकर नदी पार करना चाहें, तो वे हौले से किनारे सरककर आपको रास्ता दे देती हैं। कोई श्रद्धालु खाने की सामग्री उनकी ओर उछालता है, तो वे बाल सुलभ मुद्रा में उसकी ओर लपकती हैं। तली पर आराम फरमा रहे उनके संगी-साथियों को भी न जाने कैसे खबर हो जाती है, वे भी अचानक प्रकट हो जाते हैं। नन्ही मछलियों का यह झुंड महानगरीय जिंदगी की सारी थकान दूर कर देता है।

मैं 1983 में पहली बार यहां आया था। भयानक गरमी के बावजूद उन दिनों नदी में जल ज्यादा था। हर ओर शांति पसरी पड़ी थी। आज कमोबेश भीड़ बढ़ी है, पर शुक्र है अशांति के हालात अभी तक नहीं हैं। वजह? यातायात के साधनों का अभाव और इस इलाके के डाकू गिरोह। पर्यटकों की तादाद में समय के साथ जो थोड़ी-बहुत बढ़ोतरी हुई है, उसकी वजह से तट पर तमाम दुकानें और झुग्गियां उग गई हैं। देखकर दुख हुआ कि बीयर की केन, पानी की बोतलें, तमाम तरह के खाद्य पदार्थों के खाली पैकेट, सडे़ हुए खाद्यान्न, फटे-चीथडे़ कपडे़ और मानवीय मल यहां की खूबसूरती को दाग लगाने पर आमादा हैं।
मछलियां जल को साफ करती हैं, जबकि इंसान गंदा।

पर मंदाकिनी छीज रही है, इसका प्रमाण चित्रकूट पहुंचते ही मिल जाता है। वहां के पंडे बताते हैं कि यह पयस्विनी और विलुप्त सरस्वती का संगम है। किधर है पयस्विनी, पूछने पर एक क्षीण नाले की ओर इशारा कर दिया गया। क्षीण होती पयस्विनी मंदाकिनी के लिए शुभ संकेत नहीं, क्योंकि सहायक नदियां हमेशा अपने से बड़ी नदियों को बलवान बनाती आई हैं। सवाल उठता है, क्या ये दोनों सरस्वती के हश्र को हासिल हो रही हैं? सरस्वती भले विलुप्त हो गई हो, मगर हमारी कथाओं में यह नदी कभी मरी नहीं। इलाहाबाद में प्रचलित किंवदंतियां इसे त्रिवेणी की अंतरधारा बताती हैं। सैकड़ों साल से यह नदी हिंदू जनमानस की आस्था पर काबिज है। वे सारे लोग, जो धार्मिक होने का दावा करते हैं, उनके ध्यान में यह क्यों नहीं आता कि पूर्वजों की किसी लापरवाही या कुदरती कारणों से सरस्वती सूखी थी, आज पयस्विनी आखिरी सांसें ले रही है।
कल क्या गंगा और यमुना का यही हश्र होना है?
मैं बनारस में पैदा हुआ, मिर्जापुर और इलाहाबाद में पला-बढ़ा। मैंने भी जवाहरलाल नेहरू की तरह गंगा-यमुना को विविध रूपों में देखा है। अब जब कभी मथुरा में यमुना पुल से गुजरता हूं, तो नीचे देखकर आह निकल जाती है। कृष्ण के बृज को रचने वाली यमुना अब प्रदूषित जल का प्रवाह बन गई। इटावा में चंबल और हमीरपुर में बेतवा अपनी खुदी को इसमें मिलाकर उसे पुनर्जीवन देती हैं। इसी तरह, इलाहाबाद में यमुना के संगम से पहले गंगा को देखिए। कलेजा मुंह को आ जाएगा। यही वजह है कि उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सघन चुनावी दौरे के दौरान मुझे हर जगह लोग पीने के पानी का रोना रोते नजर आए। गंगा-यमुना के मायके उत्तराखंड से लेकर उनके द्वारा रचे गए विशाल दोआब में लोगों के हलक प्यास से सूखे जा रहे हैं। वहां गांव के गांव निर्जन हो रहे हैं, क्योंकि पीने का पानी नहीं है और जलाभाव से फसलें सूख रही हैं। ऊपर से रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो रहे।

उत्तराखंड में भी कई ताल (छोटी झीलें) और जलस्रोत सूख चुके हैं। टिहरी जिले में चंदीयार, कांडा और अंधियार ताल अतीत बन चुके हैं। रुद्रप्रयाग में चौराबाड़ी ताल भी सूखने के कगार पर है। यह मंदाकिनी नदी का उद्गम स्थल है। मंदाकिनी चाहे बुंदेलखंड की हो या उत्तराखंड की, काल दोनों पर मंडरा रहा है। इसी तरह, बागेश्वर में भागीरथी गधेरा, बिलौना, कफौली, छिड़गंगा और काफलीबैंड के झरने सूख चुके हैं। अल्मोड़ा में चंद्रेश्वर नौला सूख गया है। नैनीताल जिले के सातताल क्षेत्र में डोब, कमल और सूखा ताल भी जल के अभाव में अपनी आब खो चुके हैं।

हालात कितने भयावह हैं, यह इसी से जाहिर हो जाता है कि पिछले साल राज्यसभा में तत्कालीन पेयजल और स्वच्छता राज्य मंत्री रामकृपाल यादव ने एक सवाल के जवाब में बताया था कि देश के 308 जिले पेयजल की भीषण किल्लत से जूझ रहे हैं। इनमें से अकेले उत्तर प्रदेश के 50 जिले शामिल हैं। एक आरटीआई के जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार ने चार साल पहले कुबूला था कि 10 वर्षों के दौरान सिर्फ बुंदेलखंड में 4,020 जल स्रोतों का वजूद खत्म हो गया। बांदा जनपद में तो पिछले साल 33,000 चापाकलों में से 35 फीसदी सूखे पडे़ थे।
यहां के पाठा इलाके का एक लोकगीत इस भयावहता को विस्तार देता है- ‘गगरी न फूटे चाहे खसम मर जाए।’
इसी तरह, उत्तराखंड में एक एनजीओ ने पिछले साल जून में अपनी रिपोर्ट जारी की थी। उसके अनुसार, राज्य के 60 हजार जलस्रोतों में से 12 हजार सूख चुके हैं। राज्य के तत्कालीन मुख्य सचिव का मानना था कि इस पहाड़ी प्रदेश से पलायन का सबसे बड़ा कारण पेयजल का अभाव है।
अब हिमालय की गोद में बसे दूसरे सूबे मणिपुर पर आते हैं। यहां हर साल 1,500 मिलीमीटर बारिश होती है, पर उसके संरक्षण और वितरण की कोई माकूल व्यवस्था अभी तक विकसित नहीं की गई। यहां के अधिकांश लोग पानी माफिया पर निर्भर हैं। नतीजतन, 1000 लीटर जल के लिए 200 रुपये तक चुकाने पड़ते हैं। इस मामले में पंजाब थोड़ा बेहतर साबित हुआ। यमुना-सतलुज नहर के बहाने ही सही, चुनाव के दौरान कम से कम पानी पर बहस तो हुई। बाकी चार राज्यों में कोई दल इस मुद्दे पर गंभीरता से कुछ नहीं बोला।
बात सिर्फ इन प्रदेशों की नहीं है। यह दर्दनाक स्थिति आप कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक कहीं भी देख सकते हैं। कहीं यह हमारी सभ्यता के पराभव का संकेत तो नहीं है? कभी सुमेरु और सिंधु घाटी की सभ्यताओं की तूती बोला करती थी। आज वे अतीत का हिस्सा बन गई हैं। तकनीक के इस जमाने में क्या हमारे हुक्मरानों को इस ओर ध्यान नहीं देना चाहिए? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सत्ता में आते ही नदियों को जोड़ने की बात कही थी, मगर उस पर अभी तक कोई असरकारी कदम नहीं उठाए गए हैं।
ये चुनाव एक अवसर थे, जब जीवन के लिए जरूरी इस तत्व पर सभी दल अपना एजेंडा पेश करते, लेकिन सिर्फ दलों के दलदल को और गंदा करने वाले नारे उछाले गए। पुरानी भारतीय कहावत है- ‘पानी पिला-पिलाकर मारा।’ हमारे नेता तो हमें बेपानी मार रहे हैं।

शशि शेखर का ब्लॉग अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।
@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com

 

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  • Web Title:why water not an election issue