class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

हिंसक होते लोकतंत्र में हम

कुछ घटनाएं दहला जाती हैं। 16वीं लोकसभा के ‘माननीय सदस्य’ रवीन्द्र विश्वनाथ गायकवाड़ ने जिस तरह पिछले हफ्ते एअर इंडिया के विमान में उसके एक कर्मचारी की धुनाई की, उसने बहुत कुछ सोचने पर मजबूर कर दिया। एक अहिंसक देश में हिंसा के पुजारी जन-प्रतिनिधि कैसे हो सकते हैं?

घटना के अगले दिन यानी 24 मार्च को मैंने टीवी पर रवीन्द्र गायकवाड़ के मुखारविंद से सुना कि वह (एअर इंडियाकर्मी) बदतमीजी कर रहा था। मैंने उसको चप्पलों से पीटा। हमें बाला साहब ने यही सिखाया है कि जो भी गड़बड़ करे, उसके कान के नीचे एक दो, मिलाकर। संवाददाता ने उनसे पूछा कि आप सांसद हैं,  

आपको नहीं लगता कि आपके इस आचरण से गलत संदेश जाएगा, पर वह डिगे नहीं, ढिठाई पर अड़े रहे। उन्होंने गर्वपूर्वक दोहराया कि एअर इंडियाकर्मी को उन्होंने 25 चप्पलें मारीं। मैं सोच में पड़ गया। उन्होंने मुहावरा बोला था या वह अपने प्रहार गिन रहे थे? 

क्या वह बहैसियत सांसद इस प्रश्न का जवाब दे सकते हैं कि अगर हर कोई उनका अनुसरण करने लगे, तो देश की कानून-व्यवस्था का क्या हाल बनेगा? मन माफिक व्यवस्था न होने पर गायकवाड़ साहब बिफर उठे, पर क्या उन्होंने पहले कभी जानने की कोशिश की कि आम यात्रियों के साथ यही एयर लाइन्स कैसा व्यवहार करती है? उनके सहयोगी शशि थरूर अलग तरह के हैं। इसीलिए इकोनॉमी क्लास की बदहाली देखकर उन्होंने हाथ उठाने की बजाय उसे ‘कैटल क्लास’ के विशेषण से नवाज दिया था, जिस पर हंगामा मच गया था। आप इकोनॉमी क्लास के यात्रियों की तुलना मवेशियों से कैसे कर सकते हैं? 

खुद को जरा सी तकलीफ होने पर जो जन-प्रतिनिधि शाब्दिक या शारीरिक हिंसा पर उतर आते हैं, वे आम यात्री की भलाई के लिए आवाज क्यों नहीं उठाते? 

लोकसभा के एक और माननीय सदस्य हैं- विट्ठल रदाडीया। गांधी की जन्मस्थली पोरबंदर से कांग्रेस के टिकट पर 15वीं लोकसभा के लिए चुने गए रदाडीया का साल 2012 में एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वह टोलकर्मी को बंदूक के बल पर धमकाते हुए दिख रहे थे। बाद में रदाडीया भाजपा में शामिल हो गए और पिछले साल 19 मार्च को उनका एक और कारनामा सुर्खियों में छाया रहा, जिसमें वह 70 साल के बुजुर्ग को लात मारते दिखाई दिए। उनके खिलाफ किसी तरह की कोई कार्रवाई हुई क्या?

यहां, मुझे राजधानी एक्सप्रेस में कुछ साल पहले घटा वाकया याद आ रहा है। बिहार के एक बाहुबली सांसद अपने अंगरक्षकों की फौज के साथ एसी प्रथम श्रेणी के डिब्बे में पधारे। उनके और एक सहयोगी के लिए सिर्फ दो बर्थ आरक्षित थीं, बाकी ‘गनमैन’ कहां जाएं? बंदूकचियों के पास इस समस्या का समाधान था। उन्होंने जबरन लोगों को उनकी वाजिब बर्थ से बेदखल कर दिया और उन पर जा विराजे। आंखों में आंसू भरे तमाम यात्री अपनी जिल्लत की दास्तां टे्रन में तैनात कंडक्टरगण से बताते रह गए, पर समाधान की जगह सिर्फ पश्चाताप भरी सांत्वना मिली। एक कालाकोट धारी उनसे कहता पाया गया कि अरे कुछ ही घंटे की तो बात है, इनके मुंह मत लगिए। यह रात तो बीत जाएगी। आप इनसे उलझे, तो ये आपके आने वाले दिनों का सुख-चैन छीन लेंगे। निरुपाय ‘वैध यात्री’ गैलरी अथवा सीटों के बीच की जगह पर मन मसोसकर बैठ गए। सांसद महोदय के साथियों ने न केवल उनकी आरक्षित सीटों पर कब्जा जमाया, बल्कि उन्हें परोसा जाने वाला भोजन भी चट कर गए। 

राजधानी, शताब्दी अथवा एक्सप्रेस टे्रन में माननीयों की दबंगई के ऐसे कई किस्से सामने आते रहे हैं, पर रेल प्रशासन कोई सार्थक कार्रवाई नहीं कर सका। मीडिया में खबरें आने के बाद इन पर थोड़ा-बहुत अंकुश लग सका, पर वह खत्म नहीं हुई। यह जानलेवा निष्क्रियता मुझे हमेशा खलती रही, इसीलिए जब छह उड़ान कंपनियों ने रवीन्द्र गायकवाड़ पर रोक लगा दी, तो आश्चर्य हुआ। एअर इंडिया ने न केवल उनकी उड़ान पर प्रतिबंध लगाया, बल्कि पुणे-दिल्ली के बीच उनकी पहले से आरक्षित टिकट को भी रद्द कर दिया। 24 मार्च को टेलीविजन पर गायकवाड़ बार-बार दम भर रहे थे कि मैं भाजपा का सांसद नहीं हूं, गोया भाजपा का सांसद कोई हेय प्राणी होता है। अब उसी भाजपा सरकार ने एयर लाइन्स की कार्य-प्रणाली में दखल देने से इनकार कर दिया है और वह अधर में लटक गए हैं। 

सांसद महोदय की दिक्कत यह है कि वह टे्रन से सफर करते हैं, तो पत्रकार उनका पीछा करते हैं और हवाई यात्रा उनके लिए फिलहाल नामुमकिन हो गई है। एअर इंडियाकर्मी को चप्पलों से पीटकर गायकवाड़ ने जो जताने की कोशिश की थी, उसका उन्हें करारा जवाब मिल गया है। 

हालांकि, ऐसा लगता नहीं कि गायकवाड़ साहब को अपनी करनी पर कोई पश्चाताप है। हो भी क्यों? उनकी पार्टी उनके साथ जो खड़ी है। अब तो भाजपा के शत्रुघ्न सिन्हा भी उनका साथ देते दिख रहे हैं। लिहाजा इन पंक्तियों के लिखे जाने तक विवाद कायम है। कभी गांधी जैसे नेताओं ने साबित किया था कि क्षमा याचना बुलंदी प्रदान करती है, पर वे दिन हवा हो गए। भारतीय राजनीति और राजनेताओं का दंभ अब उनकी हर हरकत से टपकता है। 

अफसोस तो इस बात का है कि सांसदों के बीच कदाचार की  शुरुआत अंतरिम लोकसभा से हो गई थी। इतिहास के पन्ने खंगालने पर हम अफसोस के साथ कुछ बेहद कड़वे तथ्यों को बेपरदा होते पाते हैं। 24 सितंबर, 1951 को लोकसभा के तत्कालीन सदस्य एचजी मुद्गल की सदस्यता रद्द कर दी गई थी। वजह? उन पर रिश्वत लेकर सवाल पूछने का आरोप था। खुद प्रधानमंत्री नेहरू ने उनके खिलाफ प्रस्ताव पेश किया था। बरसों बाद दिसंबर 2005 में यह कहानी फिर दोहराई गई। इस बार कुल 11 सांसद लपेटे में आए। उन पर भी धन के बदले में सवाल पूछने के आरोप थे। इनमें कई प्रमुख पार्टियों के सदस्य शामिल थे।

भ्रष्टाचार का दलदल सभी दलों के लोगों का बिना किसी भेदभाव के स्वागत करता है।

हमारे माननीयों ने खुद को महज धन उगाही तक सीमित नहीं रखा है। एक रिपोर्ट का हवाला हाजिर है- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स ने सांसदों द्वारा चुनाव के वक्त दायर किए गए हलफनामे के आधार पर जो सूचना एकत्र की है, उसके मुताबिक, 16वीं लोकसभा में दागी सांसदों की संख्या सबसे अधिक है। करीब 34 फीसदी सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं, जबकि 15वीं लोकसभा में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत था और 2004 में गठित लोकसभा में ऐसे 24 फीसदी लोग चुनकर आए थे। एडीआर के मुताबिक, शिवसेना के 18 में से 15 सांसदों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। इनमें श्री रवीन्द्र गायकवाड़ का नाम भी शामिल है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, लोकसभा के 112 सदस्यों के खिलाफ गंभीर अपराध के मामले दर्ज हैं।

हालांकि, उत्तर प्रदेश के हालिया चुनाव में एक सुखद बात यह देखने को मिली है कि दागी सदस्यों की संख्या में गिरावट आई है। साल 2012 में जहां 189 दागी विधायक चुनकर आ गए थे, वहीं इस बार यह संख्या 143 है। गजब यह कि इनमें से सर्वाधिक 114 भाजपा के टिकट पर विधानसभा पहुंचे हैं। अन्य दलों में 14 सपा के, पांच बसपा, एक कांग्रेस से, तो तीन ने निर्दलीय के तौर पर चुनाव जीता।

क्या आपको इससे भय नहीं लगता?  

@shekharkahin 
shashi.shekhar@livehindustan.com

शशि शेखर का ब्लॉग अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:we are violent in democracy
From around the web