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इरादों और इकबाल का इम्तिहान

वह एक सुखद घटना थी। छोटी-मोटी बातों पर तू-तू, मैं-मैं करने वाले हमारे सांसद एक ही सुर में बोल रहे थे। वजह? पाकिस्तान की एक सैनिक अदालत ने भारतीय नागरिक कुलभूषण जाधव को तथाकथित जासूसी के मामले में मौत की सजा सुनाई, जिस पर हमारे सांसद उबले पड़ रहे थे। उनका आक्रोश जायज था और एका प्रशंसनीय।
क्या हमारे माननीय सांसदों और मंत्रियों का गुस्सा जाधव की जिंदगी बचा पाएगा? क्या वह सकुशल अपने परिवार के पास मुंबई लौट सकेंगे? 

ये सवाल इसीलिए जरूरी बन पड़े हैं, क्योंकि संसद की उस दिन की कार्यवाही खत्म भी नहीं हुई थी कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का धमकी भरा जवाब आ गया, हमारी फौज तैयार है। वह सुषमा स्वराज के उस वक्तव्य का जवाब दे रहे थे, जो उन्होंने बहैसियत विदेश मंत्री सदन को भरोसा दिलाते हुए दिया था कि जाधव देश के बेटे हैं और उन्हें वापस लाने में कोई कसर नहीं छोड़ी जाएगी। न केवल उन्हें सुप्रीम कोर्ट में सबसे अच्छे वकील मुहैया कराए जाएंगे, बल्कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति से भी बात की जाएगी। अगर कुलभूषण को कुछ हुआ, तो पाकिस्तान को गंभीर राजनयिक नतीजे भुगतने पड़ेंगे। शरीफ के बयान से साफ है कि पाकिस्तान मुंहजोरी पर अड़ा हुआ है। 

हमें भूलना नहीं चाहिए कि इससे पहले सरबजीत के मामले में भारत धोखा खा चुका है। हिन्दुस्तान की हुकूमत जब इस्लामाबाद पर दबाव बना रही थी कि वह एक आम नागरिक है, जो गलती से सीमा पार कर गया था, उसी दौरान उस पर लाहौर की कोट लखपत जेल में दूसरे कैदियों ने जानलेवा हमला किया था। सरबजीत जैसे बंदी की इस तरह से हत्या चौंकाने वाली थी। क्या उस जेल के अधिकारी इतने कमअक्ल थे कि उन्हें यह तक मालूम न था कि इस कैदी का राजनयिक महत्व क्या है? आमतौर पर ऐसे बंदियों को कडे़ सुरक्षा घेरे में रखा जाता है। तय है, हत्यारों को हुकूमत की शह हासिल थी। इसके अगले दिन जम्मू जेल में सनाउल्ला हक पर एक भारतीय कैदी ने हमला कर दिया। कुछ दिन कोमा में रहने के बाद सनाउल्ला ने दम तोड़ दिया। अब आरोप लगाने की बारी पाकिस्तान की थी, क्योंकि सनाउल्ला पाकिस्तानी नागरिक था। उसे दहशतगर्दी के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। कौन कहता है कि कूटनीति सिर्फ बंद कमरों का विषय है? कभी-कभी हम उसे कारागारों में भी घटता देखते हैं।
 
यहां यह जान लेने में हर्ज नहीं कि जाधव का मामला सरबजीत से ज्यादा जटिल है। गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने लोकसभा को बताया कि कुलभूषण जाधव व्यापार के सिलसिले में ईरान गए थे। वहां से उनका अपहरण कर पाकिस्तान लाया गया। तथाकथित गिरफ्तारी के बाद उनका एक वीडियो पाक एजेंसियों ने जारी किया था, जिसमें वह ‘कुबूल’ रहे थे कि वह ‘रा’ के एजेंट हैं। उनके चेहरे की सूजन और वीडियो के ‘जंप’ इस कुबूलनामे के पाखंड का खुलासा कर रहे थे। बताया गया कि जाधव के पास से भारतीय पासपोर्ट मिला, जिस पर ईरान का वीजा दर्ज था। ‘जासूस’ वैध पासपोर्ट और वीजा लेकर कब से चलने लगे? 

पाकिस्तान के गठन के साथ जन्मे भारत विरोधी एजेंडे के सात दशक से जारी घिनौने ड्रामे का यह नया एपिसोड है। जगजाहिर है कि निरीह भारतीय नागरिकों के खून से हाथ रंगकर वहां के हुक्मरां अपने पाप धोते हैं। आप जाधव को मौत की सजा सुनाए जाने के समय पर गौर फरमाएं। पाकिस्तान की ‘नेशनल असेंबली’ का चुनाव एक साल दूर रह बचा है और नवाज शरीफ चाहते हैं कि अपने काले कारनामों को छिपाए रखने के लिए वह दोबारा हुकूमत में जरूर आएं। उनका यह कार्यकाल खासा बदनाम रहा है। वह जनता से किए गए वायदे पूरे करने में नाकाम रहे और इसी बीच ‘पनामागेट’ में उनके परिजनों का नाम आ गया। इतना कम था क्या कि इसी बीच भारत की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ ने उनकी रही-बची छवि की मिट्टी पलीद कर दी! 

इन तमाम बलाओं से मुक्ति पाने के लिए वह भारत और भारतीयों के विरोध के उस नुस्खे का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसे वहां का हर हुक्मरां आजमाता रहा है। 
पाकिस्तान के नवनियुक्त सेनाध्यक्ष कमर जावेद बाजवा इस मामले में उनका साथ निभाने को मजबूर हैं। उनके कमान सम्हालने से कुछ सप्ताह पहले भारतीय फौज ने ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की थी। उनकी गद्दीनशीनी के वक्त सेना अपने जख्म सहला रही थी और समूचा पाकिस्तान बेचारगी की मार से तिलमिला रहा था। यही नहीं, हर पाकिस्तानी जनरल की ख्वाहिश होती है कि वह 1971 में जनरल नियाजी की अगुवाई में पाकिस्तानी फौज के 90 हजार सैनिकों ने जो जिल्लत भरा समर्पण भारतीय सेना के समक्ष किया था, उसका प्रतिशोध ले सके। बाजवा ने इसीलिए जाधव की फांसी के फैसले पर मोहर लगाने में देरी नहीं की, जबकि वह जानते हैं कि जाधव बेकसूर हैं। सात दिसंबर, 2016 को नवाज शरीफ के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज तक कह चुके हैं कि हमारे पास जाधव के खिलाफ कुछ बयानों के अलावा कोई पुख्ता सबूत नहीं। 

मतलब साफ है। बाजवा और शरीफ घरेलू मोर्चे पर जारी फजीहत से बचने के लिए कुलभूषण का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसीलिए भारत ने उनको निष्पक्ष वकील मुहैया कराने की पेशकश की, तो उसे ठुकरा दिया गया। निश्चित तौर पर पाकिस्तान का नापाक सैन्य-सत्ता गठजोड़ नहीं चाहता कि कोई निष्पक्ष व्यक्ति, भले ही वह पाकिस्तान का नागरिक क्यों न हो, जाधव की मदद करे। इसीलिए इस मामले में न्याय के नैसर्गिक सिद्धांतों की घोर उपेक्षा की गई। 

पता नहीं क्यों, बाजवा वही गलती दोहरा रहे हैं, जिसने उनके पूर्ववर्ती जनरल राहिल शरीफ की कीर्ति पर धब्बा लगा दिया था। उस दौरान पाकिस्तान के शरीफ द्वय (नवाज और राहिल) भूल गए थे कि नई दिल्ली में एक मजबूत बहुमत वाली सरकार है, जो  देश की सुरक्षा के नाम पर किसी तरह का खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं करेगी। प्रसंगवश बता दूं कि अगस्त 2016 में मोदी सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने अनौपचारिक बातचीत में मुझसे कहा था कि पाकिस्तान मोदी जी को नहीं जानता। मुझे यह तो नहीं मालूम कि वह क्या करेंगे, पर इतना जान लीजिए कि अगर हमारी सीमाओं में ज्यादा दखलंदाजी हुई, तो वह कुछ न कुछ ऐसा करेंगे, जिससे उनकी अक्ल ठिकाने आ जाएगी। किसे पता था कि कुछ हफ्ते बाद हमारे सैनिक सीमा लांघकर पाकिस्तानी टुकड़ों पर पल रहे आतंकवादियों के अड्डों को तहस-नहस कर डालेंगे?

जाहिर है, देश के नागरिक अब कुलभूषण की रिहाई की उम्मीद पाले बैठे हैं। फिर भारत जैसा मजबूत देश भला यह कैसे बर्दाश्त कर सकता है कि उसके नागरिक को पाकिस्तानी एजेंसियां ईरान से अगवा कर सूली पर लटका दें?
यकीनन, यह भारतीय इरादों और इकबाल के इम्तिहान का वक्त है।

@shekharkahin 
shashi.shekhar@livehindustan.com

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  • Web Title:tough time for india intention and faith
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