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चुनाव के दौरान टूटते सपने

शशि शेखर First Published:04-03-2017 10:25:35 PMLast Updated:04-03-2017 10:38:08 PM
चुनाव के दौरान टूटते सपने

विधानसभा के मौजूदा चुनावों के दौरान मैंने ‘आजकल’ की पिछली चार कड़ियां छोटे राज्यों के साथ अन्याय, मुस्लिम मानस की बेचैनी, महिलाओं से भेदभाव और पेयजल की भीषण कमी को समर्पित कीं। ये जरूरी मुद्दे दुर्भाग्यजनक तौर पर मौजूदा सियासी विमर्श से नदारद हैं। इस विचार-शृंखला के अंत में उन प्रवृत्तियों पर चर्चा करना चाहूंगा, जिनके साथ तीन पीढ़ियों के टूटे सपनों की दर्दनाक दास्तां जुड़ी है।

निजी अनुभव से शुरू करता हूं। जब मेरे पिता ने अपनी पहली संतान यानी मेरा नामकरण किया, तो उन्होंने जातीय उपनाम के इस्तेमाल से गुरेज किया। बाद में जन्मे मेरे बहन-भाई के नाम भी इसी तरह रखे गए। वह सोचते थे कि आजाद भारत के साथ बढ़ते उनके बच्चे जब बड़े होंगे, तब तक भारत में जाति-विहीन समाज की स्थापना हो चुकी होगी और उसमें उनके परिवार का भी विनम्र योगदान होगा। उनकी पीढ़ी के तमाम लोग उन दिनों ऐसे भावुक सपने देख रहे थे। वह नई मिली आजादी का खुमार था।

उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के इस विधानसभा चुनाव में गांव-दर-गांव, शहर-दर-शहर घूमते वक्त मुझे रह-रहकर पिता की प्रतिबद्धता याद आती। वह आज भी जातिवाद की बात सुनकर भड़क जाते हैं, पर करें क्या? जाति-प्रथा भारतीय समाज की हकीकत है। मेरे पत्रकार मित्र कुर्बान अली ने कभी कटाक्ष में बड़ी गहरी बात कही थी कि पता नहीं, कुछ लोग हमसे क्या उम्मीद करते हैं? भारत में आकर मुसलमानों ने जाति-प्रथा अपना ली, नाच-गाना सीख लिया, और तो और, कुछ लोग दहेज तक लेने लगे। भई, और कितना बदलें हम? वह गलत नहीं थे। यह खुला सच है कि जाति-प्रथा को भारत में रहने वाले प्राय: सभी समुदायों ने किसी न किसी प्रकार अपनाया है।

सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि समूची मनुष्य प्रजाति अपने वंश, क्षेत्र, भाषा और संस्कारों से परंपरागत लगाव रखती है। धूर्त लोग सदा-सर्वदा इस कोमल भाव का लाभ उठाते रहे हैं। मसलन, बराक ओबामा जब पहली बार चुनाव जीते, तो उनके विरोधियों ने कहा कि उन्हें उन लोगों के मतों ने ह्वाइट हाउस में पहुंचाया है, जो बाहर से आए हैं। इशारा अश्वेत, स्पेनी, कोरियन, हिन्दुस्तानी मूल के लोगों की तरफ था। इस चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने उनकी ‘उल्टी लाइन’ ली।

कमाल देखिए! सामाजिक विभेदों पर उनकी भी नजर थी। वह एक तरफ बाहर से आने वालों पर अंकुश लगाने की बात कर रहे थे, दूसरी तरफ उन्हीं समुदायों को रिझाने में लगे थे। आप चाहें, तो यू-ट्यूब पर देख सकते हैं कि कैसे वह अटपटी हिंदी में बोल रहे हैं- अबकी बार, ट्रंप सरकार। यही नहीं, परदेसी मूल के अमेरिकी नागरिकों को लुभाने के लिए उन्होंने विदेश में रह रहे कुछ नेताओं और नामचीन लोगों की तारीफ तक की। ट्रंप को इतिहास शातिर सियासी बहेलिये के तौर पर याद करेगा।

राजनेता विभिन्न सामाजिक वर्गों से तालमेल बिठाएं, तो परेशानी नहीं, पर जब वे इन दरारों को चौड़ा करने लग जाते हैं, तो मुल्क खतरे में पड़ जाते हैं। एक खौफनाक उदाहरण देता हूं। अमेरिकी शहर कैन्सस के ‘बार’ में एक भारतीय इंजीनियर को यह कहते हुए गोली मार दी गई कि मेरे देश से भाग जाओ। हत्यारा पढ़ा-लिखा पूर्व नौसैनिक है। उसके उन्माद को ऐसे विभेदकारी विचारों ने ही पोसा है। इस वारदात से अमेरिकी-भारतीय समुदाय में भय की लहर दौड़ गई है। ऐसे हत्यारे हमले आगे भी हो सकते हैं। हिंदी में उन्हें लुभाने वाले नवनिर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति ने दिलासा के नाम पर सिर्फ संसद में दो शब्द बोलकर छुट्टी पा ली। सिलसिला इसके बाद भी खत्म नहीं हुआ और यह लेख छपने तक लैंकस्टर काउंटी में एक भारतीय व्यापारी की हत्या की खबर भी आ गई।
राजनीति समूची दुनिया में एक सी है।

अब आते हैं अपने देश पर। पिछले दिनों बुंदेलखंड के अनजाने गांव में मैंने पूछा कि यहां कौन जीत रहा है? नि:संकोच एक उम्मीदवार का नाम बता दिया गया। बातचीत के दौरान पता चला कि यहां एक जाति विशेष के 50 हजार से ज्यादा मतदाता हैं। इन लोगों की आस्था सूबे की ताकतवर राजनीतिक शख्सियत में है। चर्चित प्रत्याशी का गणित यह है कि उसकी जाति के वोटों को अगर इस ‘वोट बैंक’ से मिला दिया जाए, तो वह जीत जाएगा। इसके लिए उसे कितनी भी धनराशि खर्च करने से गुरेज नहीं है।

मैंने इस चुनाव यात्रा के दौरान उत्तर प्रदेश के मुसलमानों में छटपटाहट पाई कि वे किसी की जागीर बनकर नहीं रहना चाहते। वे अपनी कौम को तरक्की के रास्ते पर ले जाना चाहते हैं, पर करें क्या? जातियों और धर्मों के नाम पर लोगों को जहालत में धकेलने की जो सुनियोजित साजिश की गई है, वह दिल दहला देती है। मतदाताओं को अब खुद को सियासी बाजीगरों की अंधभक्ति से मुक्त करना चाहिए।

हमारे यहां मजलूमों के रहनुमा ही उनके कातिल बने हुए हैं।

यह चुनाव एक और रीति-नीति को बढ़ावा दे रहा है, वह है वंशवाद। कोई भी पार्टी इससे अछूती नहीं है। जो दल कभी वंशवाद की मुखालफत करते थे, वे खुद इसके शिकार हो गए हैं। उत्तराखंड और मुल्क के तमाम क्षेत्रों में ऐसे परिवार पनप गए हैं, जिनका पुश्तैनी व्यवसाय राजनीति है। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी जैसे राष्ट्रीय दलों तक के साथ स्थानीय स्तर पर ऐसे सियासी सामंत जुड़ गए हैं। जो जन-प्रतिनिधि अपनी पार्टी नहीं, बल्कि अपने परिवार के प्रति संजीदा रहते हों, उनसे भला आप मतदाताओं के हित-लाभ की क्या उम्मीद कर सकते हैं? परिवारवाद के फैलाव ने सामान्य कार्यकर्ताओं के आगे बढ़ने का रास्ता रोक दिया है। स्वस्थ राजनीति के लिए यह शुभ संकेत नहीं।

एक और बात। चुनाव जीतने के लिए इस चुनाव के दौरान शीर्ष नेताओं ने जिस स्तर की बातें की हैं, वे डराती हैं। इस वक्त समाज बांटने से लेकर व्यक्तिगत छींटाकशी तक, जितने भी घृणित नुस्खे हो सकते हैं, सब अपनाए जा रहे हैं। हिंदी पट्टी की कहावत है कि हर दस कोस पर ‘पानी और बानी’ बदल जाते हैं। आपने गौर किया होगा कि नेताओं के वचन भी हर चरण के साथ कटुतर होते जा रहे हैं। देश के संवेदनशील लोग इससे आजिज आ गए हैं। वे मनाने लगे हैं कि ये चुनाव किसी तरह जल्दी खत्म हों, ताकि इस कीचड़ की होली से तो मुक्ति मिल सके।

यहां यह भी सवाल उठ खड़ा हुआ है कि इन नेताओं को महीनों तक हमारे जज्बात से खेलने की मोहलत क्यों दी जाती है? अगर उत्तराखंड, गोवा और पंजाब जैसे राज्यों में एक दिन में चुनाव निपटाया जा सकता था, तो उत्तर प्रदेश में तीन या चार चरणों में ऐसा क्यों नहीं हो सकता था? इस प्रश्न को उठाने की सबसे बड़ी वजह यह है कि ग्राम प्रधानी से लेकर लोकसभा तक हमारे यहां इतने चुनाव होते हैं कि हर कुछ महीने में लोगों को इस कीच-वर्षा से जूझना पड़ता है। तय है, हमें अपनी चुनाव प्रणाली को एक बार फिर से समझने, आंकने और सुधारने की जरूरत है।

हालांकि, सुधार के लिए कानून बना देने भर से काम नहीं चलने वाला। माननीय उच्चतम न्यायालय ने कुछ ही हफ्ते पहले आदेश दिया है कि चुनाव के दौरान धार्मिक और जातीय जज्बात का इस्तेमाल न किया जाए, क्या ऐसा हो रहा है? इस सवाल के जवाब में भारतीय लोकतंत्र की दुर्गति के तमाम कारण छिपे हैं। उन्हें अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए।

@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com

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