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विपक्षी दल कृपया ध्यान दें

विपक्षी दल कृपया ध्यान दें

बरेली से नोएडा लौटते वक्त मैंने टैक्सी ड्राइवर से पूछा कि भाई, कहां के रहने वाले हो, और तुमने किसको वोट दिया? जवाब मिला, ‘मेरठ का, हम लोगों ने तो मोदी को वोट दिया।’ हम लोगों से मतलब? ‘जी, हमारे घर और मोहल्ले वाले।’ क्या मैं तुम्हारी बिरादरी पूछ सकता हूं? ‘हां जी, हम जाटव हैं।’ जाटव! तुम लोगों ने मायावती को वोट नहीं दिया? ‘नहीं। मोदीजी ने हमारे घर में गैस पहुंचाई। इससे घरवाली और मां बहुत खुश हैं। उन्हें अब चूल्हे पर आंखें नहीं फोड़नी पड़तीं।’

चुनावी परिणामों के ‘पोस्टमार्टम’ के लिए इस तरह के सवाल मैंने और मेरे साथियों ने उत्तराखंड-उत्तर प्रदेश के तमाम इलाकों में आम मतदाताओं से पूछे। निष्कर्ष था- जाति की दीवारें टूटी हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी गरीब और मध्यवर्ग के बीच उम्मीद के प्रतीक के तौर पर उभरे हैं। इसकी दो खास वजहें थीं- उज्ज्वला योजना, जिसके तहत गरीब घरों में रसोई गैस पहुंचाई गई और किसानों की कृषि कर्ज माफी का वायदा, जिसने कृषकों को जोड़ने में मदद की। ऊपर से दिवाली और रमजान का जुमला! इसने रही-सही कसर पूरी कर दी। टिकट वितरण में तो पहले ही ‘सोशल इंजीनियरिंग’ के कौशल का इस्तेमाल हो चुका था।

इसी का नतीजा है कि जो मोदी मई 2014 में उम्मीद की मशाल बन उभरे थे, वह मार्च 2017 तक मतदाताओं के भरोसे का प्रतीक बन गए। मोदी जानते हैं कि चमत्कारों की उम्र बड़ी नहीं होती, इसीलिए वह काम और सियासी कौतुक को बराबरी का दर्जा देते हैं। उज्ज्वला योजना के साथ दिवाली-रमजान के जुमले का घालमेल इसका उदाहरण हैं। पर सफलताएं चुनौतियां साथ लाती हैं।

अब सवाल उठ रहा है कि क्या भाजपा इस साल के अंत में आयोजित चुनावों में गुजरात में 20 साल पुरानी सत्ता कायम रख सकेगी? क्या वह हिमाचल से कांग्रेस को बेदखल कर सकेगी? अगले वर्ष होने वाले पांच छोटे-बड़े राज्यों के चुनावों में ऊंट किस करवट बैठेगा?

इसी तरह, विपक्ष के सामने सबसे बड़ी ललकार अपना अस्तित्व बचाने की है। सवाल उठ रहे हैं- कांग्रेस क्या हिमाचल, कर्नाटक, मिजोरम और मेघालय में अपनी हुकूमत बरकरार रख पाएगी? क्या वह गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ भारतीय जनता पार्टी से छीन पाएगी? क्या इसके लिए बिहार जैसा महागठबंधन जरूरी है? यदि हां, तो क्या वह अस्तित्व में आएगा?

इन सवालों के शुरुआती उत्तर अगले कुछ हफ्तों में उत्तर प्रदेश में होने वाले लोकसभा के दो उप-चुनावों में मिल जाएंगे। कानूनन, योगी आदित्यनाथ और केशव प्रसाद मौर्य को अब छह महीने के भीतर सूबाई विधानसभा या विधान परिषद की सदस्यता ग्रहण करनी होगी। इसकी वजह से उनके निर्वाचन क्षेत्र फूलपुर और गोरखपुर में उप-चुनाव होंगे। क्या इस मौके पर कांग्रेस, सपा और बसपा अपना अहं भुलाकर कोई जुगलबंदी करेंगी?

लगता है, अमित शाह इस आशंका को ध्यान में रखकर फैसले कर रहे हैं। कर्नाटक में वरिष्ठ कांग्रेसी एसएम कृष्णा को भाजपा में शामिल कर उन्होंने पुरानी नीति को जारी रखने के संकेत दे दिए हैं। उनकी अगुवाई में अब तक विधानसभा के जितने भी चुनाव लडे़ गए, उनमें दिल्ली, बिहार और बंगाल के अलावा भाजपा उन सभी में जीती जहां वह दावेदार थी। चुनावों से पहले असम, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में उन्होंने विपक्षी दलों के प्रमुख नेताओं को इसी तरह भाजपा से जोड़ा था। इससे हवा उनके पक्ष में बनी और यह संदेश गया कि अन्य दलों की हालत खस्ता है। साथ ही शाह ने मतदाताओं के जातीय और धार्मिक अलगाव पर भी गौर किया। मसलन, मुसलमानों की चिंता किसी भी प्रदेश में नहीं की गई। उत्तर प्रदेश में सपा-समर्थक यादव और बसपा के हामी जाटव एक तरफ कर दिए गए। जिस तरह किसी बहुराष्ट्रीय कंपनी के कर्ता-धर्ता अपना ‘टार्गेट यूजर’ चुनते हैं, वैसे ही शाह ने अपना वोटर चुना और सारा ध्यान वहीं केंद्रित कर दिया।

यही नहीं, चुनाव जीतने के बाद जिन लोगों को सत्ता सौंपी गई, वे भी इसी फॉर्मूले की उपज थे। उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ महज राजपूत नेता नहीं हैं। भगवाधारी संत होने के कारण वह हिंदुओं की तमाम जातियों का आदर प्राप्त करने की क्षमता रखते हैं। साथ ही उनकी कट्टर हिंदुत्ववादी छवि वोटों के ध्रुवीकरण में सहायक साबित हो सकती है। विपक्षी उन्हें सिर्फ राजपूत कहकर लोगों को न भरमा लें, इसलिए एक अति पिछडे़ और ब्राह्मण को उप-मुख्यमंत्री बना दिया गया। समूचे मंत्रिमंडल में ऐसे लोगों को तरजीह दी गई, जो अपने क्षेत्र अथवा समाज के वोट 2019 में जुटा सकें। कश्मीर से कन्याकुमारी तक योगी को मुख्यमंत्री बनाने का जो संदेश गया है, अगर भाजपा इसे 2019 तक कायम रख सकी, तो भारतीय राजनीति में यकीनन नए सियासी चलन की शुरुआत होने जा रही है।

इसी बीच सुप्रीम कोर्ट की इस सलाह ने सियासत गरमा दी है कि अयोध्या विवाद पर दोनों पक्ष मिल-बैठकर फैसला कर लें। अगर राम मंदिर के निर्माण की शुरुआत हो गई, तो फिर क्या कहने? समर्थक नरेंद्र मोदी के सिर यह सेहरा बांधने की कोशिश करेंगे। कहा जाएगा कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मौजूदा प्रधानमंत्री वह करने में कामयाब हो गए, जो चंद्रशेखर, नरसिंह राव और अटल बिहारी वाजपेयी न कर सके।

गौरतलब है कि जहां भाजपा एक साथ इतने मोरचों पर काम कर रही है, वहीं देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को अभी यह कवायद करनी बाकी है। पंजाब का उदाहरण लें, वहां जीत का श्रेय आलाकमान के साथ अमरिंदर सिंह को भी मिला। अब वह इस सूबे के मुख्यमंत्री हैं। प्रश्न उठना लाजिमी है कि 75 साल का सत्तानायक नौजवानों को कितने दिन अपने साथ जोडे़ रख सकेगा? इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस को अब चुस्त-दुरुस्त नेताओं की दरकार है। मणिपुर और गोवा इस आवश्यकता को और बल देते हैं, क्योंकि वहां सर्वाधिक सीटें पाने के बावजूद कांग्रेस सरकार बनाने के लिए जरूरी फुर्ती दिखाने में नाकामयाब रही। कांग्रेस को इस ढीलेपन पर काबू पाना होगा। उसका साबका ऐसी टीम से है, जो अपनी रणनीति में समय रहते बदलाव करती है और कड़े फैसले लेने में देर नहीं लगाती।

अब क्षेत्रीय दलों पर एक नजर। ममता बनर्जी, नवीन पटनायक तथा मायावती अधेड़ावस्था पार कर रहे हैं, पर उन्होंने अभी तक अपना वारिस नहीं चुना है। जयललिता ने यही भूल की थी, जिसका दुष्परिणाम उनके निधन के बाद उनकी पार्टी को भोगना पड़ रहा है। ऐसे असुरक्षित नेता भरोसेमंद गठबंधन का निर्माण कैसे कर पाएंगे? पिछले कुछ चुनावों में मतदाताओं की एक नई प्रवृत्ति के दर्शन हुए हैं। वोटर अब विकास के साथ स्थायित्व भी चुनते हैं। यह प्रवृत्ति अगले चुनावों में कमजोर पड़ जाए, इसके आसार नहीं हैं। समय आ गया है, जब समूचा विपक्ष इन सवालों पर गौर फरमाए। मई 2014 से मार्च 2017 के बीच हुए चुनाव भविष्य के जो दिशा संकेत दे रहे हैं, वे उनके लिए खतरे की घंटी से कम नहीं।
@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com

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