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पहले एक चंपारण था, अब अनेक हैं

आप चंपारण के रण को कैसे याद करना चाहेंगे? भारत की जंग-ए-आजादी के एक ऐसे खास मुकाम के तौर पर, जिसने आदिम चेतना से जन्मी इस लड़ाई को सार्थक मोड़ दिया? काल के एक ऐसे खंड के तौर पर, जिसने मोहनदास को उस अग्निपथ पर ला खड़ा किया, जो उन्हें आम मनुष्य से ‘महात्मा’ बनाने जा रहा था? या, आप इस आंदोलन को ऐसा आह्वान मानेंगे, जिसने तमाम नामवरों को दमितों, शोषितों के साथ एक कतार में जा खड़ा होने को प्रेरित किया?

इन सवालों के जवाब के लिए आपको सौ साल पीछे ले चलता हूं। बीसवीं शताब्दी के शुरुआती चंपारण में गुलाम-प्रथा अत्यंत घिनौने तौर पर कायम थी। इस उपजाऊ अंचल के किसानों से जबरन नील की खेती कराई जाती। अंग्रेजों के वफादार जमींदार उनसे किस्म-किस्म के टैक्स वसूलते। इन करों से सरमाएदारों के खजाने तो भरते थे, पर किसानों को हमेशा खाली पेट सोने को मजबूर होना पड़ता। आप जानकर हैरान होंगे कि 1910 के आस-पास कुल जमा 40 से ज्यादा किस्म की लगान किसानों से वसूली जाती थीं। 

जो खेतिहर इन्हें अदा करने में असमर्थ होते, उन पर कोडे़ बरसाए जाते, घोड़ों के पीछे बांधकर घसीटा जाता अथवा पेड़ों से उल्टा लटका दिया जाता। इससे भी काम न चलता, तो उनके घर फूंक दिए जाते। यह शोषण का ऐसा सिलसिला था, जो हुकूमत की शह पर पल रहा था। लिहाजा जमींदार का कौल कानून था। वे ही वादी, वे ही वकील और वे ही मुंसिफ थे।

नतीजतन, लाखों किसान परिवार हर पल भय और आतंक का अंधियारा जीने को अभिशप्त थे। 

इतिहास की रवायत है कि शोषण जब हद से बढ़ जाता है, तो शोषितों के बीच से कुछ लोग आवाज उठाना शुरू कर देते हैं। राजकुमार शुक्ल इसी दुर्लभ प्रजाति के व्यक्ति थे। उन्होंने युद्ध तो छेड़ दिया था, पर उसे मुकाम तक पहुंचाना उनके वश की बात नहीं थी। इसी बीच 1916 में कांग्रेस के लखनऊ अधिवेशन में वह लगभग अपनी ही उम्र के मोहनदास करमचंद गांधी से मिले। गांधी ने दक्षिण अफ्रीका में जिस तरह इंसाफ की लड़ाई लड़ी थी, उससे शुक्ल वाकिफ थे। वह मोहनदास के पीछे पड़ गए कि उन्हें एक बार चंपारण चल वहां की अंधेरगर्दी देखनी चाहिए। बैरिस्टर गांधी ने उनका आमंत्रण स्वीकार कर लिया।

अप्रैल, 1917 में जब गांधी मोतिहारी स्टेशन पर उतरे, तब उन्हें खुद अंदाजा नहीं था कि नियति उनका इंतजार कर रही है। उनके स्वागत में सैकड़ों लोग उमड़ पड़े थे। नटाल (दक्षिण अफ्रीका) के बाद यह दूसरा मौका था, जब इतनी बड़ी संख्या में दबे-कुचले उनमें मसीहा की झलक पा रहे थे। उधर, चंपारण के अंग्रेज कलक्टर को आदतन इसमें बगावत की बू आई। उसने उन्हें शांति भंग की आशंका के तहत गिरफ्तार कर लिया। इस कार्रवाई ने जैसे शोलों को हवा दे दी। लोगों का आक्रोश हदें न लांघ जाए, इसके लिए जिला प्रशासन ने मोहनदास से जमानत की पेशकश की। गांधी कानून के साथ अंग्रेजों के हथकंडों से भी वाकिफ थे। उन्होंने जमानती मुचलका भरने से मना कर दिया। कलक्टर वही गलती कर बैठा था, जो कभी नटाल के कनिष्ठ अधिकारियों ने की थी। गांधी रातों-रात हीरो बन गए। उनकी पेशी के दौरान अदालत के बाहर हजारों लोगों का हुजूम इकट्ठा होता चला गया। 

सकपकाए जिला प्रशासन को उन्हें छोड़ना पड़ा। हिरासत के उन दिन-रात ने मोहनदास करमचंद गांधी के ‘महात्मा’ बनने का रास्ता हमवार कर दिया था। गांधी ने इस लड़ाई को आवेग नहीं, युक्ति से लड़ा। उन्होंने 2,841 गांवों में आठ हजार लोगों के बीच सर्वे कराया। आज टेलीविजन के शहसवार प्राय: 125 करोड़ की आबादी वाले देश में हजार-पांच सौ लोगों से बात कर जनादेश की दशा-दिशा बखानने लगते हैं। सोचें, सौ साल पहले सिर्फ एक इलाके में कराया गया यह सर्वे कितना वास्तविक रहा होगा! 

अपने मनबल और चंपारण के जनबल के बूते गांधी ने यह जंग जीती और निलहे जमींदार अतीत का हिस्सा बनते चले गए। 

इतिहासकार मानते हैं कि चंपारण ने गांधी के जीवन को नई दिशा दी। यही वह मुकाम था, जिसने मोहनदास को ‘महात्मा’ बना दिया और भारतीय किसानों को अपनी असली ताकत का एहसास कराया। इसी का नतीजा था कि अंग्रेजों की 150 साला हुकूमत अगले 30 साल में सिमट गई। 

हालांकि, चंपारण आंदोलन को महज आजादी की लड़ाई से जोड़ लेना इसके साथ अन्याय होगा। 1917 में वहां के किसानों ने शोषण से मुक्ति का सपना देखा था। क्या वह पूरा हुआ? यह कड़वा सच है कि आजाद भारत के हुक्मरानों ने भी किसानों के साथ कोई बेहतर सुलूक नहीं किया। वे आज भी उपज की आय से पेट भरने में नाकाम हैं। निलहे ठेकेदार भले ही चले गए हों, पर उनके प्रतिरूप साहूकार अभी तक उनका खून पीने को स्वतंत्र हैं।

उन्हें मुक्ति कैसे मिलेगी? 

बिहार पर लौटते हैं। भूमि सुधार की पहल यहां अभी तक परवान नहीं चढ़ पाई है। न्यायपालिका के निर्णय तक इस संबंध में कारगर साबित नहीं हुए हैं। बिहार में हाल-फिलहाल तक एक कानून था, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट के फैसले को भी समीक्षा के लिए राजस्व मंत्री के पास भेजा जा सकता था। इसी का लाभ उठाकर राजनेता उन सुधारों पर कुंडली मारकर बैठे रहे। यह तब भी हुआ, जब एक चौथाई सदी से अधिक समय से वहां पर समाजवादी विचारधारा के लोगों का शासन रहा। 

शोषण मुक्ति के वायदों, दावों और असलियत में यही अंतर होता है। सोचता हूं कि अगर आज गांधी जिंदा होते और राजकुमार शुक्ल का कोई वंशज उन्हें दोबारा चंपारण की सैर कराता, तो वह हैरत का शिकार बन गए होते। वहां अब भी हालात बहुत सुधरे हुए नहीं हैं। 

चंपारण के किसानों की तरह देश के अन्य हिस्सों के भूमिपुत्र भी बदहाल हैं। भारत में एक साल में आठ हजार से ज्यादा किसान आत्महत्या कर लेते हैं। आंकड़े गवाह हैं कि रोजगार के अभाव में गांव वीरान हो चले हैं और वहां से पलायन कर गए लोगों की वजह से शहर बदहाल होते जा रहे हैं। हालांकि, पिछले हफ्ते एक सुकून भरी खबर मिली। उत्तर प्रदेश सरकार ने लगभग 87 लाख गरीब कृषकों का एक लाख रुपये तक का कर्ज माफ कर दिया। इसके साथ ही पांच हजार गेहंू खरीद केंद्रों की स्थापना का फैसला किया, ताकि वे उचित दर पर गेहूं बेच आगे कर्ज के जंजाल में न फंसे। यही नहीं, आलू किसानों को राहत देने के लिए उप-मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य की अगुवाई में समिति के गठन का निर्णय भी किया गया। उधर तमिलनाडु उच्च न्यायालय ने वहां की सरकार को कर्जमाफी का हुक्म दिया है। महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फड़णवीस ने भी ऐसी ख्वाहिश जाहिर की है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में कुछ अन्य राज्य ऐसा करें। अच्छा होगा कि राजनेता इस लोक-लुभावन फैसले के साथ कुछ ऐसी व्यवस्था करें कि धरतीपुत्र दोबारा कर्ज के दलदल में न फंसें। 

यह इसलिए जरूरी है, क्योंकि पहले एक चंपारण था, आज सैकड़ों हैं। यह आजाद भारत को आजाद भारत का त्रासद तोहफा है!

@shekharkahin 
shashi.shekhar@livehindustan.com

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