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आशा का अपना अमरत्व

शशि शेखर First Published:18-03-2017 04:24:09 PMLast Updated:20-03-2017 01:06:54 AM
आशा का अपना अमरत्व

‘‘मैंने पहला गाना 1943 में गाया था, जरा जोड़ो कितने साल हो गए?... आपने मुझे यहां बुलाने में कितने साल लगा दिए? अब पता नहीं भविष्य में कभी आ पाऊंगी या नहीं, इसलिए कोशिश करूंगी कि आज की शाम अपना ‘द बेस्ट’ आपके सामने पेश कर सकूं।’’

यह थीं आशा भोसले। हमारे सहयोगी रेडियो ‘नशा’ की पहली वर्षगांठ पर आयोजित कार्यक्रम की शुरुआत करती हुईं। वह उनका दिल्ली या राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में पहला कार्यक्रम था। वह इसी का उलाहना दे रही थीं। वहां मौजूद तीन पीढ़ियों के लोग उन पर निसार हुए जा रहे थे। हाय, कितनी मीठी आवाज है, पास बैठी एक युवती ने अमेरिकी लहजे वाली अंग्रेजी में अपनी मां से कहा। आशा ताई की सफेद साड़ी पर उस वक्त चांदी के वर्क के सलमा-सितारे जगमगा रहे थे। मन में सवाल उभरा, इन्हें इसकी क्या जरूरत? यह तो खुद चलता-फिरता आभामंडल हैं।

संगीत संध्या की शुरुआत उन्होंने लता मंगेशकर के एक गाने और संस्मरण से की। आशा ने कहा कि यहां जब आने का कार्यक्रम बना, तो मैं दीदी के पास गई। उनसे कहा कि चलो दोनों बहनें दिल्ली में एक कार्यक्रम करके आते हैं, पर ये हो न सका। कहते वक्त उनकी आवाज थोड़ी थरथराई। ऐसा लगा, जैसे दोनों बहनों के दशकों पुराने रिश्तों की समूची सरदी-गरमी उनके दिल-ओ-दिमाग में ताजा हो आई हो। जानने वाले जानते हैं कि लता दीदी हमेशा उनकी संरक्षक साबित नहीं हुईं।

कहते हैं कि जब आशा ने फिल्मों में पार्श्व-गायिकी का फैसला किया, तो लता को बहुत अच्छा नहीं लगा। बाद में जब ओपी नैयर ने लता मंगेशकर से एक भी गाना न गवाने का निर्णय किया, तो आशा उनकी पहली पसंद के तौर पर उभरीं। दोनों ने फिल्म इंडस्ट्री को ढेर सारे यादगार गाने दिए। इसी तरह, लता के निजी सचिव गणपत राव भोसले से विवाह के फैसले पर आशा को दीदी की खिन्नता झेलनी पड़ी थी। आरडी बर्मन ने नैयर की तरह लता से भले ही दो-दो हाथ न किए हों, पर अपनी ‘द बेस्ट’ धुनें छोटी बहन के ही नाम कीं। आरडी यानी पंचम बाद में आशा के विधिवत पति भी बने। सवाल उठता है- लता के मुकाबले आशा को तरजीह देने के पीछे उनका दिल था या दिमाग?

हकीकत कुछ भी हो, पर लंबे समय तक कुछ संगीतकार दोनों बहनों को एक-दूसरे का प्रतिस्पर्धी मानते रहे। हालांकि, मंगेशकर परिवार के आलोचक कहते आए हैं कि यह नूरा-कुश्ती थी। इस तरह, दोनों बहनों ने किसी अन्य गायिका के लिए ‘स्पेस’ नहीं छोड़ा। हर रहस्य की तरह आप इस दावे में सच की थोड़ी-बहुत परछाईं पाएंगे। यह सच है कि लंबे समय तक हिंदी सिनेमा के प्राय: सभी गाने ‘इस’ या ‘उस’ बहन के खाते में आते रहे। इस दौर में गीता दत्त, सुमन कल्याणपुर, कविता कृष्णमूर्ति, हेमलता और अनुराधा पौडवाल जैसी तमाम गायिकाओं की प्रतिभा इन वटवृक्षों की छांह में पनप न सकीं। मंगेशकर बहनों के लंबे करियर की एक वजह यह एकाधिकारवादी रवैया भी है।

बहरहाल, दर्शक उनकी आवाज की लर्जिश से कोई गूढ़ अर्थ निकालते, इससे पहले आशा ने ‘कंसर्ट’ की शुरुआत लता के मशहूर गीत ‘लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो’ से कर दी। कड़वाहट पीकर मधुरता बिखेरना आशा भोसले की आदत है।

आशा ने अपनी शोखी के दीवानों को इस गंभीर गीत के जरिये कुछ पल के लिए विस्मित जरूर किया, पर जल्दी ही वह अपने रंग में आ गईं। दर्शकों के साथ बैठे मशहूर गायक मीका को आवाज लगाई- ‘मीका मेरे साथ गाना गाओगे?’ मीका ऊपर आए। पीढ़ियों और संस्कारों का अंतर साफ दिख रहा था। आशा स्टेज पर नंगे पैर थीं। उधर, आंखों पर काला चश्मा सूट-बूटधारी मीका की चाल-ढाल जुदा थी, मगर आशा चूकी नहीं। उन्होंने उलाहना दिया, तो मीका को जूते उतारने पड़ गए। इसके साथ ही ‘जवानी-दीवानी’ फिल्म के मशहूर तराने का तरन्नुम फिजां में तैरने लगा- ‘जाने जां ढूंढ़ता फिर रहा, हूं तुम्हें रात-दिन मैं यहां से वहां...।’

नीचे बैठे श्रोता मंत्रमुग्ध। हर बंदिश और हर मुरकी से आशा ताई की देह जैसे एकाकार हो जाती। स्वर और सुर उनके कंठ से नहीं, बल्कि समूचे देह-प्राण से झर रहे थे। भला हुआ कि मीका, मीका ही बने रहे, उन्होंने किशोर कुमार बनने की कोशिश नहीं की। बाद में मीका ने आशा भोसले के साथ एक और ‘डुएट’ गाया। दोनों बार ऐसा लगा, जैसे कोई शेरनी अपने शावक के साथ खेल रही है।

वह सिर्फ एक संगीत संध्या नहीं, बल्कि एक लंबे कालखंड का लाइव ‘फ्लैश बैक’ भी था। ‘शो’ के बीच में वह अपने संस्मरण सुनाती चल रही थीं। एक आपसे ‘शेयर’ करता हूं। आशा ने बताया कि एक बार हुगली नदी के तट पर आरडी बर्मन और वह साथ-साथ बैठे थे। शाम ढल गई थी, तारे टिमटिमाने लगे थे। नदी के गहरे विस्तार को चप्पू से चीरते हुए नाविक अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे। हवा, चप्पुओं की मद्धम आवाजें, मल्लाहों के गीत और उन्हें सुनते-गुनते बर्मन दंपति। फिजां में पसरा मौन गुपचुप काफी कुछ रच रहा था। परिणति पंचम की उत्तेजना भरी वाणी से हुई- ‘आशा चलो, गीत बन गया।’
हुआ यह था कि कलकत्ता आने से पहले मुंबई स्थित उनके आवास पर दिग्गज निर्देशक शक्ति सामंत आए थे। बांग्ला में उन्होंने बर्मन से कहा था कि मैं अमिताभ बच्चन और जीनत अमान को लेकर बड़ी फिल्म बना रहा हूं। उसमें संगीत तुम दे रहे हो। यह तुम्हारी, मेरी, अमिताभ और जीनत की इज्जत का सवाल है, सब कुछ हिट होना चाहिए। चपल आशा अपना जिक्र न पाकर बोल पड़ी थीं कि शक्ति दा, मैं भी तो उस फिल्म में गा रही हूं, फिर मेरा नाम क्यों नहीं लिया? उसी क्षण से पंचम और आशा के मन में उस फिल्म को लेकर मंथन चल रहा था। हुगली किनारे की शाम ने आरडी को धुन दे दी थी। आप उस गाने को सुनिए, लगेगा जैसे कहीं पास में चप्पू ताल दे रहे हैं और नदी गा रही है। फिल्म ‘द ग्रेट गैंबलर’ के लिए अमिताभ और जीनत पर यह गाना वेनिस में फिल्माया गया था- ‘दो लफ्जों की है दिल की कहानी, या है मोहब्बत, या है जवानी।’

आशा भोसले के किस्से और नगमे सुनते-गुनते वह शाम ऐसी बीती कि पता न चला। नहीं जानता, फिर कभी उन्हें ‘लाइव’ देखने का अवसर मिलेगा या नहीं, पर फर्क क्या पड़ता है? 20 भारतीय भाषाओं में गाए गए 11 हजार से अधिक नगमे, सात फिल्मफेयर अवॉर्ड, पद्म विभूषण, ‘बॉलीवुड का नोबेल’ दादा साहब फाल्के पुरस्कार और वे तमाम अलंकरण, जो उन्हें सम्मानपूर्वक दिए गए हैं, उन्हें कालजयी बनाते हैं। उन्होंने खुद के लिए वह मुकाम गढ़ लिया है, जहां पद, पदवियां और अपना दैहिक अस्तित्व तक अदना साबित हो जाता है। आती दुनिया में भी जब किसी के कान में फागुन की पहली बयार सी चुहल, पहाड़ी दरिया जैसी चपलता, सागर सी गहराई और बर्फीली चोटियों की रूहानियत एक साथ टकराएगी, तो लोगों के मुंह से बेसाख्ता निकलेगा- आशा भोसले।
@shekharkahin
shashi.shekhar@livehindustan.com

शशि शेखर का ब्लॉग अंग्रेजी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें।

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