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शुरू से ही लग गया थिएटर का चस्का

First Published:19-03-2017 12:10:02 AMLast Updated:19-03-2017 12:10:02 AM

हमारे स्कूल में संगीत, खेल, कला, पढ़ाई, एक्टिंग, सभी की मुकम्मल ट्रेनिंग दी जाती थी। मैं स्कूल का प्रेसीडेंट भी रहा। उस समय यह माना जाता था कि आपने अगर हर चीज में हिस्सा नहीं लिया, तो लोग आप को नामुकम्मल समझेंगे। वहां मिस्टर और मिसेज ब्राउन थे, जो हमें थिएटर सिखाते थे। उनके साथ थिएटर सीखने के लिए एक साल का मौका मिलता था। जाने क्यों, मुझे 11वीं और 12वीं में दो साल मौका मिला। मैंने दो साल में छह नाटकों में हिस्सा लिया। वहां इतना कुछ सीखने को मिला- थिएटर को लेकर, एक्टिंग को लेकर, कॉन्फिडेंस को लेकर, आवाज को लेकर। मैं उन दोनों का अब भी शुक्रगुजार हूं। ब्राउन साहब बड़े सख्त मिजाज थे और उनकी पत्नी उतनी ही नरम। वह खूब डांटते थे और फिर उनकी पत्नी आकर कहती थीं कि कोई बात नहीं... कोई बात नहीं।

इसके पहले जब हम चौथी क्लास में थे, हमारी हिंदी टीचर मिसेस कपाड़िया हर 15 अगस्त के लिए नाटक तैयार कराती थीं। चौथी से लेकर सातवीं कक्षा तक हम हिंदी की क्लास वाले एक नाटक पेश करते थे। नाटक को हम खुद ही लिखते, खुद ही डायरेक्ट करते, और खुद ही उसमें एक्टिंग भी करते थे। मिसेस कपाड़िया हमें गाइड करती थीं। क्या कमाल की ट्रेनिंग होती थी। एक साल हमने शकुंतला को लेकर नाटक किया, फिर एक बार हमने आजादी को लेकर नाटक किया था। हिंदी क्लास में कम ही लोग थे, उसमें मेरा दोस्त पॉल भी था। नौवीं से लेकर 12वीं तक एक और टैलेंट शो होता था। उसमें हर क्लास को मौका दिया जाता था, जो हम अपनी तरफ से करते थे। उसमें एक साल हमने जेम्स बांड को लेकर मजाकिया नाटक पेश किया था। वुडस्टॉक में एक टीचर थीं मिस मार्ली। वह कम से कम 50 साल तक वुडस्टॉक में टीचर रहीं। उन्हें थिएटर में काफी दिलचस्पी थी। हमारे प्रिंसिपल की जो पत्नी थीं, उन्हें भी थिएटर में बहुत ज्यादा दिलचस्पी थी। मैं 12वीं क्लास में स्कूल का प्रेसीडेंट भी था, तो मुझे स्पीच देनी होती थी। कुल मिलाकर, कुछ ‘ऑर्गनाइज्ड’ और कुछ ‘अनऑर्गनाइज्ड ट्रेनिंग’ वहां हर तरफ से मिलती रहती थी। जाहिर है, थिएटर के प्रति जो मेरा रुझान था, वह मेरे खून में था।

फिर जब मैं कॉलेज के लिए अमेरिका गया, तो येल यूनिवर्सिटी में दाखिला मिला। वहां फस्र्ट ईयर में हमारे लैटिन के जो प्रोफेसर थे, एरिक सीगल। वह बहुत बडे़ लेखक थे। इंग्लिश में एक बड़ी मशहूर फिल्म आई थी लव स्टोरी। वह उन्हीं की किताब पर आधारित थी। बाद में नसीरुद्दीन शाह की एक फिल्म आई थी- मासूम । वह सीगल सर की लिखी किताब मैन-वुमन ऐंड चाइल्ड पर आधारित थी। फस्र्ट ईयर में जब वह हमें पढ़ाते थे, तब उन्होंने एक लैटिन नाटक का अनुवाद अंग्रेजी में किया था। एक दिन उन्होंने क्लास में कहा कि वह इस नाटक को करना चाहते हैं। मैंने कहा- मैं भी उसमें हिस्सा लेना चाहूंगा। उस नाटक में मैंने बाकायदा लीड रोल किया था। एरिक सीगल जैसे इंसान के साथ काम करने का मुझे मौका मिला। जब मैं वापस हिन्दुस्तान आया और वुडस्टॉक में नौकरी करने लगा, तब भी मैंने थिएटर किया। मेरे दो अजीज दोस्त हैं- नसीरुद्दीन और बेंजामिन गिलानी। एक बार इन्होंने कहा कि ‘भाई, हम एक नाटक मंडली शुरू करना चाहते हैं, आप भी उसमें आ जाओ’। हम इनसे जुड़ गए। इस तरह प्रोफेशनल थिएटर भी शुरू हो गया। आज भी वह सिलसिला जारी है। पिछले 15 साल से दिल्ली के सईद आलम साहब के साथ भी थिएटर कर रहा हूं।

फिर साल 1972 में मैंने पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में एडमिशन ले लिया। 1972 से लेकर 1974 तक मैं इंस्टीट्यूट में था। रोशन तनेजा साहब हमारे गुरु थे। तनेजा साहब के साथ दो साल तक हम रहे। उनके शार्गिद रहे। रोशन तनेजा कमाल के इंसान, कमाल के गुरु थे। फिल्म इंस्टीट्यूट से जितने भी बडे़-बड़े कलाकार निकले हैं, उनमें से कुल मिलाकर 13 बार तनेजा सर के स्टूडेंट्स को एक्टिंग का नेशनल अवॉर्ड मिला। मेरे ख्याल से पूरी दुनिया में यह अपने आप में एक रिकॉर्ड होगा कि एक इंस्टीट्यूट के एक ही गुरु के स्टूडेंट्स को 13 बार नेशनल अवॉर्ड मिला हो। मैं भी उनके साथ दो साल तक रहा। मुझे अभी तक नेशनल अवॉर्ड तो नहीं मिला, मगर नसीरुद्दीन शाह, ओम पुरी, शबाना आजमी, मिथुन चक्रवर्ती, रेहाना सुल्ताना और साधु मेहर, ये सब उन्हीं के स्टूडेंट थे और इन सभी को नेशनल अवॉर्ड मिले हैं। इनके अलावा शत्रुघ्न सिन्हा, जलाल आगा, असरानी, पेंटल, नवीन निश्चल, जया भादुड़ी, रजा मुराद, किरन कुमार जैसे कलाकार भी उनके स्टूडेंट रहे। उनके शागिर्दों की बहुत लंबी फेहरिस्त है।
(जारी...)

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