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जल्दी जागने-रोज नहाने से शतायु बने शुक्ल

ब्रह्ममुहूर्त में जगने, रोज नहाने और सात्विक भोजन को संस्कार बनाने वाले युगल किशोर शुक्ल ने अपने जीवन का शतक पूरा कर लिया है। भारत को आजाद होने के साथ ही श्री शुक्ल 1948 में शिक्षक बने और राष्ट्र निर्माण में जुट गए।

वर्ष 1983 में सेवानिवृत्त होकर पैतृक गांव लेस्लीगंज के चौरा में रहने लगे। वह 90 साल की उम्र तक साइकिल चलाते थे और करीब 27 किलोमीटर दूर मेदिनीनगर आते-जाते रहे। हफ्ते भर पहले से उन्हें बुढ़ापा सताने लगा और अब उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया है।

स्कूल और घर दोनों जगह कड़ा अनुशासन का पालन करने वाले और परिणाम के प्रति हमेशा तत्पर रहने वाले शुक्ल की वास्तविक उम्र फिलवक्त 102 वर्ष है। पलामू के मेदिनीनगर, महुआडांड़, कोनवाई, पांकी आदि बुनियादी विद्यालयों में सेवा देने वाले श्री शुक्ल अति बुजुर्ग होने के बावजूद हफ्ते भर पहले तक बैंक, एटीएम, मोबाइल, पेंशन आदि के काम खुद करते रहे। इतना ही नहीं, वह देश-दुनिया की खबरें भी रेडियो से सुनना कभी नहीं भूलते।

शुक्ल के बड़े पुत्र मदन शुक्ल भी शिक्षक के तौर पर बेहतरीन सेवा देने के लिए राष्ट्रपति पुरस्कार से नवाजे जा चुके हैं। वह भी 2006 में सेवानिवृत हो चुके हैं। शुक्ल के पोते चंद्रशेखर शुक्ल वर्तमान में पलामू जिला कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। चंद्रशेखर शुक्ल बताते हैं कि चार बजे सुबह जगना और स्नान कर लेना, छह-सात बजे तक नाश्ता, 12 बजे तक भोजन और फिर शाम में छह बजे तक खाना उनके दादा जी की दिनचर्या रही है। उनके डर से घर में लहसुन-प्याज भी लोग नहीं खाते थे। उम्र में कुछ महीने की बड़ी श्री शुक्ल की पत्नी नागवंशी देवी बताती हैं कि जीवन में वह कभी बीमार नहीं पड़े। शुक्ल शिक्षक बनने के काफी पहले हायर सेकेंडरी पास कर चुके थे और बाद में स्नातक भी किया।

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  • Web Title:Early waking-day bath became centenarians Shukla
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