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निगम चुनाव में जीते तो प्रतिद्वंद्वी भी बधाई देने आए

उस समय का चुनावी नजारा ही दूसरा होता था। वोटबैंक और जातीय राजनीति एकदम नहीं होती थी। शांतिपूर्ण माहौल होता था।

एक ही पार्टी के हम तीन लोग एक ही वार्ड से चुनाव लड़ रहे थे। एक प्रत्याशी श्याम सुंदर गुप्ता तो मेरे छोटे भाई के समान थे। आपस में कोई मतभेद नहीं होता था। हम चुनाव जीते तो प्रतिद्वंद्वी भी बधाई देने पहुंचे थे। आज का माहौल तो बहुत खराब है। जीतने के लिए लोग धांधली और गुंडागर्दी तक करते हैं। पैसा फेंक तमाशा देख- की कहावत चरितार्थ होती है।

पहली बार 78 वोट से जीते थे

84 वर्षीय जगदीश प्रसाद यादव सत्तर व अस्सी के दशक में हुए नगर निगम चुनावों की चर्चा छिड़ते ही भावुक हो गए। वे वार्ड नं.30(अब 65) से दो बार चुनाव जीते थे। पहली बार 1977 और फिर 1984 में पार्षद बने। हिन्दुस्तान के साथ अपने चुनावी अनुभवों को साझा करते हुए बताया कि पहली बार महज 78 वोट से जीते थे। पर दूसरी बार जीते 2200 वोट से। सभी प्रतिद्वंद्वी प्रत्याशियों की जमानत तक जब्त हो गई थी। कैलाश कक्कड़ दूसरे और निर्मल कुमार तीसरे स्थान पर रहे थे।

पैदल ही घूम जाते थे गली-गली

अपने चुनावी प्रचार की बाबत बताया कि पैदल ही गली-गली और घर-घर घूम जाते थे। उनके वार्ड में सभी गली आपस में जुड़े हुए थे। इसलिए प्रचार के लिए वाहन की जरूरत नहीं पड़ती थी। वार्ड के लगभग सभी मतदाता से संपर्क करते थे। वैसे तो वार्ड के सारे लोगों से रोज का मिलना-जुलना रहता था। हर किसी की परेशानी से अवगत रहते ही थे। उनके दुख-सुख की हर घड़ी में पहुंचते थे।

दो बार लड़े पर एक भी पैसा खर्च नहीं

जनसंघ के प्रतिबद्ध कार्यकर्ता रहे जगदीश बाबू पटना सिटी व्यापार मंडल से भी पच्चीस साल तक जुड़े रहे हैं। उनके मुताबिक चुनाव में सभी बिरादरी का समर्थन मिला। वार्ड के लोगों ने जाति और संप्रदाय से ऊपर उठकर चुनाव में उन्हें समर्थन दिया। यही वजह है कि नगर निगम के दो चुनाव लड़े पर उन्हें एक भी पैसा खर्च नहीं करना पड़ा। वार्ड के लोगों ने चंदा करके उन्हें लड़ाया और जिताया।

नंदू बाबू तो हमलोगों के वोट से पार्षद बने

जगदीश बाबू ने उस समय के चुनावी परिदृश्य की चर्चा करते हुए बताया कि नंदू बाबू (वरीय भाजपा नेता और विधान सभा में प्रतिपक्ष के नेता नंद किशोर यादव) भी उस जमाने में निगम के पार्षद बने थे। पर वे सीधे चुनाव जीतकर नहीं आए थे। वे हम पार्षदों के वोट से निगम के पार्षद चुने गए थे।

पांच हजार का विकास का काम कराना भी मुश्किल था

उस जमाने में नगर निगम में विकास कार्यों के लिए फंड की भारी कमी होती थी। वार्ड में पांच हजार रुपए का काम कराना भी मुश्किल होता था। तत्कालीन मेयर केएन सहाय के प्रयासों के बाद निगम को सीधे विकास कार्यों के लिए फंड मिलने लगे।

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  • Web Title:pmc election down the memory lane