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छपरा में रागहीन हो गई बांसुरी बनाने वालों की जिंदगी

बांसुरी की मीठी व सुरीली आवाज किसको नहीं भाती। आम से खास लोग इसकी मधुर आवाज के कायल हैं। बांसुरी से जो भी आवाज निकलती है एक राग बन जाती है लेकिन सुरीली बांसुरी को अपने परिश्रम से जीवंत रूप देने वाले कारीगरों की जिंदगी आज बेसुरी व रागहीन हो गई है। इन्हें न रहने को घर है और न खाने को भरपेट भोजन।

प्रखंड मुख्यालय से करीब तीन किलो मीटर पश्मि बेला, मठिया व महम्मदपुर गांव हैं। तीनो गांव एक दूसरे से सटे हुए हैं। यहां मिसिकार जाति के लोगों की संख्या बहुतायत मात्रा में है। इनका मुख्य पेशा बांसुरी बनाना है। ये सुबह से ही अपने बाल-बच्चों के साथ इस काम में लग जाते हैं। कोई भांति चलाता है तो कोई बांसुरी में छेद करता ह,ै तो कोई उसे रंगने में जुटा रहता है। घर के जानकार बुजुर्ग इसे खुद बजाकर आवाज देखता है कि कहीं आवाज बेसुरी तो नहीं। अगर आवाज सही नहीं निकली तो फिर उसे ठीक किया जाता है।

कई राज्यो में मशहूर है बेला की बांसुरी

बेला व मठिया की बांसुरी कई राज्यों में मशहूर है। यहां के बांसुरी बनाने वाले खुद अपने आप में कलाकार हैं। अधिकतर लोग बैंड पार्टी भी खोले हैं जिसमें वे खुद वाद्य यंत्र बजाते हैं। ऐसे में उनके हाथों से बनी बांसुरी काफी सुरीली होती है। बड़े-बड़े कलाकार यहां की बांसुरी का उपयोग करते हंै। उड़ीसा, उत्तर प्रदेश, छतिषगढ़, दिल्ली से महाराष्ट्र तक यहां की बांसुरी की मांग है। कारीगरों का का कुछ परिवार हमेशा इन राज्यों में लगने वाले मेलों में बासुरी बेचने आते-जाते रहते हैं। अच्छी कमाई भी होती है। मांग के अनुसार अन्य राज्यों में बांसुरी की सप्लाई भी करते हैं। खुद ग्राहक यहां तक आकर बांसुरी की बड़ी खेप लेकर जाते हैं।

सूद भरने में ही लग जाती है गाढ़ी कमाई

इतनी मांग व मेहनत के बावजूद बांसुरी बनाने वालों की हालत अत्यंत ही दयनीय है। इनकी गाढ़ी कमाई महाजनों के सूद भरने में ही चली जाती है। यहां जो भी मिसिकार लोग हैं, उनमें अधिकतर के पास रहने के लिए अपनी जमीन नहीं है। ये सरकारी जमीन व बांध पर झोपड़ी डाल कर रहते हैं। अशिक्षा के कारण इनके परिवार भी बड़े हैं। इनके लिए दो जून की रोटी की जुगाड़ करनी पड़ती है। बांसुरी के लिए नरकट व बांस की जरूरत होती है, जिसे खरीदने के लिए पूंजी चाहिए। सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं मिलने के कारण इन्हें महाजनों से कर्ज लेना पड़ता है। इनके पास गिरवी रखने को कुछ भी नही हैं। लिहाजा महाजन ऊंचे सूद पर इन्हें कर्ज देते हैं। अपने बच्चों को पालने व ब्यसाय चलाने ले लिए इन्हें मजबूरन कर्ज लेना पड़ता है लेकिन सूद इतना ज्यादा होता है कि हाड़तोड़ मेहनत कर अच्छी कमाई करने के बावजूद महाजनों के सूद भरने में ही ये परेशान रहते हैं।

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  • Web Title:Life of flute-making people became angry in Chapra