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संघ के सिपाही त्रिवेंद्र रावत को दोस्त बुलाते हैं 'पक्का पहाड़ी' 

नई दिल्ली, लाइव हिन्दुस्तान First Published:18-03-2017 11:30:56 AMLast Updated:18-03-2017 11:40:10 AM
संघ के सिपाही त्रिवेंद्र रावत को दोस्त बुलाते हैं 'पक्का पहाड़ी' 

त्रिवेंद्र सिंह रावत संघ के उन सिपाहियों में से एक हैं जो महज 19 साल की उम्र से ही संघ की शाखाओं में जाने लगे थे। संघ के संस्कारों के साथ ही वे भाजपा में शामिल हुए। रावत 14 साल तक संघ से जुड़े रहे और फिर 1993 में भाजपा संगठन में मंत्री बने।

56 साल के रावत 1979 में संघ में शामिल हुए थे और 2 साल में ही वह प्रचारक बन गए। उस वक्त उनकी उम्र महज 21 साल थी। एक प्रचारक अपने परिवार के साथ नहीं रहता और अपना जीवन संघ के कार्यों में समर्पित करता है।

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त्रिवेंद्र सिंह रावत 1997-2002 के बीच उत्तराखंड के अर्गनाइजिंग सेक्रेटरी रहे। पौड़ी गढ़वास में जन्मे रावत ने अपनी पोस्ट ग्रेजुएशन पत्रकारिता में की। उन्होंने राज्य के आंदोलन में भी भाग लिया, जिस कारण वह जेल भी गए। उन्होंने देहरादून के डोइवाला से अपने चारों विधानसभा चुनाव लड़े हैं और उनके दोस्त उन्हें ‘पक्का पहाड़ी’बुलाते हैं।

1985 में रावत को देहरादून महानगर का प्रचारक नियुक्त किया गया। वर्ष 1993 में संघ की ओर से उन्हें भारतीय जनता पार्टी में संगठन मंत्री का दायित्व दिया गया। राज्य आंदोलन में भी त्रिवेंद्र की अहम भूमिका रही। वह कई बार गिरफ्तार हुए और जेल भी गए। वर्ष 1997 से 2002 तक भाजपा में उन्हें प्रदेश संगठन मंत्री बनाया गया। इस दौरान भाजपा ने विधानसभा, लोकसभा और विधान परिषद चुनाव में बड़ी सफलता हासिल की। वर्ष 2002 में पहले विधानसभा चुनाव में डोईवाला से चुनाव जीता और विधायक बने। 2007 में डोईवाला से दोबार रिकार्ड मतों से जीत दर्ज की और भाजपा सरकार में कृषि मंत्री बने।

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पार्टी नेतृत्व के भरोसेमंद


नेतृत्व क्षमता का आंकलन करते हुए वर्ष 2013 में पार्टी ने त्रिवेंद्र रावत को राष्ट्रीय सचिव की जिम्मेदारी दी। साथ ही उत्तर प्रदेश का सह प्रभारी और टैक्नोक्रेट सेल के प्रभारी के तौर पर अहम जिम्मेदारी दी। लोकसभा चुनाव 2014 में भी राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने त्रिवेंद्र पर भरोसा करते हुए उन्हें यूपी का सह प्रभारी बनाया। त्रिवेंद्र रावत ने अपनी राजनैतिक कौशलता का परिचय झारखंड चुनाव में दिया। अक्तूबर 2014 में झारखंड प्रभारी बने और वहां भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनी।

आम पहाड़ी जैसा है रावत का परिवार

त्रिवेंद्र सिंह रावत का परिवार एक आम पहाड़ी परिवार के जैसा है। उनके पिता प्रताप सिंह रावत गढ़वाल राफयल के सैनिक रहते हुए दूसरे विश्वयुद्ध की लड़ाई लड़ चुके हैं। जबकि उनके एक भाई आज भी गांव में वैज्ञानिक तरीके से संगध पौधों की खेती कर रहे हैं।

आठ भाई और एक बहन में त्रिवेंद्र सबसे छोटे हैं। उनके एक भाई बृजमोहन सिंह रावत आज भी खैरासैंण स्थित गांव के पोस्ट ऑफिस में पोस्टमास्टर हैं। जो सपरिवार गांव में ही रहते हैं, त्रिवेंद्र क दो बड़े भाईयों का इस बीच निधन हो चुका है, उनका परिवार भी गांव में पैतृक घर में रहता है। एक भाई का परिवार सतपूली कस्बे में रहता है, जबकि त्रिवेंद्र से ठीक बड़े विरेंद्र सिंह रावत जयहरीखाल में रह कर पहाड़ में नई तरीके की खेती को बढ़ावा दे रहे हैं।

वीरेंद्र बताते हैं कि पहले वो दिल्ली में प्राइवेट नौकरी करते थे, लेकिन बाद में उन्होंने पहाड़ लौटकर जयहरीखाल के पास पीड़ा गांव में तीन सौ नाली जमीन लीज पर लेकर यहां संगध पौधों की खेती की। इस बार पहली बार वो इससे 90 लीटर सुंगधित तेल निकालने में कामयाब रहे। जिसकी बाजारू कीमत क्वालिटी के अनुसार नौ सौ रुपए से लेकर 1800 रुपए प्रति लीटर की है। बकौल वीरेंद्र भविष्य में वो इस प्रयोग को दूसरे गावों में भी दोहराना चाहते हैं, उनके अनुसार पहाड़ में खेती के बजाय इसी तरह बागवानी को बढ़ावा दिए जाने की जरूरत है।

टाट पट्टी वाले स्कूल में पढ़कर निकले
त्रिवेंद्र ने आठवीं तक की पढ़ाई अपने मूल गांव खैरासैण स्थित स्कूल में की। इसके बाद 10वीं की पढाई इंटर कॉलेज सतपूली और फिर 12वीं इंटर कॉलेज एकेश्वर से की। त्रिवेंद्र ने स्नातक राजकीय महाविद्यालय जयहरीखाल से किया, जबकि पत्रकारिता में स्नातकोत्तर गढ़वाल विश्वविद्यालय कैम्पस श्रीनगर से किया।

त्रिवेंद्र के भाई वीरेंद्र बताते हैं कि वो पढ़ाई में मध्यम दर्जे के रहे, लेकिन बचपन से ही सामाजिक कार्य और राजनैतिक विषयों पर विचार विमर्श करने में उनकी गहन रुचि रही। यही कारण है कि उन्होंने स्कूली दिनों से ही संघ की गतिविधियों में रुचि लेना शुरू कर दिया था।

मंडुआ की रोटी का स्वाद
उनके बड़े भाई वीरेंद्र बताते हैं कि उन्हे सर्दियों में मंडुवे की रोटी जरूर चाहिए होती है। गांव से आए किसी भी पहाड़ी उत्पाद को वो बड़े चाव से खाते हैं। इसमें पहाड़ी गहथ, काली दाल, भट्ट प्रमुख हैं। खासकर गांव जाकर वो पूरी तरह से पहाड़ी खाना पसंद करते हैं।

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